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  1. अमेरिका का चीन पर टैरिफ चोरी का आरोप, भारत समेत 40+ देशों पर उठे सवाल, क्या है पूरा मामला?

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अमेरिका का चीन पर टैरिफ चोरी का आरोप, भारत समेत 40+ देशों पर उठे सवाल, क्या है पूरा मामला?

Shubham Singh Thakur

4 min read | अपडेटेड August 14, 2026, 12:46 IST

सारांश

व्हाइट हाउस के ट्रेड एडवाइजर पीटर नवारो ने दावा किया कि चीन 40 से ज्यादा देशों के जरिए अपने सामान की ट्रांसशिपमेंट कर रहा है। रिपोर्ट में भारत का नाम भी इस नेटवर्क में शामिल देशों में है।

US China

अमेरिका का दावा है कि उसे हर साल 19 से 26 अरब डॉलर के टैक्स रेवेन्यू का नुकसान हो रहा है।

अमेरिका ने चीन के खिलाफ टैक्स चोरी का बड़ा आरोप लगाया है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि चीन अपने सामान को भारत समेत 40 से ज्यादा देशों के जरिए अमेरिका भेजकर उन पर लगने वाले टैरिफ से बच रहा है। व्हाइट हाउस की नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस वजह से अमेरिका को हर साल 19 से 26 अरब डॉलर के टैक्स राजस्व का नुकसान हो रहा है। रिपोर्ट में भारत को भी चीन के कथित ‘शैडो ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क’ में शामिल किया गया है। यहां हम समझेंगे कि यह पूरा मामला क्या है।

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2018 के बाद बढ़ा ट्रांसशिपमेंट

रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में अमेरिका ने चीन पर नए टैरिफ लगाए थे। इसके बाद चीन ने अपने सामान को मैक्सिको, मलेशिया जैसे दूसरे देशों के जरिए अमेरिका भेजना शुरू किया। इससे कागजों पर अमेरिका के चीन से आयात में कमी दिखाई दी, लेकिन चीन का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर लगातार बढ़ता रहा। अमेरिका का आरोप है कि इससे अमेरिकी फैक्ट्रियों और रोजगार पर भी असर पड़ा।

इस प्रक्रिया को ट्रांसशिपमेंट कहा जाता है। इसमें सामान को किसी तीसरे देश में भेजकर उसकी पैकेजिंग, मामूली असेंबली या लेबलिंग की जाती है और फिर उसे उस देश का सामान बताकर अमेरिका भेजा जाता है।

भारत का नाम भी शामिल

व्हाइट हाउस के ट्रेड एडवाइजर पीटर नवारो ने दावा किया कि चीन 40 से ज्यादा देशों के जरिए अपने सामान की ट्रांसशिपमेंट कर रहा है। रिपोर्ट में भारत का नाम भी इस नेटवर्क में शामिल देशों में है। हालांकि, रिपोर्ट भारत को ऐसे देशों के पहले स्तर में रखती है जहां ट्रांसशिपमेंट का जोखिम वैध व्यापार के साथ जुड़ा हुआ बताया गया है।

रिपोर्ट ने 40 से ज्यादा देशों को तीन कैटेगरी में बांटा है। भारत को Tier 1 यानी “डायवर्सिफाइड स्केल लीडर्स” में रखा गया है। इस कैटेगरी में कनाडा, यूरोपीय संघ, इजरायल, जापान, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देश भी शामिल हैं। वहीं ब्राजील, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, तुर्की और वियतनाम को Tier 2 में रखा गया है।

भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर भी सवाल

रिपोर्ट में भारत के पुणे-गुजरात-चेन्नई प्रोडक्शन बेल्ट का भी जिक्र किया गया है। नवारो का आरोप है कि यहां चीन से आए पंप और कंप्रेसर मामूली बदलाव के बाद भारतीय सामान के रूप में अमेरिका पहुंच सकते हैं। उनके मुताबिक, ऐसा होने पर अमेरिका में Cincinnati, Dayton और Columbus जैसे शहरों की औद्योगिक सप्लाई चेन और स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग पर असर पड़ सकता है।

नवारो ने भारत को लेकर क्या कहा?

नवारो ने एक ब्रीफिंग में भारत का नाम लेते हुए कहा कि अमेरिका द्वारा दूसरे देशों पर ज्यादा टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत और वियतनाम जैसे देश ट्रांसशिपमेंट की कोशिश कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि कम टैरिफ का फायदा उठाने का तरीका नियमों को तोड़ना नहीं, बल्कि अमेरिकी सामान के लिए बाजार खोलना, बौद्धिक संपदा का सम्मान करना और व्यापार में समानता की दिशा में आगे बढ़ना है।

303 अरब डॉलर तक हो सकता है ट्रांसशिपमेंट का अनुमान

रिपोर्ट के मुताबिक अवैध तरीके से ट्रांसशिप किए गए सामान की सालाना वैल्यू करीब 40 अरब डॉलर से लेकर 303 अरब डॉलर तक हो सकती है। यह अंतर अलग-अलग तरीकों और ट्रांसशिपमेंट की अलग-अलग परिभाषाओं के कारण है।

अमेरिका लाएगा सख्त नियम

अमेरिका अब ट्रांसशिपमेंट रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की तैयारी में है। इनमें अमेरिकी कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (CBP) की शक्तियां बढ़ाना, शिपमेंट की जांच के लिए AI आधारित “डिटेक्टिव बॉर्डर” सिस्टम और नए व्यापार समझौतों में एंटी-ट्रांसशिपमेंट क्लॉज शामिल हैं। इन नियमों में भारत के साथ होने वाला संभावित व्यापार समझौता भी शामिल हो सकता है।

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, अगर किसी कंपनी का सामान ट्रांसशिपमेंट के जरिए अमेरिका पहुंचता पाया गया, तो CBP उस कंपनी के पिछले एक साल तक के शिपमेंट पर भी टैरिफ वसूल सकता है। यानी कार्रवाई सिर्फ उस एक खेप तक सीमित नहीं रहेगी।

भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर असर

अमेरिका का यह कदम ऐसे समय आया है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। भारत की रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव के कारण पहले से ही दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत जटिल बनी हुई है। ऐसे में ट्रांसशिपमेंट को लेकर अमेरिका की नई नीति भारत के लिए एक और चुनौती बन सकती है।

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