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  1. Old और New Tax Regime के बीच बदल रहे हैं विकल्प? पहले समझ लें ये जरूरी बातें

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Old और New Tax Regime के बीच बदल रहे हैं विकल्प? पहले समझ लें ये जरूरी बातें

Upstox

3 min read | अपडेटेड June 17, 2026, 17:32 IST

सारांश

New Tax Regime: सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए नई टैक्स व्यवस्था में रिबेट का दायरा बढ़ाया है। इसके चलते ₹12 लाख तक की आय पर प्रभावी रूप से कोई टैक्स नहीं देना पड़ता। वेतनभोगी कर्मचारियों को मिलने वाले स्टैंडर्ड डिडक्शन को जोड़ दें तो यह सीमा ₹12.75 लाख तक पहुंच जाती है।

Income Tax Rules

Income Tax Rules: पुरानी व्यवस्था में कई तरह की कर छूट उपलब्ध हैं।

ITR फाइलिंग का सीजन शुरू हो चुका है और कई टैक्सपेयर्स यह तय करने में जुटे हैं कि उनके लिए पुरानी टैक्स व्यवस्था बेहतर रहेगी या नई। नई टैक्स व्यवस्था में टैक्स की दरें तुलनात्मक रूप कम हैं, लेकिन इसमें ज्यादातर छूट और डिडक्शन का लाभ नहीं मिलता। दूसरी ओर, पुरानी व्यवस्था में कई तरह की कर छूट उपलब्ध हैं, जिससे सही विकल्प चुनना कई लोगों के लिए चुनौती बन जाता है।

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₹12 लाख तक की आय वालों के लिए नई व्यवस्था फायदेमंद

सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए नई टैक्स व्यवस्था में रिबेट का दायरा बढ़ाया है। इसके चलते ₹12 लाख तक की आय पर प्रभावी रूप से कोई टैक्स नहीं देना पड़ता। वेतनभोगी कर्मचारियों को मिलने वाले स्टैंडर्ड डिडक्शन को जोड़ दें तो यह सीमा ₹12.75 लाख तक पहुंच जाती है। ऐसे में इस आय वर्ग के अधिकांश लोगों के लिए नई टैक्स व्यवस्था एक आसान विकल्प बन गई है।

नई टैक्स व्यवस्था डिफॉल्ट सिस्टम

अब नई टैक्स व्यवस्था डिफॉल्ट सिस्टम है। इसका मतलब है कि यदि कोई कर्मचारी वित्त वर्ष के दौरान अपने नियोक्ता को किसी अन्य विकल्प की जानकारी नहीं देता, तो उसे नई व्यवस्था के तहत ही माना जाएगा।

बिजनेस या प्रोफेशन वालों को सावधानी की जरूरत

बिजनेस या प्रोफेशन से आय कमाने वाले करदाताओं के लिए टैक्स व्यवस्था बदलना इतना आसान नहीं है। एक बार किसी विशेष व्यवस्था का चयन करने के बाद उनके पास बार-बार बदलाव करने की पूरी स्वतंत्रता नहीं होती। इसलिए निर्णय लेने से पहले नियमों को अच्छी तरह समझ लेना जरूरी है।

पुरानी व्यवस्था में मिलती हैं कई टैक्स छूट

जिनकी आय अधिक है, उन्हें पुरानी व्यवस्था चुनने से पहले अपनी संभावित टैक्स बचत का आकलन करना चाहिए। इस व्यवस्था में 80C, 80CCD, 80D और होम लोन पर ब्याज जैसी कई कटौतियों का लाभ मिलता है, जो टैक्स देनदारी को काफी कम कर सकती हैं।

नई व्यवस्था में सीमित हैं डिडक्शन

नई टैक्स व्यवस्था में डिडक्शन के विकल्प बहुत कम हैं। इसमें मुख्य रूप से स्टैंडर्ड डिडक्शन, नियोक्ता के NPS योगदान से जुड़े लाभ और कुछ विशेष मामलों में होम लोन ब्याज की छूट ही उपलब्ध है। HRA समेत कई लोकप्रिय छूटों का लाभ इसमें नहीं मिलता।

ज्यादा डिडक्शन होने पर ही पुरानी व्यवस्था फायदेमंद

टैक्स एक्सपर्ट्स के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की कुल कटौतियां लगभग ₹3 लाख से ₹4 लाख या उससे अधिक हैं, तभी पुरानी व्यवस्था का लाभ नई व्यवस्था से अधिक हो सकता है। अन्यथा कम टैक्स दरों के कारण नई व्यवस्था अधिक फायदेमंद साबित हो सकती है।

दोनों व्यवस्थाओं में अलग है छूट सीमा

पुरानी टैक्स व्यवस्था में बेसिक एग्जेम्प्शन लिमिट ₹2.5 लाख है, जबकि नई व्यवस्था में यह बढ़कर ₹4 लाख है। यानी नई व्यवस्था में कर योग्य आय की गणना अपेक्षाकृत ऊंचे स्तर से शुरू होती है।

टैक्स शून्य होने पर भी रिटर्न फाइल करना जरूरी

कई लोग यह मान लेते हैं कि यदि उन पर टैक्स नहीं बनता तो ITR भरने की जरूरत नहीं है। लेकिन यदि आपकी आय निर्धारित सीमा से अधिक है, तो टैक्स देनदारी शून्य होने के बावजूद रिटर्न दाखिल करना जरूरी हो सकता है। ऐसा न करने पर भविष्य में जुर्माना या अन्य परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

लेखकों के बारे में

Upstox
Upstox Hindi News Desk पत्रकारों की एक टीम है जो शेयर बाजारों, अर्थव्यवस्था, वस्तुओं, नवीनतम व्यावसायिक रुझानों और व्यक्तिगत वित्त को उत्साहपूर्वक कवर करती है।

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