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4 min read | अपडेटेड September 07, 2026, 12:57 IST
सारांश
एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर 1997 की मंदी जैसा खतरा मंडरा रहा है। एचएसबीसी के चीफ इकोनॉमिस्ट फ्रेडरिक न्यूमैन के मुताबिक यूएस बॉन्ड यील्ड और येन की स्थिति पुरानी तबाही की याद दिलाती है।

एचएसबीसी की रिपोर्ट के अनुसार एशियाई बाजारों में 1997 के आर्थिक संकट जैसे संकेत दिख रहे हैं। | Image: Shutterstock
ग्लोबल शेयर बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता के बीच एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को लेकर एक बड़ी चेतावनी सामने आई है। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेजी से होती बढ़ोतरी, जापानी येन में ऐतिहासिक गिरावट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर बाजार में बना भारी उत्साह 1997 के विनाशकारी एशियाई वित्तीय संकट से काफी मिलता-जुलता नजर आ रहा है। एचएसबीसी के चीफ इकोनॉमिस्ट फ्रेडरिक न्यूमैन ने एक रिपोर्ट में बताया है कि आज के मैक्रोइकोनॉमिक हालात और लगभग तीन दशक पहले आए आर्थिक संकट के बीच कई समानताएं हैं। हालांकि इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि इस बार एशिया के सामने बैंकिंग सिस्टम की विफलता के बजाय एक नया और अलग तरह का रिस्क खड़ा हो गया है।
इतिहास के आंकड़ों पर नजर डालें तो आज और 1997 के आर्थिक संकट से पहले के दौर में कई हैरान करने वाली समानताएं दिखती हैं। 1997 के संकट से पहले अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड अक्टूबर 1993 के 5% से बढ़कर नवंबर 1994 तक लगभग 8% पर पहुंच गई थी और अप्रैल 1997 तक यह 7% के करीब बनी रही थी। आज के दौर में भी फरवरी के बाद से यील्ड में लगभग 80 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी हुई है और यह 4.79% के आसपास पहुंच गई है। अगस्त 2020 में देखे गए 0.5% के निचले स्तर से यह काफी बड़ी बढ़त मानी जा रही है।
करंसी के मोर्चे पर भी 1997 जैसी ही हलचल देखी जा रही है। अप्रैल 1995 से अप्रैल 1997 के बीच जापानी येन डॉलर के मुकाबले लगभग 55% टूट गया था और 80 से गिरकर 130 के स्तर पर आ गया था। मौजूदा चक्र में भी येन में भारी गिरावट आई है। जनवरी 2021 में लगभग 103 प्रति डॉलर से गिरकर येन जुलाई में 163 के निचले स्तर पर आ गया, जो कि 57% की गिरावट है। इसके बाद वाशिंगटन और टोक्यो को बाजार में हस्तक्षेप करके इसे 160 के पास संभालना पड़ा। इसके अलावा दोनों ही दौर में टेक्नोलॉजी को लेकर भारी उत्साह देखा गया है। नब्बे के दशक के मध्य में जहां इंटरनेट की शुरुआत का दौर था, वहीं आज पूरा बाजार AI बूम के भरोसे आगे बढ़ रहा है।
हालांकि इन समानताओं के बावजूद फ्रेडरिक न्यूमैन का मानना है कि 1997 और आज के समय में बुनियादी अंतर बहुत बड़े हैं। 1990 के दशक में एशियाई देश बाहरी पूंजी पर बहुत ज्यादा निर्भर थे और उनका करंट अकाउंट डेफिसिट काफी ज्यादा था। जब उस समय उधारी की लागत बढ़ी तो विदेशी पैसा तेजी से बाहर निकल गया, जिससे थाईलैंड से लेकर दक्षिण कोरिया तक बैंक फेल हो गए थे। लेकिन आज एशियाई देश नेट कैपिटल एक्सपोर्टर हैं और उनके पास विशाल फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व मौजूद है। इसलिए इस बार एशिया के सामने बैंकिंग संकट का खतरा नहीं है, बल्कि सबसे बड़ा रिस्क अमेरिका से मिलने वाली डिमांड का है।
मौजूदा समय में दक्षिण कोरिया, जापान, ताइवान और सिंगापुर जैसे प्रमुख एशियाई मैन्युफैक्चरिंग हब की आर्थिक बढ़त इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर के एक्सपोर्ट पर टिकी हुई है। यह एक्सपोर्ट मुख्य रूप से उन अमेरिकी टेक कंपनियों को किया जाता है जो AI इन्फ्रास्ट्रक्चर पर पानी की तरह पैसा बहा रही हैं। अगर अमेरिका में ऊंची बॉन्ड यील्ड और बढ़ती उधारी लागत के कारण अमेरिकी कंपनियां डेटा सेंटर पर अपने खर्च में कटौती करती हैं, तो एशियाई देशों के एक्सपोर्ट इंजन को सीधा और बड़ा झटका लग सकता है। ऐसी स्थिति में तबाही किसी बैंक के डूबने से नहीं आएगी, बल्कि एशियाई सेमीकंडक्टर कंपनियों के ऑर्डर बुक में आने वाली तेज गिरावट से दिखाई देगी।
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