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4 min read | अपडेटेड March 11, 2026, 12:40 IST
सारांश
भारत सरकार ने चीन समेत पड़ोसी देशों के लिए विदेशी निवेश (FDI) के नियमों में बड़ी राहत दी है। अब 10 पर्सेंट तक की हिस्सेदारी वाले निवेश के लिए सरकारी मंजूरी की जरुरत नहीं होगी। इस फैसले का मकसद देश को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना और इलेक्ट्रॉनिक सामानों की उत्पादन लागत को कम करना है।

फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट
भारत सरकार ने पड़ोसी देशों से आने वाले विदेशी निवेश यानी FDI के नियमों को लेकर एक बहुत बड़ा और अहम फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में हुई कैबिनेट की बैठक में यह तय किया गया है कि चीन और भारत की सीमा से लगे अन्य देशों के लिए निवेश के नियमों में ढील दी जाएगी। सरकार का मानना है कि इस कदम से न केवल देश में ज्यादा पैसा आएगा, बल्कि नई टेक्नोलॉजी भी भारत पहुंचेगी। इससे भारत को दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के सपने को पूरा करने में बड़ी मदद मिलेगी।
अगर हम बदलाव की बात करें, तो सरकार ने साल 2020 के उस नियम में सुधार किया है जिसे 'प्रेस नोट 3' के नाम से जाना जाता है। पहले का नियम काफी कड़ा था, जिसमें कहा गया था कि अगर भारत की सीमा से सटे किसी भी देश की कंपनी भारत में एक शेयर भी खरीदना चाहती है, तो उसे सरकार से अनिवार्य तौर पर मंजूरी लेनी होगी। लेकिन अब नए नियमों के मुताबिक, अगर चीन या किसी अन्य पड़ोसी देश की कंपनी की किसी विदेशी फर्म में 10 पर्सेंट तक की हिस्सेदारी है और वह कंपनी को कंट्रोल नहीं कर रही है, तो वह बिना सरकारी मंजूरी के ऑटोमैटिक रूट से भारत में निवेश कर सकेगी। हालांकि, इसके लिए कुछ शर्तें भी रखी गई हैं, जैसे कि निवेश की जानकारी पहले से ही संबंधित विभाग को देनी होगी।
सरकार ने इस फैसले में कुछ खास सेक्टरों पर ज्यादा ध्यान दिया है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, भारी मशीनरी, इंडस्ट्रियल इक्विपमेंट और सोलर जैसे सेक्टर शामिल हैं। इन क्षेत्रों में आने वाले निवेश के प्रस्तावों को अब सिर्फ 60 दिनों के भीतर मंजूरी देने की व्यवस्था की गई है। सरकार चाहती है कि इन अहम सेक्टरों में काम तेजी से आगे बढ़े। हालांकि, सुरक्षा के लिहाज से यह शर्त भी रखी गई है कि कंपनी में बहुमत हिस्सेदारी और पूरा कंट्रोल भारतीय नागरिकों या भारतीय कंपनियों के पास ही रहना चाहिए। इससे देश की सुरक्षा और विदेशी निवेश के बीच एक बैलेंस बनाने की कोशिश की गई है।
बता दें कि पिछले कुछ समय से भारतीय इंडस्ट्री, खासकर इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर, सप्लाई के बड़े संकट से जूझ रहा था। मोबाइल और लैपटॉप बनाने वाली कंपनियों को जरूरी पार्ट्स यानी पुर्जे चीन से मंगवाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। इससे प्रोडक्शन की लागत बढ़ रही थी और कंपनियां अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही थीं। इस बीच जब इजरायल-ईरान युद्ध के चलते ऑयल का सप्लाई संकट सामने आया तो उसने इस मोर्चे पर भी वापस से सरकार को सोचने के लिए मजबूर किया, और सरकार ने महसूस किया कि अगर भारत को 'मेक इन इंडिया' के तहत ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनना है, तो उसे पड़ोसी देशों से आने वाली टेक्नोलॉजी और कैपिटल को नहीं रोकना चाहिए।
इस फैसले का सबसे सीधा और बड़ा असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। दरअसल, भारत में मोबाइल और लैपटॉप के कई पुर्जे चीन से मंगवाए जाते हैं। अभी तक इन कंपनियों के लिए भारत में निवेश करना और प्लांट लगाना बहुत मुश्किल था। अब नियमों में ढील मिलने से चीनी कंपनियां भारत में अपनी फैक्ट्रियां लगा सकेंगी। जब मोबाइल और लैपटॉप के पार्ट्स भारत में ही बनने लगेंगे, तो उनकी उत्पादन लागत यानी प्रोडक्शन कॉस्ट कम हो जाएगी। इससे बाहर से सामान मंगाने पर निर्भरता कम होगी और बाजार में कंपटीशन बढ़ने से गैजेट्स की कीमतों में गिरावट आ सकती है। आने वाले समय में इलेक्ट्रॉनिक सामान सस्ते होने की पूरी उम्मीद है।
जब विदेशी कंपनियां भारत में अपने प्लांट लगाएंगी, तो इससे रोजगार के लाखों नए मौके पैदा होंगे। एक्सपर्ट्स का कहना है कि नए निवेश से न केवल फैक्ट्रियां लगेंगी, बल्कि सप्लाई चेन भी मजबूत होगी। इससे भारत का ग्लोबल मार्केट में हिस्सा बढ़ेगा और देश एक्सपोर्ट के मामले में एक बड़ी ताकत बनकर उभरेगा। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो अप्रैल 2000 से दिसंबर 2025 तक भारत में 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का FDI आ चुका है। हालांकि इसमें चीन का हिस्सा सिर्फ 0.32 पर्सेंट ही रहा है। लेकिन अब नए नियमों से यह तस्वीर बदल सकती है। भले ही चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 92 अरब डॉलर के आसपास है, लेकिन निवेश बढ़ने से देश की अर्थव्यवस्था को लॉन्ग टर्म में फायदा पहुंचने की उम्मीद है।
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