पर्सनल फाइनेंस

4 min read | अपडेटेड September 21, 2026, 16:39 IST
सारांश
जैसे-जैसे निवेश का आधार बड़ा होता है, निवेश से मिलने वाला रिटर्न भी पोर्टफोलियो की ग्रोथ में बड़ा योगदान देने लगता है। हालांकि, 12% रिटर्न हर साल मिलना तय नहीं है। शेयर बाजार में किसी साल अच्छा रिटर्न मिल सकता है तो किसी साल बड़ा नुकसान भी हो सकता है।

निवेश की शुरुआत में रकम छोटी होने के कारण बाजार से मिलने वाला रिटर्न बहुत बड़ा असर नहीं डालता।
म्यूचुअल फंड (Mutual Fund) में पहला ₹10 लाख जुटाना कई निवेशकों के लिए आसान नहीं होता। सीमित आय वाले व्यक्ति को हर महीने अपनी सैलरी में से एक हिस्सा निवेश के लिए अलग रखना पड़ता है। मान लीजिए आप एक सैलरीड एम्प्लॉयी हैं तो आप इसमें से हर महीने एक तय रकम निवेश कर सकते हैं। हर महीने निवेश की इस व्यवस्था को सिस्टमैटिक इनवेस्टमेंट प्लान यानी SIP कहा जाता है। SIP के जरिए बड़ा फंड रातों-रात तैयार नहीं होता। इसमें कई साल तक अनुशासन के साथ निवेश करना होता है।
निवेश की शुरुआत में रकम छोटी होने के कारण बाजार से मिलने वाला रिटर्न बहुत बड़ा असर नहीं डालता। मान लीजिए आप ₹50,000-60,000 की मासिक आय में ₹8000 हर महीने निवेश करते हैं। अगर आपको इस निवेश पर 12 फीसदी सालाना का रिटर्न मिलता है तो 1 साल में आपकी रकम बढ़कर 1,02,132 रुपये हो जाएगी।
₹8000 की SIP पर 12 परसेंट के हिसाब से ही 10 लाख रुपये का फंड तैयार होने में करीब 7 साल लग सकते हैं। इस अवधि में आपकी रकम बढ़कर 10,30,411 रुपये हो जाएगी। इसमें 6,72,000 रुपये आपके द्वारा निवेश की गई रकम है, जबकि 3,58,411 रुपये आपके निवेश पर रिटर्न है।
इन दोनों उदारहणों के हिसाब से पहला 1 लाख बनने में करीब एक साल लगे। लेकिन 10 लाख रुपये का फंड करीब 7 साल में तैयार हो गया। इसलिए निवेश के शुरुआती दौर में ज्यादा रिटर्न के पीछे भागने के बजाय नियमित बचत पर ध्यान देना जरूरी है। शुरुआत में आपकी बचत ही वेल्थ बनाने का सबसे बड़ा जरिया होती है।
पहला ₹1 लाख जुटाने के बाद अगला लक्ष्य ₹5 लाख तक पहुंचना होता है। इस चरण में भी निवेश में नियमितता सबसे ज्यादा मायने रखती है। यही समय निवेश की मजबूत आदत बनाने का होता है। बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेश जारी रखना और खर्च के बाद बची रकम को नियमित रूप से निवेश करना आगे की वेल्थ क्रिएशन के लिए आधार तैयार करता है।
जब निवेश का कुल पैसा ₹5 लाख तक पहुंच जाता है, तब बाजार से मिलने वाला रिटर्न ज्यादा दिखाई देने लगता है। उदाहरण के लिए, ₹5 लाख पर अगर किसी साल 10% रिटर्न मिलता है तो यह करीब ₹50,000 होगा। वहीं ₹1 लाख पर यही 10% रिटर्न सिर्फ ₹10,000 होगा।
यानी जैसे-जैसे निवेश का आधार बड़ा होता है, निवेश से मिलने वाला रिटर्न भी पोर्टफोलियो की ग्रोथ में बड़ा योगदान देने लगता है। हालांकि, 12% रिटर्न हर साल मिलना तय नहीं है। शेयर बाजार में किसी साल अच्छा रिटर्न मिल सकता है तो किसी साल बड़ा नुकसान भी हो सकता है।
पहले ₹10 लाख तक पहुंचना इसलिए मुश्किल महसूस होता है क्योंकि शुरुआती दौर में निवेश की रकम छोटी होती है। लेकिन जैसे-जैसे कॉर्पस बढ़ता है, पहले से जमा पैसा भी रिटर्न कमाने लगता है। यही कंपाउंडिंग की ताकत है।
7 साल में 10 लाख रुपये तक पहुंचने के बाद आपका फंड तेजी से बढ़ना शुरू होता है। उदाहरण के लिए 8 हजार रुपये की मासिक SIP पर 12 परसेंट रिटर्न के हिसाब से 17 साल में करीब 50 लाख रुपये का फंड तैयार हो जाता है। इसका मतलब है कि 7 साल में 10 लाख रुपये का फंड बनने के बाद अगले 40 लाख रुपये को तैयार होने में सिर्फ 10 साल ही और लगे।
इसका मतलब यह नहीं है कि ₹10 लाख के बाद जोखिम बढ़ाकर ज्यादा रिटर्न हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए। असली बात नियमित निवेश, अनुशासन और समय देने की है। जितनी जल्दी निवेश शुरू किया जाएगा, उतना ज्यादा समय पैसे को कंपाउंड होने का मौका मिलेगा।
इस पूरे गणित में एक सबसे जरूरी बात यह समझना है कि समय के साथ महंगाई भी लगातार बढ़ती है। आज जो सामान या लाइफस्टाइल आप ₹18.56 लाख में मेंटेन कर रहे हैं, 6% की औसत सालाना महंगाई के कारण 17 साल बाद उसी लाइफस्टाइल के लिए आपको पूरे ₹50 लाख की जरूरत होगी। यानी, तकनीकी रूप से आपका फंड तो ₹50 लाख दिखेगा, लेकिन उसकी असल क्रय शक्ति कम हो जाएगी।
संबंधित समाचार
लेखकों के बारे में

अगला लेख