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6 min read | अपडेटेड August 10, 2026, 17:41 IST
सारांश
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि NPS लेना अनिवार्य नहीं है। यह कर्मचारी की पसंद और कंपनी की पॉलिसी पर निर्भर करता है। वहीं, EPF और NPS दो अलग-अलग रिटायरमेंट स्कीम्स हैं। NPS लेने का मतलब यह नहीं है कि आपका EPF बंद हो जाएगा।

NPS एक रिटायरमेंट सेविंग स्कीम है, जिसमें लंबे समय के लिए पैसा निवेश किया जाता है।
अगर आपकी सैलरी से हर महीने EPF का पैसा कटता है और आपकी कंपनी NPS (नेशनल पेंशन सिस्टम) में भी निवेश का विकल्प देती है, तो आपके मन में यह सवाल जरूर आया होगा कि दोनों में निवेश करना जरूरी है या NPS को चुनना आपके लिए फायदेमंद रहेगा। खासकर टैक्स के नजरिए से भी NPS को लेकर कर्मचारियों के बीच काफी चर्चा है।
NPS एक रिटायरमेंट सेविंग स्कीम है, जिसमें लंबे समय के लिए पैसा निवेश किया जाता है। अगर कंपनी आपके लिए NPS में योगदान करती है, तो इसे Corporate NPS कहा जाता है। यह विकल्प खास तौर पर उन कर्मचारियों के लिए उपयोगी हो सकता है, जिनकी नौकरी का लंबा समय बाकी है और जो रिटायरमेंट के लिए बड़ा फंड तैयार करना चाहते हैं।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि NPS लेना अनिवार्य नहीं है। यह कर्मचारी की पसंद और कंपनी की पॉलिसी पर निर्भर करता है। वहीं, EPF और NPS दो अलग-अलग रिटायरमेंट स्कीम्स हैं। NPS लेने का मतलब यह नहीं है कि आपका EPF बंद हो जाएगा।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि ज्यादातर कर्मचारियों के लिए EPF से बाद में बाहर निकलना संभव नहीं होता। खास परिस्थितियों में ही कोई कर्मचारी EPF से बाहर रहने का विकल्प चुन सकता है, जैसे नौकरी शुरू करते समय तय वेतन सीमा से ऊपर होना और पहली बार EPF के दायरे में आना। इसलिए अगर आप पहले से EPF में योगदान कर रहे हैं, तो NPS को उसके विकल्प के बजाय एक अतिरिक्त रिटायरमेंट निवेश के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।
NPS का सबसे बड़ा फायदा टैक्स बचत है। कंपनी की तरफ से NPS में किया गया योगदान कर्मचारी को इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80CCD(2) के तहत अतिरिक्त टैक्स लाभ दिला सकता है। यह लाभ 80C की सामान्य सीमा से अलग होता है और नई टैक्स व्यवस्था में भी उपलब्ध है।
नई टैक्स व्यवस्था में नियोक्ता कर्मचारी के बेसिक वेतन के 14% तक NPS में योगदान कर सकता है, जबकि पुरानी टैक्स व्यवस्था में यह सीमा 10% तक है। हालांकि, लागू नियमों और वेतन संरचना को ध्यान में रखना जरूरी है। यानी अगर आपकी कंपनी आपके CTC में NPS का विकल्प देती है, तो यह आपके लिए रिटायरमेंट के साथ-साथ टैक्स प्लानिंग का भी एक उपयोगी जरिया बन सकता है।
यहां कर्मचारियों को एक अहम बात समझनी चाहिए। अगर NPS में योगदान आपकी सैलरी या CTC की संरचना के तहत किया जा रहा है, तो इसका असर आपकी टेक-होम सैलरी पर पड़ सकता है। NPS में कर्मचारी की ओर से किया गया योगदान हाथ में आने वाली सैलरी को कम कर सकता है। हालांकि, टैक्स लाभ मिलने के कारण इसका कुछ असर कम हो सकता है। इसलिए NPS चुनने से पहले कर्मचारी को सिर्फ टैक्स बचत नहीं देखनी चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि हर महीने खाते में आने वाली सैलरी कितनी कम होगी।
यह भी कर्मचारियों के लिए अच्छी खबर है कि NPS पोर्टेबल है। यानी नौकरी बदलने पर आपका NPS अकाउंट खत्म नहीं होता। NPS का अकाउंट एक PRAN (Permanent Retirement Account Number) से जुड़ा होता है, जो कर्मचारी के साथ बना रहता है।
आप कंपनी बदलें, सेक्टर बदलें या बाद में खुद का काम शुरू करें, NPS अकाउंट को जारी रखा जा सकता है। अगर आप कॉरपोरेट नौकरी छोड़ते हैं, तो भी NPS में जमा पैसा बना रहता है और अकाउंट को आगे जारी रखा जा सकता है। हालांकि, इसका दूसरा पहलू यह है कि NPS का पैसा मुख्य रूप से रिटायरमेंट के लिए होता है और इसमें EPF की तुलना में भी सीमित लिक्विडिटी है।
NPS पूरी तरह लॉक नहीं है, लेकिन इसमें पैसे निकालने के नियम काफी सीमित हैं। कुछ खास जरूरतों के लिए कर्मचारी अपने खुद के योगदान के 25% तक आंशिक निकासी कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए तय शर्तें और समय-सीमा लागू होती हैं।
NPS Tier-I अकाउंट को एक्टिव रखने के लिए न्यूनतम योगदान की जरूरत होती है। वहीं, आंशिक निकासी के लिए भी कुछ समय तक NPS में बने रहना जरूरी है। इसलिए अगर आपको लगता है कि आने वाले कुछ सालों में आपको इस पैसे की जरूरत पड़ सकती है, तो NPS में बहुत ज्यादा रकम लॉक करने से पहले अपनी वित्तीय स्थिति जरूर देखें।
कर्मचारियों के लिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि EPF और NPS में से कौन बेहतर है, बल्कि यह होना चाहिए कि दोनों को अपनी जरूरत के हिसाब से कैसे इस्तेमाल किया जाए।
EPF को रिटायरमेंट सेविंग का अपेक्षाकृत स्थिर आधार माना जा सकता है। इसमें ब्याज दर पहले से तय होती है और बाजार के उतार-चढ़ाव का सीधा असर आपके जमा पैसे पर नहीं पड़ता। दूसरी तरफ, NPS का पैसा बाजार से जुड़ा होता है। इसमें इक्विटी में निवेश की वजह से लंबे समय में ज्यादा रिटर्न की संभावना हो सकती है, लेकिन रिटर्न की गारंटी नहीं होती।
एक्सपर्ट्स के अनुसार ज्यादातर वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए EPF को आधार और NPS को अतिरिक्त निवेश के तौर पर देखना व्यावहारिक तरीका हो सकता है। यानी सिर्फ NPS के लिए EPF को छोड़ने के बजाय दोनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
हालांकि, हर कर्मचारी के लिए एक ही रणनीति सही नहीं होगी। अगर आपकी उम्र कम है, रिटायरमेंट में लंबा समय बाकी है और आप बाजार से जुड़े निवेश में उतार-चढ़ाव का जोखिम उठा सकते हैं, तो NPS आपके लिए उपयोगी हो सकता है। वहीं, अगर आपकी प्राथमिकता स्थिर रिटर्न और बेहतर लिक्विडिटी है, तो EPF की भूमिका ज्यादा अहम हो सकती है।
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