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  1. ऑफर लेटर वाली CTC और इन-हैंड सैलरी में क्या होता है अंतर? नौकरी ज्वाइन करने से पहले समझें गणित

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ऑफर लेटर वाली CTC और इन-हैंड सैलरी में क्या होता है अंतर? नौकरी ज्वाइन करने से पहले समझें गणित

Upstox

3 min read | अपडेटेड August 26, 2026, 15:05 IST

सारांश

नौकरी की शुरुआत या प्रमोशन के वक्त ऑफर लेटर में दिखने वाली सीटीसी और बैंक खाते में आने वाली नेट सैलरी में बड़ा अंतर होता है। बेसिक सैलरी, ग्रॉस सैलरी, पीएफ और टैक्स की वजह से यह बदलाव आता है। नए वेज कोड के मुताबिक बेसिक सैलरी सीटीसी की कम से कम 50% होनी चाहिए।

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सीटीसी, बेसिक सैलरी, ग्रॉस सैलरी और इन-हैंड सैलरी का पूरा गणित समझना हर कर्मचारी के लिए जरूरी है। | Image: Shutterstock.

जब भी किसी कर्मचारी को नई नौकरी मिलती है या कंपनी में प्रमोशन होता है, तो सबसे पहले उसकी नजर ऑफर लेटर पर लिखे सैलरी पैकेज यानी सीटीसी (CTC) पर जाती है। हालांकि जब महीने के आखिर में बैंक अकाउंट में पैसे आते हैं, तो वह रकम सीटीसी से काफी कम होती है। अक्सर लोग बेसिक सैलरी, ग्रॉस सैलरी और नेट इन-हैंड सैलरी के इस गणित में उलझकर रह जाते हैं। नए लेबर कोड्स के तहत किसी भी कर्मचारी की इन-हैंड सैलरी तय करने का गणित अब पूरी तरह से बदल चुका है। अगर आप भी अपनी सैलरी स्लिप देखकर कंफ्यूज होते हैं, तो आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आपकी मेहनत की कमाई के हर एक हिस्से का असली मतलब क्या होता है।

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बेसिक सैलरी पर देना चाहिए ध्यान

बेसिक सैलरी आपकी कुल सैलरी का सबसे अहम और बुनियादी हिस्सा मानी जाती है। इसमें किसी भी तरह का भत्ता या इंसेंटिव शामिल नहीं होता है। नए वेज कोड के रूल्स के अनुसार, आपकी बेसिक सैलरी आपकी कुल सीटीसी (CTC) का कम से कम 50% होना अनिवार्य है। आपकी बेसिक सैलरी जितनी साफ और सही होगी, आपका पीएफ यानी प्रॉविडेंट फंड योगदान और ग्रेच्युटी की गणना भी उसी बेसिक सैलरी के आधार पर तय की जाएगी। इसका सीधा फायदा यह होता है कि बेसिक सैलरी सही रहने से आपका रिटायरमेंट फंड उतना ही ज्यादा मजबूत बनता है।

ग्रॉस सैलरी क्या होता है?

जब आपकी बेसिक सैलरी में कंपनी की तरफ से मिलने वाले तमाम भत्ते जोड़ दिए जाते हैं, तो वह रकम ग्रॉस सैलरी बन जाती है। इसमें बेसिक सैलरी के अलावा मकान किराया भत्ता यानी एचआरए, महंगाई भत्ता यानी डीए, मेडिकल अलाउंस, ट्रैवल अलाउंस और स्पेशल अलाउंस शामिल होता है। आसान शब्दों में समझें तो किसी भी तरह के टैक्स, पीएफ या अन्य सरकारी कटौतियों से पहले जो आपकी कुल सैलरी बनती है, वही आपकी ग्रॉस सैलरी कहलाती है।

नेट सैलरी ही आपके अकाउंट में होता है क्रेडिट

नेट सैलरी ही आपकी असली इन-हैंड सैलरी कहलाती है, यानी वही रकम जो हर महीने की पहली तारीख को आपके बैंक अकाउंट में क्रेडिट होती है। इसी रकम से आप अपने घर का पूरा खर्च चलाते हैं। ग्रॉस सैलरी में से जब पीएफ का करीब 12% हिस्सा, प्रोफेशनल टैक्स और इनकम टैक्स यानी TDS जैसी जरूरी कटौतियां घटा दी जाती हैं, तो उसके बाद बची हुई रकम आपकी नेट सैलरी कहलाती है।

CTC और इन-हैंड सैलरी में क्या होता है अंतर?

कॉस्ट टू कंपनी यानी सीटीसी वह कुल खर्चा है जो कंपनी एक साल में आपके ऊपर करती है। असल में सीटीसी में आपकी ग्रॉस सैलरी के अलावा कंपनी द्वारा भरा जाने वाला पीएफ शेयर, आपका हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम, ग्रेच्युटी फंड और ऑफिस की अन्य सुविधाएं शामिल होती हैं। यही वजह है कि आपके ऑफर लेटर पर दिखने वाला सीटीसी हमेशा बड़ा होता है, जबकि सभी जरूरी कटौतियों के बाद हाथ में आने वाली नेट सैलरी उससे काफी कम होती है।

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Upstox Hindi News Desk पत्रकारों की एक टीम है जो शेयर बाजारों, अर्थव्यवस्था, वस्तुओं, नवीनतम व्यावसायिक रुझानों और व्यक्तिगत वित्त को उत्साहपूर्वक कवर करती है।

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