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3 min read | अपडेटेड May 27, 2026, 14:46 IST
सारांश
मार्केट रेगुलेटर सेबी ने नौकरीपेशा लोगों के लिए एक नया प्रस्ताव पेश किया है। इसके तहत कर्मचारी अब अपनी कंपनी को सैलरी से सीधे म्यूचुअल फंड SIP काटने की मंजूरी दे सकेंगे। यह सिस्टम EPF या NPS की तरह काम करेगा, जिससे हर महीने बिना किसी रुकावट के निवेश करना आसान हो जाएगा।

सेबी के नए प्रस्ताव से अब कर्मचारियों की सैलरी से सीधे म्यूचुअल फंड में कटेगी एसआईपी।
नौकरीपेशा लोगों के लिए म्यूचुअल फंड में निवेश करना अब बेहद आसान और सुविधाजनक होने जा रहा है। देश के मार्केट रेगुलेटर SEBI ने एक शानदार प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव के मुताबिक, अब सैलरीड एम्प्लॉइज अपनी एसआईपी का पैसा सीधे अपनी मंथली सैलरी से कटवा सकेंगे। यह नया सिस्टम बिल्कुल वैसे ही काम करेगा जैसे हर महीने आपकी सैलरी से EPF (एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड) या NPS (नेशनल पेंशन सिस्टम) का पैसा काटा जाता है। सेबी का यह कदम निवेशकों के बीच निवेश के अनुशासन को बढ़ाने के लिए उठाया जा रहा है।
सेबी ने एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया है, जिसमें कुछ खास शर्तों के साथ थर्ड-पार्टी पेमेंट्स को मंजूरी देने की बात कही गई है। इसी पेपर का एक मुख्य हिस्सा यह है कि एम्प्लॉयर यानी कंपनी अपने कर्मचारियों की तरफ से पेरोल डिडक्शन के जरिए म्यूचुअल फंड में पैसा ट्रांसफर कर सकती है। आसान भाषा में कहें तो, अगर कोई कर्मचारी चाहेगा तो वह अपनी कंपनी को एक तय रकम हर महीने सैलरी से काटकर उसकी पसंदीदा म्यूचुअल फंड स्कीम में लगाने की मंजूरी दे सकता है। वर्तमान नियमों के अनुसार, म्यूचुअल फंड में निवेश केवल निवेशक के खुद के वेरीफाइड बैंक अकाउंट से ही हो सकता है, ताकि किसी भी तरह के फ्रॉड या मनी लॉन्ड्रिंग को रोका जा सके। लेकिन नए प्रस्ताव से इसमें छूट मिल सकती है।
सेबी और म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का मानना है कि पेरोल से जुड़ी इस एसआईपी से लोगों में लगातार निवेश करने की आदत मजबूत होगी। अक्सर देखा जाता है कि बैंक में बैलेंस कम होने, बैंक मैंडेट फेल होने या फिर मार्केट में आने वाले उतार-चढ़ाव को देखकर लोग अपनी एसआईपी बीच में ही बंद कर देते हैं। जब पैसा सीधे सैलरी से कटकर निवेश हो जाएगा, तो निवेश बिना किसी रुकावट के लंबे समय तक चलता रहेगा। इससे उन लोगों को सबसे ज्यादा मदद मिलेगी जो पहली बार मार्केट में पैसा लगा रहे हैं और जिन्हें एसआईपी सेटअप करने का प्रोसेस थोड़ा मुश्किल लगता है। एक्सपर्ट्स इसे नौकरीपेशा लोगों के लिए लॉन्ग-टर्म रिटायरमेंट प्लानिंग की तरह देख रहे हैं।
सेबी ने साफ किया है कि यह सुविधा केवल उन्हीं कंपनियों या रेगुलेटेड संस्थाओं को देने की अनुमति होगी जो तय की गई शर्तों को पूरा करेंगी। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पूरी तरह से वॉलंटरी यानी स्वैच्छिक होगा। किसी भी कर्मचारी पर इसके लिए दबाव नहीं डाला जाएगा और इसके लिए कर्मचारी की लिखित सहमति जरूरी होगी। इसके साथ ही सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए केवाईसी नियमों और ऑडिट ट्रेल्स का पूरा पालन करना होगा। जब भी कर्मचारी इस निवेश को बेचेगा या रिडीम करेगा, तो उसका पैसा कंपनी के खाते में नहीं बल्कि सीधे कर्मचारी के ही वेरीफाइड बैंक अकाउंट में वापस आएगा।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह प्रस्ताव अभी फाइनल नहीं हुआ है। रेगुलेटर सेबी ने इस पूरे फ्रेमवर्क को एक कंसल्टेशन पेपर के रूप में जारी किया है और इस पर आम जनता और इंडस्ट्री के लोगों से सुझाव मांगे हैं। इस प्रस्ताव पर अपना फीडबैक या कमेंट देने की आखिरी तारीख 10 जून 2026 तय की गई है। इसके बाद ही सेबी अंतिम फैसला लेगा। सेबी लगातार इस कोशिश में लगा है कि निवेशकों की सुरक्षा और एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग नियमों से समझौता किए बिना निवेश के पूरे प्रोसेस को और ज्यादा आसान और बिना किसी रुकावट के पूरा होने वाला बनाया जा सके।
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