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5 min read | अपडेटेड September 17, 2026, 13:51 IST
सारांश
घर खरीदने और किराए पर रहने में से सही चुनाव करना आसान नहीं होता। घर खरीदने पर ईएमआई के साथ रजिस्ट्रेशन, मेंटेनेंस और टैक्स का खर्च जुड़ता है। वहीं किराए पर रहने से डाउन पेमेंट का पैसा बचता है, जिसे म्यूचुअल फंड में लगाकर बड़ी वेल्थ बनाई जा सकती है।

अगर आप घर खरीदने या किराए पर रहने को लेकर असमंजस में हैं तो आपको इसके गणित को समझना होगा।
क्या हर महीने EMI भरना किराया देने से बेहतर फैसला है? ज्यादातर लोग मानते हैं कि अपना घर खरीदना हमेशा फायदे का सौदा होता है, लेकिन असली तस्वीर तब सामने आती है जब डाउन पेमेंट, ब्याज, मेंटेनेंस और दूसरे छिपे खर्चों का पूरा हिसाब लगाया जाता है। कई मामलों में किराए पर रहना आपकी जेब के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। जानिए होम लोन की EMI और रेंट में किस ऑप्शन से आपको मिल सकता है ज्यादा फायदा। जब आप घर खरीदते हैं, तो सिर्फ मकान की कीमत ही नहीं चुकानी होती। इसके अलावा भी कई बड़े खर्चे होते हैं।
घर खरीदने के लिए आपको एक बड़ी रकम डाउन पेमेंट के रूप में देनी पड़ती है। यह वह पैसा है जो एक जगह पूरी तरह लॉक हो जाता है। अगर आप इसी पैसे को म्यूचुअल फंड, स्टॉक या दूसरी जगह निवेश करते तो आपको शानदार रिटर्न मिल सकता था। इसके अलावा हर महीने मोटी EMI चुकाने के बाद आपके पास अलग से निवेश करने के लिए पैसे बचते ही नहीं हैं। दूसरी तरफ किराए पर रहने से आपको आजादी मिलती है। अगर नौकरी बदली या शहर बदलना पड़ा, तो आप बिना किसी टेंशन के शिफ्ट हो सकते हैं। घर बेचने का कोई झंझट नहीं होता। अमूमन घर की EMI के मुकाबले मकान का किराया काफी कम होता है। ऐसे में जो पैसे बचते हैं, उन्हें आप शेयर मार्केट या दूसरी प्रॉफिटेबल जगहों पर लगाकर अपनी वेल्थ बढ़ा सकते हैं।
घर खरीदना तब सही है जब आप एक ही जगह पर लंबे समय तक यानी कम से कम 10 से 15 साल के लिए सेटल होना चाहते हैं। इसके अलावा जब आपको अपने घर से एक मानसिक सुकून और सुरक्षा का अहसास चाहिए होता है, तब घर खरीदना सही रहता है। अगर आप खुद से बचत नहीं कर पाते हैं और EMI के बहाने ही सही, एक अनुशासन के साथ निवेश करना चाहते हैं तो घर खरीदना आपके लिए बेहतर ऑप्शन है।
मान लीजिए किसी व्यक्ति के पास हर महीने घर के लिए करीब 70,000 रुपये का बजट है। वह 1 करोड़ रुपये का घर खरीदता है और 20% यानी 20 लाख रुपये डाउन पेमेंट देता है। बाकी 80 लाख रुपये का होम लोन 8% ब्याज पर 20 साल के लिए लिया जाता है। इस हिसाब से उसकी मासिक EMI करीब 66,900 रुपये बैठेगी। 20 साल में कुल EMI भुगतान करीब 1.61 करोड़ रुपये होगा। इसमें लगभग 80.6 लाख रुपये सिर्फ ब्याज शामिल है। डाउन पेमेंट जोड़ने पर घर पर कुल शुरुआती भुगतान करीब 1.81 करोड़ रुपये बैठता है। इसमें स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन, मेंटेनेंस, टैक्स और मरम्मत जैसे खर्च शामिल नहीं हैं।
प्रॉपर्टी की कीमत में बढ़ोतरी कोई तय या गारंटीड रिटर्न नहीं है। अगर 1 करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी की कीमत हर साल औसतन 8% बढ़ती है तो 20 साल बाद इसकी अनुमानित कीमत करीब 4.66 करोड़ रुपये हो सकती है। अगर सालाना बढ़ोतरी 5% रहती है तो कीमत करीब 2.65 करोड़ रुपये और 10% रहती है तो कीमत करीब 6.73 करोड़ रुपये हो सकती है।
अब दूसरा व्यक्ति इसी तरह का घर 40,000 रुपये महीने के किराए पर लेता है। उसके पास 70,000 रुपये का मासिक बजट है, इसलिए किराया देने के बाद करीब 30,000 रुपये हर महीने निवेश करने के लिए बचते हैं। अगर वह 30,000 रुपये की SIP 20 साल तक करता है और निवेश पर औसतन 12% सालाना रिटर्न मिलता है, तो यह रकम करीब 2.97 करोड़ रुपये हो सकती है। इसके अलावा, घर खरीदने वाले ने जो 20 लाख रुपये डाउन पेमेंट दिया था, किराएदार के पास वह पैसा निवेश करने के लिए बचा रहता है। अगर इस 20 लाख रुपये पर भी 12% सालाना रिटर्न मानें तो 20 साल बाद यह करीब 1.93 करोड़ रुपये हो सकता है। इस तरह दोनों निवेशों को मिलाकर किराएदार का अनुमानित कॉर्पस करीब 4.90 करोड़ रुपये बन सकता है।
कागज पर किराएदार का कॉर्पस 24 लाख रुपये ज्यादा दिखता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी शर्त यह है कि किराएदार लगातार 20 साल तक 30,000 रुपये निवेश करता रहे और उसे 12% रिटर्न मिले। इसके अलावा असल जिंदगी में किराया समय के साथ बढ़ता है। अगर किराया हर साल 5% बढ़े तो 40,000 रुपये का किराया 10 साल बाद करीब 65,000 रुपये और 20 साल बाद करीब 1.06 लाख रुपये महीने तक पहुंच सकता है। ऐसे में निवेश के लिए बचने वाली रकम कम हो सकती है। इसलिए घर खरीदने या किराए पर रहने का फैसला सिर्फ 20 साल बाद की अनुमानित रकम देखकर नहीं किया जाना चाहिए। आपकी आय, नौकरी की स्थिरता, निवेश क्षमता और कितने साल उस शहर में रहना है, इन सभी बातों का इस फैसले पर असर पड़ता है।
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