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4 min read | अपडेटेड September 09, 2026, 14:16 IST
सारांश
बॉन्ड यील्ड बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के पास चला गया है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है।

भारत का बॉन्ड बाजार कई दूसरे उभरते बाजारों की तुलना में मजबूत स्थिति में है।
भारत की 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड करीब 7 फीसदी के स्तर तक पहुंच गई है। कुछ हफ्ते पहले यही यील्ड करीब 6.75% थी। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस बढ़ोतरी को भारतीय अर्थव्यवस्था में किसी बड़े संकट या कमजोरी के संकेत के तौर पर नहीं देखना चाहिए। यह मुख्य रूप से वैश्विक स्तर पर महंगाई, ब्याज दरों और जोखिम को लेकर बदल रही बाजार की धारणा का असर है। यहां हम समझेंगे कि बॉन्ड यील्ड में इस बढ़ोतरी की क्या वजह है।
बॉन्ड यील्ड बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के पास चला गया है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए लंबे समय तक महंगा तेल रहने से देश में महंगाई बढ़ने और चालू खाते पर दबाव की चिंता बढ़ती है।
दूसरा कारण अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी है। अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड करीब 4.8% तक पहुंच गई है। जब अमेरिका जैसे विकसित बाजारों में सुरक्षित निवेश से मिलने वाला रिटर्न बढ़ता है, तो निवेशक भारत जैसे बाजारों में भी ज्यादा यील्ड की मांग करते हैं।
तीसरा कारण ब्याज दरों को लेकर उम्मीदों में बदलाव है। महंगाई का जोखिम बढ़ने के कारण बाजार को अब यह भरोसा कम है कि दुनिया भर के केंद्रीय बैंक जल्द और तेजी से ब्याज दरों में कटौती कर पाएंगे।
भारत का बॉन्ड बाजार कई दूसरे उभरते बाजारों की तुलना में मजबूत स्थिति में है। इसकी बड़ी वजह सरकारी बॉन्ड में घरेलू निवेशकों की ज्यादा हिस्सेदारी है। बैंक, बीमा कंपनियां, प्रोविडेंट फंड, पेंशन फंड और म्यूचुअल फंड सरकारी बॉन्ड में बड़े निवेशक हैं। विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है, इसलिए वैश्विक बाजार में बिकवाली का असर सीमित रहता है।
इसके अलावा भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ भी मजबूत है। अप्रैल-जून तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8% रही। वहीं सरकार की उधारी और राजकोषीय स्थिति में ऐसा कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है, जो बॉन्ड यील्ड में अचानक भारी उछाल का कारण बने।
बैंकिंग सिस्टम में अभी भी पर्याप्त लिक्विडिटी मौजूद है। ऐसे में बॉन्ड यील्ड बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि RBI तुरंत रेपो रेट बढ़ाएगा। केंद्रीय बैंक पहले लिक्विडिटी को नियंत्रित करने के लिए VRRR जैसे उपायों का इस्तेमाल कर सकता है। अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और बढ़ती है या रुपये में बड़ी कमजोरी आती है, तो भारतीय बॉन्ड यील्ड पर और दबाव बन सकता है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि 7% के करीब यील्ड को फिलहाल घबराहट के बजाय बाजार की री-प्राइसिंग के रूप में देखना बेहतर है। ऊंची यील्ड से बॉन्ड में भविष्य की कमाई की संभावना भी बढ़ती है, हालांकि अल्पकाल में कीमतों में उतार-चढ़ाव रह सकता है। सरकार के बॉन्ड पर मिलने वाला ब्याज पहले की तुलना में बेहतर हो गया है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि पूरा पैसा शेयर बाजार से निकालकर बॉन्ड में डाल देना चाहिए।
बॉन्ड में निवेश करते समय यह समझना जरूरी है कि बॉन्ड यील्ड और बॉन्ड प्राइस आमतौर पर विपरीत दिशा में चलते हैं। यानी अगर आगे इंटरेस्ट रेट्स या यील्ड और बढ़ते हैं, तो पहले से खरीदे गए बॉन्ड की मार्केट प्राइस गिर सकती है। खासकर लॉन्ग ड्यूरेशन बॉन्ड में यह असर ज्यादा हो सकता है। सिर्फ ऊंची यील्ड देखकर बॉन्ड नहीं खरीदना चाहिए। ज्यादा यील्ड अक्सर ज्यादा रिस्क का संकेत हो सकती है। निवेश करने से पहले इंटरेस्ट रेट रिस्क, क्रेडिट रिस्क और लिक्विडिटी रिस्क जरूर देखें।
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