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4 min read | अपडेटेड August 21, 2026, 17:38 IST
सारांश
Active Choice या Auto Choice चुनने में आपकी उम्र और रिटायरमेंट तक बचा समय अहम भूमिका निभाता है। आमतौर पर 20 या 30 की उम्र में निवेश शुरू करने वाले लोगों के पास लंबी निवेश अवधि होती है। ऐसे निवेशक बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव को लंबे समय तक संभाल सकते हैं।

Active Choice में इक्विटी में 75% तक निवेश करने की सुविधा होती है।
नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में निवेश करते समय यह तय करना जरूरी होता है कि आपका पैसा किस तरह के एसेट में निवेश किया जाए। इसके लिए NPS में Active Choice और Auto Choice का विकल्प मिलता है। Active Choice में निवेशक खुद तय करता है कि उसका कितना पैसा इक्विटी, कॉरपोरेट बॉन्ड और सरकारी सिक्योरिटीज में लगाया जाए। वहीं Auto Choice में यह काम अपने आप होता है और उम्र बढ़ने के साथ निवेश का पैटर्न बदलता रहता है। यहां हम समझेंगे कि इन दोनों विकल्पों में से किसी एक के चुनाव के समय किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
Active Choice या Auto Choice चुनने में आपकी उम्र और रिटायरमेंट तक बचा समय अहम भूमिका निभाता है। आमतौर पर 20 या 30 की उम्र में निवेश शुरू करने वाले लोगों के पास लंबी निवेश अवधि होती है। ऐसे निवेशक बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव को लंबे समय तक संभाल सकते हैं। इसलिए वे Active Choice के जरिए इक्विटी में ज्यादा निवेश रख सकते हैं।
Active Choice में इक्विटी में 75% तक निवेश करने की सुविधा होती है। इससे लंबे समय में बाजार की ग्रोथ का फायदा उठाने का मौका मिल सकता है। हालांकि, ज्यादा इक्विटी का मतलब बाजार में गिरावट के दौरान ज्यादा जोखिम भी है।
वहीं, 40 के आखिरी सालों या 50 की उम्र में पहुंच चुके निवेशकों के लिए Auto Choice उपयोगी हो सकता है। इसमें उम्र बढ़ने के साथ इक्विटी का हिस्सा धीरे-धीरे कम होता है और अपेक्षाकृत कम जोखिम वाले एसेट में निवेश बढ़ता है। इसका उद्देश्य रिटायरमेंट के करीब बाजार में बड़ी गिरावट से जमा रकम को बचाने में मदद करना है।
हर निवेशक की जोखिम लेने की क्षमता अलग होती है। अगर आपको शेयर बाजार और अलग-अलग एसेट क्लास की अच्छी समझ है और आप ज्यादा जोखिम लेकर संभावित रूप से ज्यादा रिटर्न चाहते हैं, तो Active Choice पर विचार कर सकते हैं।
इसके उलट अगर आप निवेश का एसेट एलोकेशन खुद तय नहीं करना चाहते या बाजार की ज्यादा जानकारी नहीं है, तो Auto Choice बेहतर विकल्प हो सकता है। इसमें उम्र के हिसाब से आपके निवेश का संतुलन अपने आप बदलता रहता है।
Active Choice चुनने वाले निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो पर नियमित नजर रखनी चाहिए। समय-समय पर यह देखना जरूरी है कि इक्विटी, कॉरपोरेट बॉन्ड और सरकारी सिक्योरिटीज में निवेश का अनुपात उनके लक्ष्य और जोखिम क्षमता के मुताबिक है या नहीं।
दूसरी तरफ, Auto Choice उन लोगों के लिए सुविधाजनक है जो निवेश को ज्यादा समय नहीं देना चाहते। इसमें निवेशक को उम्र के साथ एसेट एलोकेशन बदलने की चिंता नहीं करनी पड़ती।
NPS सब्सक्राइबर Tier I और Tier II में एक वित्त वर्ष के दौरान निवेश का विकल्प चार बार तक बदल सकते हैं। इसके अलावा, नियमों के अनुसार Pension Fund Manager को भी बदला जा सकता है।
इसलिए Active Choice और Auto Choice में चुनाव करते समय सिर्फ संभावित रिटर्न नहीं, बल्कि उम्र, जोखिम लेने की क्षमता और निवेश को दिए जाने वाले समय को भी ध्यान में रखना चाहिए। अगर आप ऑटो चॉइस में हैं और एक्टिव चॉइस में बदलना चाहते हैं, तो यह प्रोसेस आसान है और इसे हर फाइनेंशियल ईयर में चार बार मुफ्त में किया जा सकता है।
इसके लिए आपको ऑफिशियल पोर्टल के ज़रिए अपने NPS अकाउंट में लॉग इन करना होगा। इसके बाद Change scheme preference पर जाएं और अपनी इन्वेस्टमेंट पसंद के तौर पर 'Active choice' चुनें। इसके बाद आप अपनी पसंद का एसेट एलोकेशन सेट कर सकते हैं और फिर इसे कन्फर्म कर दें।
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