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पर्सनल फाइनेंस

Regular vs Direct Mutual Fund: यह छोटा सा फर्क लंबे समय में करा सकता है लाखों का नुकसान

Shubham Singh Thakur

3 min read | अपडेटेड May 29, 2026, 19:11 IST

सारांश

ज्यादातर निवेशक अभी भी Regular Plan के जरिए निवेश करते हैं। इसमें निवेश किसी डिस्ट्रीब्यूटर, बैंक, ब्रोकर या एजेंट के माध्यम से होता है। ये लोग KYC, फॉर्म भरने, स्टेटमेंट निकालने और रिडेम्प्शन जैसी सुविधाओं में मदद करते हैं। इसके बदले में उन्हें AMC यानी फंड हाउस कमीशन देता है।

Mutual Fund

Mutual Fund: सिर्फ ज्यादा रिटर्न या कम एक्सपेंस रेशियो देखकर म्यूचुअल फंड नहीं चुनना चाहिए।

Regular vs Direct Mutual Fund: म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले ज्यादातर लोग रिटर्न, SIP और अच्छे फंड्स पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन एक छोटी सी चीज अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। यह है Direct Plan और Regular Plan का फर्क। यही फर्क लंबे समय में रिटर्न पर लाखों रुपये का असर डाल सकता है। पिछले 10 सालों में इक्विटी म्यूचुअल फंड्स ने औसतन करीब 13% CAGR का रिटर्न दिया है। अब सिर्फ बड़े शहर ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों से भी लोग तेजी से इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में निवेश कर रहे हैं।
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रेगुलर प्लान का एक्सपेंस रेशियो

ज्यादातर निवेशक अभी भी Regular Plan के जरिए निवेश करते हैं। इसमें निवेश किसी डिस्ट्रीब्यूटर, बैंक, ब्रोकर या एजेंट के माध्यम से होता है। ये लोग KYC, फॉर्म भरने, स्टेटमेंट निकालने और रिडेम्प्शन जैसी सुविधाओं में मदद करते हैं। इसके बदले में उन्हें AMC यानी फंड हाउस कमीशन देता है।

यही वजह है कि Regular Plan का expense ratio ज्यादा होता है। Expense ratio वह फीस है जो फंड हाउस निवेशकों से वसूलता है। Regular Plan में यह फीस अधिक होती है क्योंकि उसमें डिस्ट्रीब्यूटर का कमीशन शामिल रहता है। इसका असर सीधे निवेशक के रिटर्न पर पड़ता है और लंबे समय में बड़ा अंतर पैदा हो जाता है।

डायरेक्ट प्लान का एक्सपेंस रेशियो

Direct Plan में कोई बिचौलिया नहीं होता। निवेशक सीधे AMC या किसी ऐसे प्लेटफॉर्म के जरिए निवेश करता है जो Direct Plan उपलब्ध कराता है। चूंकि इसमें कमीशन नहीं देना पड़ता, इसलिए एक्सपेंस रेशियो कम रहता है और निवेशक को बेहतर रिटर्न मिल सकता है। सुनने में यह फर्क छोटा लगता है, लेकिन लंबे समय में इसका असर बहुत बड़ा हो सकता है।

उदाहरण से समझें

अगर कोई निवेशक ₹10 लाख को 25 साल के लिए 12% अनुमानित रिटर्न के साथ निवेश करे, तो रेगुलर प्लान में उसका पैसा करीब ₹1.28 करोड़ बन सकता है। लेकिन वही निवेश डायरेक्ट प्लान में करीब ₹1.46 करोड़ तक पहुंच सकता है। यानी सिर्फ कम एक्सपेंस रेशियो की वजह से लगभग ₹18.5 लाख का अतिरिक्त फायदा हो सकता है।

हर किसी की जरूरत अलग

Direct Plan हर किसी के लिए सही नहीं होता। इसमें निवेशक को खुद रिसर्च करनी पड़ती है, सही फंड चुनना होता है और समय-समय पर पोर्टफोलियो मॉनिटर भी करना पड़ता है। जिन लोगों को म्यूचुअल फंड की अच्छी समझ है या जो खुद निवेश संभाल सकते हैं, उनके लिए Direct Plan बेहतर विकल्प माना जाता है।

अगर किसी को निवेश में मार्गदर्शन चाहिए, लेकिन वह Regular Plan का अतिरिक्त खर्च नहीं उठाना चाहता, तो वह सेबी रजिस्टर्ड इनवेस्टमेंट एडवाइजर की मदद ले सकता है। ऐसे सलाहकार कमीशन नहीं लेते और नियमों के अनुसार सिर्फ डायरेक्ट प्लान में निवेश की सलाह देते हैं।

एक प्लान से दूसरे में स्विच करने का भी विकल्प

जिन लोगों ने पहले से Regular Plan में निवेश किया हुआ है, वे चाहें तो उसे Direct Plan में स्विच कर सकते हैं। लेकिन ऐसा करने पर एग्जिट लोड और कैपिटल गेन टैक्स लग सकता है, इसलिए फैसला लेने से पहले पूरी गणना करना जरूरी है।

सबसे अहम बात यह है कि सिर्फ ज्यादा रिटर्न या कम एक्सपेंस रेशियो देखकर म्यूचुअल फंड नहीं चुनना चाहिए। निवेश हमेशा अपने फाइनेंशियल गोल, रिस्क प्रोफाइल और निवेश की अवधि को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

(डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें।)

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