return to news
  1. फॉर्म 95 और 109 की जगह लाए गए फॉर्म 188 किसके लिए है जरूरी? यहां समझें पूरी डीटेल

पर्सनल फाइनेंस

फॉर्म 95 और 109 की जगह लाए गए फॉर्म 188 किसके लिए है जरूरी? यहां समझें पूरी डीटेल

विकास तिवारी

4 min read | अपडेटेड April 28, 2026, 16:20 IST

सारांश

इनकम टैक्स विभाग ने टैक्स नियमों को आसान बनाने के लिए नए इनकम टैक्स रूल्स 2026 लागू किए हैं। इसके तहत पुराने नियम 95 और 109 की जगह अब नया फॉर्म 188 लाया गया है। यह फॉर्म मुख्य रूप से ग्रेच्युटी और सुपरएन्युएशन फंड की मंजूरी के लिए जरूरी है।

इनकम टैक्स

इनकम टैक्स के नए नियमों के तहत अब डिजिटल और आसान फॉर्म 188 से मिलेगी फंड अप्रूवल की सुविधा।

भारत सरकार ने टैक्स सिस्टम को और भी पारदर्शी और सरल बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। इनकम टैक्स रूल्स 2026 के लागू होने के साथ ही कई पुराने और पेचीदा नियमों को खत्म कर दिया गया है। इसी कड़ी में अब 'फॉर्म 188' की एंट्री हुई है। यह नया फॉर्म उन पुराने टैक्स नियमों की जगह ले रहा है जो दशकों से चले आ रहे थे। अगर आप किसी बिजनेस का हिस्सा हैं या किसी ट्रस्ट से जुड़े हैं जो कर्मचारियों के रिटायरमेंट फंड को संभालता है, तो आपको इस बदलाव के बारे में विस्तार से जान लेना चाहिए।

Open FREE Demat Account within minutes!
Join now

क्या है नया फॉर्म 188 और यह क्यों आया?

इनकम टैक्स विभाग ने पुराने नियमों यानी रूल 95 और रूल 109 को अब इतिहास बना दिया है। पहले जब भी किसी कंपनी को अपने कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी फंड या सुपरएन्युएशन फंड की मंजूरी लेनी होती थी, तो उसे इन पुराने नियमों के तहत लंबी और लिखित प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। ये नियम काफी पेचीदा थे और इनमें जानकारी देने का कोई तय फॉर्मेट नहीं था। अब विभाग ने इन दोनों पुराने नियमों को एक साथ जोड़कर एक एकल 'कंसोलिडेटेड' फॉर्म 188 तैयार किया है। अब ग्रेच्युटी और सुपरएन्युएशन फंड दोनों की मंजूरी के लिए बस यही एक फॉर्म काम आएगा।

किसे भरना होगा यह फॉर्म?

यह समझना बहुत जरूरी है कि फॉर्म 188 हर साधारण टैक्सपेयर के लिए नहीं है। यह विशेष रूप से उन फंड्स के ट्रस्टियों के लिए है जो कर्मचारियों के हित में बनाए गए हैं। चूंकि कोई भी फंड अपने आप में एक अलग पहचान रखता है, इसलिए इसे भरने की जिम्मेदारी सीधे तौर पर मालिक या एम्प्लॉयर की नहीं, बल्कि उस फंड को चलाने वाले ट्रस्टियों की होती है。 अगर कोई नई कंपनी अपना ग्रेच्युटी फंड शुरू करना चाहती है या किसी पुराने फंड के लिए शुरुआती मंजूरी लेना चाहती है, तो उसे इस फॉर्म का इस्तेमाल करना होगा। अच्छी बात यह है कि यह फॉर्म सिर्फ एक बार ही भरना होता है, इसे हर साल भरने की जरूरत नहीं है।

पुराने समय में इन फंड्स की मंजूरी के लिए फाइलें इधर-उधर घूमती रहती थीं, लेकिन अब फॉर्म 188 के साथ पूरा सिस्टम ऑनलाइन हो गया है। अब ट्रस्टी इनकम टैक्स विभाग के ई-फाइलिंग पोर्टल पर जाकर सीधे इस फॉर्म को भर सकते हैं। इसमें कंपनी की पूरी जानकारी, फंड का पैन नंबर और निवेश का तरीका जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां देनी होती हैं। पोर्टल पर इस फॉर्म को भरने के लिए डिजिटल सिग्नेचर यानी डीएससी की भी जरूरत पड़ सकती है ताकि सुरक्षा और प्रमाणिकता बनी रहे। विभाग का मानना है कि इस नई व्यवस्था से काम की रफ्तार बढ़ेगी और पारदर्शिता भी आएगी।

पुराने नियमों के मुकाबले क्या बदला?

पुराने नियमों यानी रूल 95 और 109 में जानकारी देने का तरीका बहुत बिखरा हुआ था। फॉर्म 188 ने इस पूरी प्रक्रिया को एक नया ढांचा दे दिया है। अब एक ही फॉर्म में फंड के कॉर्पस, कर्मचारियों की संख्या और फंड के खातों के रखरखाव की जगह जैसी सभी डीटेल्स एक ही जगह मिल जाती हैं。 यह बदलाव सरकार के उस विजन का हिस्सा है जिसमें वह चाहती है कि आने वाले फ्यूचर में टैक्स से जुड़े सभी काम बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के डिजिटल तरीके से पूरे हों। इस नए फॉर्म के आने से अब गलतियों की गुंजाइश कम हो गई है और डेटा को ट्रैक करना भी आसान हो गया है।

इस बदलाव से कंपनियों के कंप्लायंस का बोझ कम होगा। पहले दो अलग-अलग फंड्स के लिए अलग-अलग प्रक्रियाएं अपनानी पड़ती थीं, लेकिन अब एक ही कंसोलिडेटेड फॉर्म होने से समय की काफी बचत होगी। हालांकि, ट्रस्टियों को अब और भी ज्यादा सावधान रहना होगा क्योंकि ऑनलाइन सिस्टम में जानकारी भरते वक्त पर्सेंट और आंकड़ों का सही होना बेहद जरूरी है।

लेखकों के बारे में

विकास तिवारी
Vikash Tiwary is a finance journalist with 6+ years of newsroom experience. He is currently growing Upstox Hindi, crafting data-driven stories on stocks, personal finance, mutual funds, and global markets, while exploring how AI can simplify finance. His work spans Zee Business, TV9 Bharatvarsh, ABP News, India TV, and Inshorts. He also holds NISM certification.

अगला लेख