पर्सनल फाइनेंस
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4 min read | अपडेटेड April 03, 2026, 10:36 IST
सारांश
भारत में 1 अप्रैल 2026 से नए लेबर कोड लागू हो गए हैं। अब कंपनियों को कर्मचारी की कुल सैलरी (सीटीसी) का कम से कम 50 पर्सेंट हिस्सा बेसिक पे के तौर पर देना होगा। इससे आपके हाथ में आने वाली सैलरी थोड़ी कम हो सकती है, लेकिन पीएफ और ग्रेच्युटी में पहले से ज्यादा पैसा जमा होगा।

नए लेबर कोड के तहत सैलरी स्लिप में बदलाव और पीएफ कंट्रीब्यूशन बढ़ने की पूरी जानकारी।
1 अप्रैल 2026 से भारत में सैलरी मिलने और उसके कैलकुलेशन का तरीका पूरी तरह बदल गया है। यह सिर्फ एक नए फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत नहीं है, बल्कि देश में कर्मचारियों के वेतन ढांचे में एक बड़ा बदलाव है। नई लेबर कोड नियमावली लागू होने के साथ ही करोड़ों नौकरीपेशा लोगों की इस महीने की सैलरी स्लिप बदली हुई नजर आएगी। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह एक नया नियम है, जिसके तहत अब किसी भी कर्मचारी की बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ता (DA) उसकी कुल कॉस्ट टू कंपनी (CTC) का कम से कम 50 पर्सेंट होना जरूरी है। इस एक नियम ने पीएफ कंट्रीब्यूशन, ग्रेच्युटी और हाथ में आने वाली नेट सैलरी के पूरे गणित को हिलाकर रख दिया है।
पुराने सिस्टम में कंपनियां अक्सर चालाकी करती थीं और बेसिक सैलरी को कुल सीटीसी का सिर्फ 25 से 40 पर्सेंट ही रखती थीं। बाकी बचा हुआ हिस्सा अलग-अलग भत्तों या अलाउंस में डाल दिया जाता था। इससे कंपनियों को पीएफ और ग्रेच्युटी के रूप में कम पैसा देना पड़ता था। लेकिन 1 अप्रैल से यह मनमर्जी खत्म हो गई है। अब नया नियम कहता है कि आपकी बेसिक पे और डीए को मिलाकर वह कुल सीटीसी का आधा हिस्सा होना ही चाहिए। अगर आपके अलाउंस 50 पर्सेंट से ज्यादा होते हैं, तो उस एक्स्ट्रा अमाउंट को भी 'वेजेस' यानी मजदूरी का हिस्सा माना जाएगा। यह नियम आईटी सेक्टर से लेकर स्टार्टअप और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स तक सभी पर समान रूप से लागू होगा।
जब आप इस महीने अपनी सैलरी स्लिप खोलेंगे, तो आपको लगेगा कि आंकड़े इधर-उधर हो गए हैं। आपकी बेसिक सैलरी वाला हिस्सा अब पहले से ज्यादा बड़ा दिखेगा। वहीं दूसरी तरफ, एचआरए (HRA) या स्पेशल अलाउंस जैसे हिस्से पहले के मुकाबले छोटे हो जाएंगे। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि कुल सीटीसी में कोई बदलाव न हो और वह उतनी ही रहे जितनी कंपनी ने आपको ऑफर की है। असल में आपकी कुल सैलरी नहीं बदल रही है, बल्कि उस सैलरी को अलग-अलग हिस्सों में बांटने का तरीका बदल गया है। इससे एक बड़ा फायदा यह होगा कि एक ही सीटीसी पर काम करने वाले दो अलग-अलग कर्मचारियों की सैलरी का ढांचा अब लगभग एक जैसा ही नजर आएगा।
बेसिक सैलरी बढ़ने का सीधा असर आपके प्रोविडेंट फंड यानी पीएफ पर पड़ेगा। नियम के मुताबिक, कर्मचारी अपनी बेसिक सैलरी का 12 पर्सेंट पीएफ में देता है और उतनी ही रकम कंपनी भी जमा करती है। अब चूंकि बेसिक सैलरी बढ़ गई है, तो पीएफ में कटने वाला पैसा भी बढ़ जाएगा। उदाहरण के लिए, अगर किसी की बेसिक सैलरी 30,000 रुपये से बढ़कर 50,000 रुपये हो जाती है, तो उसका पीएफ कंट्रीब्यूशन 3,600 रुपये से बढ़कर सीधा 6,000 रुपये हो जाएगा। हालांकि इससे आपकी हर महीने घर ले जाने वाली सैलरी थोड़ी कम हो जाएगी, लेकिन आपके रिटायरमेंट फंड में पैसा बहुत तेजी से जमा होगा। लंबे समय में यह छोटा सा बदलाव आपको एक बहुत बड़ा फंड तैयार करने में मदद करेगा।
सैलरी स्लिप के इस बदलाव का एक और बड़ा फायदा ग्रेच्युटी के रूप में मिलेगा। आमतौर पर लोग ग्रेच्युटी पर तब ध्यान देते हैं जब वे कंपनी छोड़ते हैं। ग्रेच्युटी का कैलकुलेशन आपकी आखिरी बेसिक सैलरी के आधार पर होता है। अब जब बेसिक सैलरी पहले ही ज्यादा होगी, तो आपकी ग्रेच्युटी की रकम में भी तगड़ा इजाफा होगा। इसके अलावा नए नियमों में ग्रेच्युटी मिलने की समय सीमा को लेकर भी लचीला रुख अपनाया गया है।
यह पूरी प्रक्रिया चार नए लेबर कोड्स के जरिए लागू की गई है, जिन्होंने पुराने 29 श्रम कानूनों की जगह ली है। इनमें कोड ऑन वेजेस, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, सोशल सिक्योरिटी कोड और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी कोड शामिल हैं। सरकार का मकसद इन कानूनों को सरल बनाना और सभी सेक्टरों में एक जैसी व्यवस्था लागू करना है। हालांकि शॉर्ट टर्म में आपकी डिस्पोजेबल इनकम यानी खर्च करने के लिए उपलब्ध पैसा थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन लॉन्ग टर्म में यह आपके लिए बेहतर सोशल सिक्योरिटी और पारदर्शी सैलरी स्ट्रक्चर लेकर आया है। अब आपकी सैलरी सिर्फ वर्तमान के खर्चों को ही नहीं, बल्कि आपके फ्यूचर की जरूरतों को भी मजबूती से कवर करेगी।
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