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4 min read | अपडेटेड October 07, 2026, 14:56 IST
सारांश
आरबीआई द्वारा रेपो रेट 0.25% बढ़ाकर 5.50% किए जाने के बाद 10 साल की बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड 5 बेसिस पॉइंट्स उछलकर 7.25% पर पहुंच गई। केंद्रीय बैंक ने अपना पॉलिसी स्टांस बदलकर कैलिब्रेटेड टाइटनिंग कर दिया है।

आरबीआई के रेपो रेट बढ़ाने और कैलिब्रेटेड टाइटनिंग के फैसले के बाद 10 साल की बॉन्ड यील्ड में तेजी।
आरबीआई द्वारा मॉनेटरी पॉलिसी में रेपो रेट बढ़ाने के फैसले के बाद भारतीय बॉन्ड मार्केट में जोरदार हलचल देखने को मिली। 7 अक्टूबर को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई द्वारा रेपो रेट में 0.25% यानी 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी किए जाने के बाद 10 साल की बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड 5 बेसिस पॉइंट्स से ज्यादा उछलकर 1 साल के रिकॉर्ड हाई लेवल 7.25% पर पहुंच गई। इससे पिछले सत्र में बॉन्ड यील्ड 7.19% पर बंद हुई थी। सेंट्रल बैंक ने ब्याज दरों को 5.25% से बढ़ाकर 5.50% कर दिया है। इसके साथ ही आरबीआई ने मॉनेटरी पॉलिसी के स्टांस को न्यूट्रल से बदलकर कैलिब्रेटेड टाइटनिंग कर दिया है ताकि देश में महंगाई और कीमतों के दबाव पर काबू पाया जा सके।
पॉलिसी अनाउंसमेंट से पहले सुबह के सेशन में बॉन्ड मार्केट में काफी सतर्कता देखी जा रही थी। 6.94% 2036 बेंचमार्क बॉन्ड की यील्ड 7.18 से 7.20% के सीमित दायरे में ट्रेड कर रही थी। रॉयटर्स के पोल में करीब 60% इकोनॉमिस्ट्स ने 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी का अनुमान जताया था। वहीं कुछ ट्रेडर्स 50 बेसिस पॉइंट्स की बड़ी रेट हाइक और लिक्विडिटी वापस खींचने के लिए एडिशनल डेट सेल्स या CRR में बढ़ोतरी की आशंका भी जता रहे थे। ब्रोकरेज फर्म HSBC के मुताबिक आरबीआई को आने वाले महीनों में बैंकिंग सिस्टम से लगभग 6 लाख करोड़ रुपए यानी 62.25 अरब डॉलर की लिक्विडिटी निकालनी पड़ सकती है। इसमें से 2 लाख करोड़ रुपए की लिक्विडिटी करेंसी इन सर्कुलेशन के जरिए और बाकी रकम ओएमओ सेल्स, FX स्पॉट, एफएक्स स्वैप्स और VRR जैसे टूल्स के जरिए वापस ली जा सकती है। इससे पहले सितंबर में आरबीआई ने 1 लाख करोड़ रुपए के बॉन्ड्स बेचे थे जो बीते एक दशक में सबसे ज्यादा थे।
भारतीय बॉन्ड यील्ड में आई इस तेजी के पीछे ग्लोबल मार्केट का भी बड़ा हाथ रहा। अमेरिका में 10 साल की ट्रेजरी यील्ड 5.30% के मल्टी-इयर हाई लेवल के करीब बनी हुई है, जिससे भारतीय बाजार की धारणा प्रभावित हुई। एक्सपर्ट्स का मानना है कि बॉन्ड मार्केट में ऊंची यील्ड का दौर अभी कुछ समय तक बना रह सकता है। इक्विरस ग्रुप में फिक्स्ड इनकम के हेड और एमडी विनय पाई का कहना है कि अगर भारतीय अर्थव्यवस्था में महंगाई बनी रहती है, तो आरबीआई अपना सतर्कता वाला रुख जारी रखेगा और आगे भी रेट हाइक की गुंजाइश बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि महंगाई का लंबा दौर, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, करेंसी पर दबाव और कमोडिटीज में उतार-चढ़ाव बॉन्ड मार्केट के लिए चुनौतीपूर्ण माहौल बना रहे हैं। इससे शॉर्ट एंड की यील्ड और ऊपर जा सकती है।
सेंट्रल बैंक द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने का सीधा असर फिक्स्ड इनकम एसेट्स पर पड़ता है। जब रेपो रेट और बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो निवेशकों को फिक्स्ड इनकम प्रोडक्ट्स पर बेहतर रिटर्न का मौका मिलता है जिससे मार्केट से लिक्विडिटी कम करने और इन्फ्लेशन रिस्क को घटाने में मदद मिलती है। ब्याज दरें, बॉन्ड यील्ड और बॉन्ड प्राइसेज के बीच उलटा संबंध होता है। जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो बॉन्ड प्राइसेज यानी बॉन्ड की कीमतों में गिरावट आती है। पॉलिसी रेट्स बढ़ने के साथ ही बाजार में बॉन्ड्स की मांग बढ़ती है क्योंकि निवेशक ज्यादा रिटर्न वाले सेफ हैवन एसेट्स की तरफ आकर्षित होते हैं और जोखिम वाले एसेट्स से दूरी बनाने लगते हैं। OIS रेट्स की बात करें तो 1 साल का OIS रेट 6.2375%, 2 साल का 6.41% और 5 साल का रेट 6.67% पर बंद हुआ है।
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