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5 min read | अपडेटेड September 07, 2026, 09:19 IST
सारांश
Pranav Constructions के IPO के तहत 315.60 करोड़ रुपये के 2.55 करोड़ नए इक्विटी शेयर जारी किए गए हैं। इसके अलावा 35.43 करोड़ रुपये के 28.57 लाख शेयरों की बिक्री ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए की जा रही है।

Pranav Constructions IPO: निवेशकों के पास इसमें 09 सितंबर तक निवेश का मौका रहेगा।
रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़ी मुंबई की कंपनी Pranav Constructions का IPO आज 07 सितंबर को खुल गया है। कंपनी इस पब्लिक इश्यू के जरिए 351 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही है। इसके लिए 118-124 रुपये प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया गया है। निवेशकों के पास इसमें 09 सितंबर तक निवेश का मौका रहेगा। यह कंपनी मुंबई में पुरानी बिल्डिंगों को तोड़कर नई बिल्डिंग बनाने (रीडेवलपमेंट) का काम करती है। अगर आप इस आईपीओ में निवेश की योजना बना रहे हैं तो यहां इससे जुड़ी पूरी जानकारी दी गई है।
प्रणव कंस्ट्रक्शन के IPO के तहत 315.60 करोड़ रुपये के 2.55 करोड़ नए इक्विटी शेयर जारी किए गए हैं। इसके अलावा 35.43 करोड़ रुपये के 28.57 लाख शेयरों की बिक्री ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए की जा रही है। सब्सक्रिप्शन के बाद इसके निवेशकों को शेयरों का अलॉटमेंट 10 सितंबर को होने की उम्मीद है।
वहीं BSE और NSE पर लिस्टिंग की संभावित तारीख 15 सितंबर तय की गई है। इस IPO के लिए 120 शेयरों का लॉट साइज है। अपर प्राइस बैंड पर एक रिटेल निवेशक को इसमें कम से कम 14,880 रुपये का निवेश करना होगा। सेंट्रम कैपिटल लिमिटेड इस इश्यू की बुक रनिंग लीड मैनेजर है और केफिन टेक्नोलॉजीज लिमिटेड इसकी रजिस्ट्रार है।
प्रणव कंस्ट्रक्शन अपने IPO से होने वाली आय का इस्तेमाल सरकारी और कानूनी मंजूरी लेने, अतिरिक्त FSI खरीदने और कुछ निर्माणाधीन व आने वाले रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए मेंबर्स को वैकल्पिक आवास व परेशानी के लिए मुआवज़ा देने से जुड़े खर्चों को पूरा करने में करेगी। इसमें कुल ₹145.72 करोड़ खर्च किए जाएंगे।
बाकी बचे फंड का इस्तेमाल कंपनी द्वारा लिए गए कुछ कर्जों को पूरी तरह या आंशिक रूप से चुकाने के लिए किया जाएगा। इसमें 91.50 करोड़ रुपये खर्च किए जा सकते हैं। इसके अलावा बाकी हिस्सा भविष्य के नए री-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स को खरीदने और सामान्य कॉर्पोरेट जरूरतों को पूरा करने के लिए खर्च होगा।
Pranav Constructions की शुरुआत 2003 में हुई थी। यह कंपनी मुख्य रूप से को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी के रिडेवलपमेंट का काम करती है। सामान्य रियल एस्टेट कंपनियां जमीन खरीदकर नए प्रोजेक्ट बनाती हैं, लेकिन Pranav Constructions मुंबई के MCGM क्षेत्र में पुरानी बिल्डिंगों को तोड़कर नई बिल्डिंग बनाने का काम करती है
कंपनी रिडेवलपमेंट की पूरी प्रक्रिया में काम करती है। इसमें सोसायटी से टेंडर हासिल करना, सदस्यों और सोसायटी से मंजूरी लेना, सदस्यों को मुआवजा देना, नगर निगम से जरूरी मंजूरी लेना और अंत में घरों का कब्जा देना शामिल है।
कंपनी का कारोबार मुख्य रूप से मुंबई के वेस्टर्न सबर्ब्स में केंद्रित है। इनमें गोरेगांव, मलाड, बोरीवली और सांताक्रूज प्रमुख इलाके हैं। कंपनी किफायती, मिड-एंड और मास हाउसिंग के साथ-साथ प्रीमियम सेगमेंट में भी काम करती है। 31 मार्च 2026 तक कंपनी के पास MCGM क्षेत्र में कुल 65 रिडेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स थे। इनमें 28 प्रोजेक्ट पूरे हो चुके थे, 20 निर्माणाधीन थे और 17 आने वाले प्रोजेक्ट्स थे।
कंपनी की वित्तीय स्थिति में भी अच्छी ग्रोथ देखने को मिली है। ऑपरेशंस से मिलने वाला कंसोलिडेटेड रेवेन्यू FY24 में ₹447.48 करोड़ था, जो FY25 में बढ़कर ₹636.27 करोड़ और FY26 में ₹761.60 करोड़ हो गया। FY26 में कंपनी का रेवेन्यू सालाना आधार पर 19.70% बढ़ा। कंपनी का नेट प्रॉफिट FY26 में 14.55% बढ़कर ₹71.32 करोड़ हो गया। FY25 से FY26 के बीच EBITDA ₹32.29 करोड़ बढ़कर ₹130.84 करोड़ हो गया, यानी इसमें 32.76% की वृद्धि हुई।
FY26 के रेवेन्यू के हिसाब से Pranav Constructions अपने बड़े लिस्टेड प्रतिस्पर्धियों से काफी छोटी है। कंपनी का FY26 रेवेन्यू ₹761.60 करोड़ था, जबकि Keystone Realtors का ₹2,634.54 करोड़ और Godrej Properties का ₹5,131.43 करोड़ रहा।
प्रणव कंस्ट्रक्शन की सबसे बड़ी ताकत उसका मुंबई रिडेवलपमेंट पर विशेष फोकस है। कंपनी रिडेवलपमेंट की कई अहम प्रक्रियाएं खुद संभालती है। इससे सोसायटी अप्रूवल, म्युनिसिपल क्लियरेंस, सदस्यों के मुआवजे और कब्जे जैसी प्रक्रियाओं पर बेहतर नियंत्रण रखने में मदद मिल सकती है। IPO से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल कर्ज चुकाने में किया जाना है, जिससे कंपनी की बैलेंस शीट को और मजबूती मिल सकती है।
रिस्क की बात करें तो कंपनी के कारोबार का बड़ा हिस्सा मुंबई के वेस्टर्न सबर्ब्स और MCGM क्षेत्र पर निर्भर है। इसलिए स्थानीय रियल एस्टेट बाजार, नगर निगम के नियमों या रिडेवलपमेंट गतिविधियों में बदलाव का असर कंपनी पर पड़ सकता है।
रिडेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में सोसायटी के सदस्यों की सहमति, सरकारी मंजूरी और FSI मिलने में देरी का जोखिम रहता है। अगर मंजूरी में देरी होती है तो प्रोजेक्ट पूरा होने में ज्यादा समय लग सकता है। इससे सदस्यों के लिए अस्थायी आवास और मुआवजे का खर्च भी बढ़ सकता है। इसके अलावा रिडेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में शुरुआत में काफी पूंजी लगानी पड़ती है। कंपनी को FSI खरीदने और किरायेदारों या सोसायटी सदस्यों के आवास की व्यवस्था जैसे खर्च पहले करने पड़ सकते हैं।
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