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4 min read | अपडेटेड September 02, 2026, 14:01 IST
सारांश
नो कॉस्ट EMI का ऑफर देखकर लगता है कि सामान बिना किसी एक्स्ट्रा चार्ज के किश्तों पर मिल रहा है। लेकिन असल में बैंक इंटरेस्ट वसूलते हैं, जिसकी भरपाई मर्चेंट डिस्काउंट से होती है। इसके अलावा प्रोसेसिंग फीस, जीएसटी और फुल पेमेंट डिस्काउंट का नुकसान आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है।

नो कॉस्ट ईएमआई ऑफर का जानिए असली सच और हिडन चार्जेस।
पहले नया स्मार्टफोन या कोई महंगा गैजेट खरीदते वक्त अक्सर लोग बजट की वजह से रुक जाते थे। लेकिन अब EMI, खासकर नो कॉस्ट EMI ने पूरा गेम ही पटल दिया है। मान लीजिए 60,000 रुपये का कोई नया फोन आपको पसंद आता है, तो एक बार में इतनी बड़ी रकम देना जेब पर भारी पड़ सकता है। ऐसे में नो कॉस्ट EMI का ऑफर आपको मिल जाए, जिसमें 10 हजार की किश्त 6 महीने की बनती मिले। तो ये जेब के लिहाज से काफी अच्छा भी रहेगा। लेकिन ध्यान रहे इस 6 ईएमआई के साथ बैंक कुछ चार्जेज भी आपसे वसूलते हैं।
नो कॉस्ट EMI का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि बैंक आपको बिना किसी ब्याज यानी इंटरेस्ट के लोन दे रहा है। ऐसे ज्यादातर ऑफर्स में बैंक आपकी किश्तों पर सामान्य तरीके से ही इंटरेस्ट लगाता है। इस खेल में सेलर या फोन बनाने वाली कंपनी आपको इंटरेस्ट के बराबर या उसके आसपास का डिस्काउंट शुरुआती कीमत पर दे देती है। इसे एक उदाहरण से समझें तो अगर 60000 रुपये के फोन पर 6 महीने की किश्त में 2400 रुपये का इंटरेस्ट बनता है, तो सेलर फोन की कीमत 2400 रुपये घटाकर 57600 रुपये कर देता है। इसके बाद बैंक इस रकम पर 2400 रुपये का इंटरेस्ट जोड़ता है। इस तरह कुल पेमेंट घूम फिरकर वापस 60000 रुपये के आसपास आ जाता है और ग्राहक को लगता है कि उसे बिना किसी एक्स्ट्रा चार्ज के लोन मिल गया।
नो कॉस्ट EMI का बेसिक गणित समझने के बाद भी कुछ ऐसे एक्स्ट्रा चार्ज होते हैं जो आपकी जेब ढीली कर देते हैं। सबसे पहला चार्ज प्रोसेसिंग फीस के रूप में आता है। बैंक किसी भी खरीदारी को EMI में बदलने के लिए प्रोसेसिंग फीस लेते हैं। अगर 60000 रुपये का फोन लेते वक्त बैंक आपसे 299 रुपये की प्रोसेसिंग फीस लेता है, तो आपके फोन की कुल कीमत वहीं पर 60000 रुपये से ऊपर निकल जाती है। इसके अलावा बैंक द्वारा लगाए जाने वाले इंटरेस्ट वाले हिस्से पर जीएसटी भी देना पड़ता है। भले ही सेलर ने इंटरेस्ट की भरपाई डिस्काउंट से कर दी हो, लेकिन उस पर लगने वाले टैक्स की भरपाई कंपनी नहीं करती है। क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट में EMI के साथ जीएसटी अलग से जुड़कर आता है, जो महीनों में मिलकर एक बड़ी रकम बन जाता है।
एक और बड़ा पहलू है जिसे लोग अक्सर अनदेखा कर देते हैं। कई बार ऑनलाइन सेल के दौरान कार्ड से एक बार में पूरा पेमेंट करने पर बड़ा इंस्टेंट डिस्काउंट मिलता है। मान लीजिए 60000 रुपये के फोन पर फुल पेमेंट करने पर 4000 रुपये का इंस्टेंट डिस्काउंट मिल रहा है, जिससे फोन 56000 रुपये का पड़ेगा। लेकिन अगर आप नो कॉस्ट EMI चुनते हैं तो यह डिस्काउंट नहीं मिलता और आपको पूरे 60000 रुपये ही देने पड़ते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि EMI चुनने की वजह से आपने सीधे तौर पर 4000 रुपये का नुकसान उठा लिया।
इन सब खर्चों के बावजूद नो कॉस्ट EMI पूरी तरह से बेकार नहीं है। अगर आपको फोन की बहुत ज्यादा जरूरत है और आप एक बार में 60000 रुपये अपने बैंक अकाउंट से नहीं निकालना चाहते हैं, तो पेमेंट को कुछ महीनों में बांटना आपके मंथली बजट को संभाले रखता है। इसके अलावा जब फुल पेमेंट डिस्काउंट और EMI की कुल कीमत में बहुत कम फर्क हो, तब भी यह ऑप्शन सही साबित होता है। हालांकि EMI के चक्कर में अपनी औकात से ज्यादा महंगा फोन कभी नहीं खरीदना चाहिए। 10000 रुपये की किश्त देखने में आसान लगती है, लेकिन अगर पहले से होम लोन, कार लोन या दूसरे क्रेडिट कार्ड के बिल चल रहे हों, तो यह बजट बिगाड़ सकती है। EMI चुनने से पहले फोन की फुल पेमेंट प्राइस, कुल EMI का जोड़, प्रोसेसिंग फीस और खोने वाले डिस्काउंट का हिसाब जरूर लगा लेना चाहिए।
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