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4 min read | अपडेटेड May 18, 2026, 16:52 IST
सारांश
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की वैल्यू बढ़ने से पिछले हफ्ते 6.3 बिलियन डॉलर की बड़ी बढ़ोतरी हुई है। रिजर्व बैंक के पास मौजूद इस भंडार में अमेरिकी डॉलर के अलावा यूरो, पाउंड, येन और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर जैसी प्रमुख वैश्विक मुद्राएं शामिल हैं। यह भंडार देश की आर्थिक स्थिरता को मजबूत बनाता है।

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में आई बड़ी तेजी, कई वैश्विक मुद्राओं से मजबूत हुआ देश का खजाना। |
भारत की आर्थिक स्थिरता और मजबूती को लेकर एक बेहद शानदार खबर सामने आई है। पिछले हफ्ते देश के विदेशी मुद्रा भंडार में 6.3 बिलियन डॉलर की एक बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस भारी उछाल के पीछे मुख्य वजह सोने की वैल्यू में हुई बढ़ोतरी को माना जा रहा है। किसी भी देश का विदेशी मुद्रा भंडार उसकी आर्थिक मजबूती का सबसे बड़ा और विश्वसनीय संकेतक होता है। यह न केवल देश की इकोनॉमी में निवेशकों का विश्वास बनाए रखने में मदद करता है, बल्कि वैश्विक अनिश्चितता के दौर में घरेलू मुद्रा को स्थिर रखने और किसी भी बड़े वित्तीय संकट के समय इंपोर्ट यानी आयात में बड़ी सहायता प्रदान करता है। इस बड़ी बढ़त के बीच हर किसी के मन में यह सवाल उठता है कि भारत के इस खजाने में डॉलर के अलावा और कौन-कौन सी विदेशी मुद्राएं शामिल हैं और इसमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी किसकी है।
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का पूरा रखरखाव और प्रबंधन भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई द्वारा किया जाता है। इस रिजर्व बास्केट में दुनिया की कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्राएं और रिजर्व संपत्तियां शामिल की गई हैं। अगर डॉलर से अलग बात करें तो इस भंडार में मुख्य रूप से यूरो, ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग, जापानी येन और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर जैसी ताकतवर वैश्विक मुद्राएं शामिल हैं। हालांकि इस बास्केट में कई देशों की मुद्राएं मौजूद हैं, लेकिन इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार इस पूरे रिजर्व के कुल मूल्य को अमेरिकी डॉलर के रूप में ही दर्शाया और व्यक्त किया जाता है।
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा और मुख्य घटक फॉरेन करेंसी एसेट्स यानी विदेशी मुद्रा संपत्तियां हैं। पूरे रिजर्व पोर्टफोलियो में इस अकेले हिस्से का योगदान लगभग 80 पर्सेंट के आसपास है, जो देश के इस खजाने की असली रीढ़ माना जाता है। मौजूदा समय में भारत के पास विदेशी मुद्रा संपत्तियों के रूप में लगभग 552.38 बिलियन डॉलर जमा हैं। इन संपत्तियों के तहत विदेशी सरकारी सिक्योरिटीज में किया गया निवेश, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के पास रखी गई जमा राशि और प्रमुख विदेशी मुद्राओं में भारत की हिस्सेदारी शामिल होती है। चूंकि कुल खजाने में विदेशी मुद्रा संपत्तियों का हिस्सा सबसे ज्यादा है, इसलिए वैश्विक मुद्राओं के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारत के कुल रिजर्व के आंकड़ों पर दिखाई देता है।
इस पूरे विदेशी मुद्रा भंडार का दूसरा सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण घटक सोने का भंडार यानी गोल्ड रिजर्व है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, भारत के पास मौजूद इस सोने के भंडार का कुल मूल्य लगभग 120.85 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। भारतीय रिजर्व बैंक इस सोने को वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, इंफ्लेशन यानी महंगाई और करेंसी के मूल्यों में होने वाले उतार-चढ़ाव के खिलाफ एक मजबूत वित्तीय सुरक्षा कवच के रूप में अपने पास सुरक्षित रखता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने को सबसे सुरक्षित रिजर्व संपत्ति माना जाता है, क्योंकि जब भी वैश्विक वित्तीय बाजार में अस्थिरता आती है, तब अक्सर सोने की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं।
इन प्रमुख संपत्तियों के अलावा भारत के इस विशाल भंडार में स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स यानी SDR भी शामिल हैं। ये असल में अंतरराष्ट्रीय आरक्षित संपत्तियां हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने सदस्य देशों के आधिकारिक रिजर्व को मजबूत करने और सहारा देने के लिए बनाया है। यह कोई भौतिक रूप से दिखने वाली करेंसी नहीं होती है, बल्कि यह आईएमएफ के सदस्य देशों द्वारा रखी गई स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल होने वाली मुद्राओं पर एक संभावित दावे को दर्शाती है। देश किसी भी वित्तीय संकट या नकदी की भारी कमी के समय इसका आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके साथ ही भारत के भंडार में आईएमएफ के पास मौजूद रिजर्व ट्रांच पोजीशन का भी एक छोटा लेकिन बहुत जरूरी हिस्सा शामिल है। यह उस फंड या राशि को दिखाता है जिसे भारत किसी भी बड़ी आर्थिक इमरजेंसी के दौरान बिना किसी शर्त के आईएमएफ से तुरंत निकाल सकता है और वैश्विक संकट के समय अपनी जरूरतों को पूरा कर सकता है।
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