पर्सनल फाइनेंस
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5 min read | अपडेटेड September 11, 2026, 17:58 IST
सारांश
पर्सनल लोन लेते समय सही ब्याज दर चुनना बहुत जरूरी है। बैंक फिक्सड और फ्लोटिंग दो तरह के विकल्प देते हैं। फिक्सड दर में पूरी अवधि के दौरान EMI एक समान रहती है, जबकि फ्लोटिंग में बाजार के हिसाब से बदलाव होता है। सही चुनाव से आप हजारों रुपये की बचत कर सकते हैं।

पर्सनल लोन में फिक्सड और फ्लोटिंग ब्याज दर चुनने का फैसला आपकी EMI और बचत को प्रभावित करता है।
पर्सनल लोन के लिए आवेदन करते समय ज्यादातर लोग केवल लोन अमाउंट और EMI पर ध्यान देते हैं। लेकिन आपके लोन का कुल खर्च ब्याज दर के प्रकार से तय होता है। बैंक मुख्य रूप से फिक्सड और फ्लोटिंग ब्याज दरों की पेशकश करते हैं। इस फैसले से देश के लाखों नौकरीपेशा और वेतनभोगी ग्राहक सीधे प्रभावित होते हैं। हालांकि ज्यादातर बैंक फिक्सड रेट ही देते हैं और कुछ ही बैंक फ्लोटिंग ऑफर करते हैं। यह समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि गलत विकल्प चुनने से आपकी जेब पर हजारों रुपये का अतिरिक्त ब्याज भार पड़ सकता है। अगर आप स्थिर खर्च चाहते हैं तो फिक्सड रेट सुरक्षित है, जबकि घटती दरों के दौर में फ्लोटिंग रेट बड़ा फायदा देती है। ग्राहकों के लिए अगला बड़ा पड़ाव अक्टूबर 2026 में होने वाली भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति बैठक है, जिससे फ्लोटिंग रेट्स की दिशा तय होगी।
फिक्सड ब्याज दर का सीधा मतलब यह है कि लोन समझौते पर हस्ताक्षर करते समय तय की गई ब्याज दर पूरे लोन टेन्योर के दौरान एक जैसी बनी रहेगी। देश की अर्थव्यवस्था में चाहे कितनी भी उथल-पुथल हो या भारतीय रिजर्व बैंक अपनी दरों में बदलाव करे, आपकी ब्याज दर में कोई फेरबदल नहीं होता है। लोन की पूरी अवधि के दौरान आपकी मासिक किस्त बिल्कुल निश्चित रहती है। इससे नौकरीपेशा लोगों को अपने हर महीने के बजट की योजना बनाने में पूरी स्पष्टता मिलती है।
इसके अलावा अगर आर्थिक कारणों से या रिजर्व बैंक के फैसलों की वजह से बाजार में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तब भी फिक्सड रेट वाले ग्राहकों पर कोई असर नहीं पड़ता है। लेकिन फिक्सड रेट लोन की सबसे बड़ी सीमा यह है कि यह फ्लोटिंग के मुकाबले शुरुआती दौर में 1 से 2.5% तक महंगा होता है। इसके साथ ही अगर फ्यूचर में ब्याज दरें गिरती हैं, तब भी फिक्सड रेट ग्राहकों की EMI कम नहीं होती है और कई बैंक लोन अवधि के बीच में इस स्ट्रक्चर को बदलने पर पाबंदी या भारी शुल्क लगाते हैं।
फ्लोटिंग ब्याज दर बाजार की परिस्थितियों और केंद्रीय बैंक की नीतिगत दरों के साथ सीधे जुड़ी होती है। जब भारतीय रिजर्व बैंक अपनी रेपो रेट बढ़ाता है, तो बैंक अपनी लेंडिंग दरें बढ़ा देते हैं जिससे फ्लोटिंग रेट लोन की दरें ऊपर चली जाती हैं। इसके उलट जब रिजर्व बैंक रेपो रेट में कटौती करता है, तो फ्लोटिंग लोन की ब्याज दरें भी घट जाती हैं। अगर बाजार में ब्याज दरें नीचे आती हैं, तो आपकी लोन ब्याज दर तुरंत घट जाएगी। इससे आपकी मासिक EMI या लोन की अवधि कम हो जाती है और ब्याज के रूप में भारी बचत होती है।
फ्लोटिंग रेट आम तौर पर फिक्सड रेट की तुलना में कम दर पर शुरू होती है, जिससे शुरुआती सालों में भुगतान का बोझ हल्का रहता है। हालांकि महंगाई बढ़ने के कारण अगर ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो आपकी मासिक EMI बढ़ सकती है जिससे पूरे लोन की कुल लागत काफी बढ़ जाती है और हर महीने का वित्तीय बजट निश्चित रखना थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
ब्याज दरों के इस अंतर को एक आसान उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए आपने 10 लाख रुपये का पर्सनल लोन 5 साल के लिए लिया है। अगर आप 14% की फिक्सड रेट चुनते हैं, तो आपकी अनुमानित EMI 23,268 रुपये बनेगी। इसमें 5 साल के दौरान कुल ब्याज 3.96 लाख रुपये देना होगा और कुल भुगतान 13.96 लाख रुपये रहेगा। दूसरी तरफ अगर आप 12% की फ्लोटिंग रेट चुनते हैं, तो EMI 22,244 रुपये बनेगी। इसमें कुल ब्याज 3.35 लाख रुपये रहेगा और कुल भुगतान 13.35 लाख रुपये होगा। यानी फ्लोटिंग रेट से शुरुआत में ही हर महीने करीब 1,024 रुपये की EMI बचेगी और अगर पूरी अवधि में दर 12% ही रहती है, तो करीब 61,000 रुपये कम ब्याज देना पड़ेगा।
अब अगर यह मान लें कि इसी 10 लाख रुपये के 5 साल वाले लोन पर शुरुआत में फ्लोटिंग रेट 12% है और 2 साल बाद यह घटकर 10% हो जाती है। पहले 2 साल यानी 24 महीने तक 12% की दर से EMI करीब 22,244 रुपये रहेगी और 24 महीने बाद बकाया रकम करीब 6.75 लाख रुपये बचेगी। इसके बाद बाकी बचे 36 महीनों के लिए अगर ब्याज दर घटकर 10% हो जाती है, तो नई EMI घटकर करीब 21,800 रुपये रह जाएगी। इस तरह ब्याज दर में 2% की गिरावट आने से हर महीने करीब 444 रुपये की सीधी बचत होगी और यह गिरावट बाकी बची अवधि में कुल ब्याज के बोझ को भी काफी कम कर देगी।
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