पर्सनल फाइनेंस

4 min read | अपडेटेड March 11, 2026, 13:51 IST
सारांश
जब आप म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं, तो फंड हाउस आपका पैसा कई कंपनियों के शेयर में लगाता है। ये कंपनियां समय-समय पर डिविडेंड देती हैं। यह पैसा आपको मिलेगा या फंड में ही रहेगा, यह आपके द्वारा चुने गए ग्रोथ या IDCW प्लान पर निर्भर करता है। आज यही डीटेल में समझने वाले हैं।

म्यूचुअल फंड निवेशकों को कंपनियों से मिलने वाले डिविडेंड का फायदा सीधे या NAV के जरिए मिलता है।
जब आप किसी म्यूचुअल फंड स्कीम में पैसा लगाते हैं, तो वह फंड हाउस आपके पैसे को शेयर बाजार की अलग-अलग कंपनियों में निवेश करता है। शेयर बाजार में लिस्टेड बहुत सी कंपनियां साल में एक या दो बार अपने नेट प्रॉफिट का एक हिस्सा अपने शेयर होल्डर्स को देती हैं, जिसे डिविडेंड कहा जाता है। अब चूंकि म्यूचुअल फंड स्कीम ने उन कंपनियों के लाखों शेयर खरीदे होते हैं, इसलिए उन्हें भी बहुत बड़ी रकम डिविडेंड के तौर पर मिलती है। बहुत से निवेशकों के मन में यह सवाल आता है कि क्या फंड हाउस यह सारा पैसा खुद रख लेते हैं या फिर यह पैसा निवेशकों को वापस मिलता है। इसका सीधा जवाब यह है कि यह पैसा पूरी तरह से निवेशकों का ही होता है, लेकिन इसका इस्तेमाल कैसे होगा, यह आपके द्वारा चुने गए निवेश के ऑप्शन पर निर्भर करता है।
ग्रोथ ऑप्शन में डिविडेंड का क्या होता है?
अगर आपने म्यूचुअल फंड में 'ग्रोथ' ऑप्शन चुना है, तो आपको डिविडेंड का पैसा नगद या कैश के रूप में नहीं मिलता है। इस ऑप्शन में फंड हाउस को कंपनियों से जो भी डिविडेंड मिलता है, उसे वह वापस उसी स्कीम में निवेश कर देते हैं। इसका मतलब यह है कि आपका पैसा फिर से मार्केट में लग जाता है और इससे आपकी स्कीम की नेट एसेट वैल्यू यानी NAV बढ़ जाती है। लंबे समय में यह री-इन्वेस्टमेंट आपके पैसे पर कंपाउंडिंग का फायदा देता है। ग्रोथ ऑप्शन उन लोगों के लिए सबसे अच्छा माना जाता है जो अपनी वेल्थ को तेजी से बढ़ाना चाहते हैं और जिन्हें हर महीने या साल में पैसों की तुरंत जरुरत नहीं होती है। इसमें आपका मुनाफा जुड़ता रहता है और फ्यूचर में बड़ा फंड तैयार होता है।
म्यूचुअल फंड में एक दूसरा विकल्प होता है जिसे IDCW यानी 'इन्कम डिस्ट्रीब्यूशन कम कैपिटल विड्रॉल' कहा जाता है। पहले इसे डिविडेंड प्लान के नाम से जाना जाता था। इस प्लान में जब फंड हाउस को कंपनियों से डिविडेंड मिलता है या जब फंड को शेयरों की बिक्री से अच्छा मुनाफा होता है, तो वह उस रकम का एक हिस्सा निवेशकों को बांट सकता है। हालांकि, यह पूरी तरह से फंड हाउस के फैसले पर निर्भर करता है कि वह कब और कितना पैसा बांटेगा। इसमें निवेशक के पास दो रास्ते होते हैं, या तो वह उस पैसे को अपने बैंक खाते में ले ले जिसे पे-आउट कहते हैं, या फिर उस पैसे से उसी स्कीम की और यूनिट्स खरीद ले जिसे री-इन्वेस्टमेंट कहा जाता है।
कई लोगों को लगता है कि फंड हाउस इस डिविडेंड के पैसे से अपना खर्चा चलाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। सेबी के नियमों के मुताबिक, फंड हाउस अपनी फीस और मैनेजमेंट का खर्चा 'एक्सपेंस रेशियो' के जरिए वसूलते हैं। कंपनियों से मिलने वाला हर एक रुपया निवेशकों के फंड का हिस्सा होता है। फंड हाउस इस पैसे को अपने पास पर्सनल प्रॉफिट के तौर पर नहीं रख सकते। वह इसे या तो स्कीम की एसेट में जोड़ देते हैं या फिर निवेशकों को बांट देते हैं। यह पैसा स्कीम के पोर्टफोलियो की वैल्यू को बढ़ाता है और अंत में इसका फायदा निवेशकों को ही मिलता है।
यह समझना भी बहुत जरूरी है कि डिविडेंड से होने वाली इस कमाई पर टैक्स के नियम क्या हैं। 2026 के मौजूदा नियमों के हिसाब से, अगर आप IDCW प्लान में डिविडेंड लेते हैं, तो यह आपकी सालाना इनकम में जुड़ जाता है और आपको अपने टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स देना पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ, ग्रोथ प्लान में जब तक आप अपनी यूनिट्स नहीं बेचते, तब तक आपको कोई टैक्स नहीं देना होता।
संबंधित समाचार
लेखकों के बारे में

अगला लेख
Municipal Bonds vs Government Bonds
What is Viksit Bharat - Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin) Act (VB-G RAM G)?
Overdraft Loan vs Personal Loan
Explore Learning Centre
All topics · stocks, MFs, derivatives, IPOs