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4 min read | अपडेटेड April 28, 2026, 07:53 IST
सारांश
भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India, RBI) ने सोमवार को कैपिटल चार्ज पर अंतिम दिशानिर्देशों में पर्सनल लोन रिस्क की सीमा को 7.5 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये कर दिया। इसके बाद अब इतनी राशि तक के पर्सनल लोन कम जोखिम भार का फायदा उठा सकेंगे।

आरबीआई ने बदल डाले कौन-कौन से नियम?
भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India, RBI) ने सोमवार को कैपिटल चार्ज पर अंतिम दिशानिर्देशों में पर्सनल लोन रिस्क की सीमा को 7.5 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये कर दिया। इसके बाद अब इतनी राशि तक के पर्सनल लोन कम जोखिम भार का फायदा उठा सकेंगे। केंद्रीय बैंक ने सोमवार को जारी 'बेसल -3 पर अंतिम निर्देश - मानकीकृत दृष्टिकोण के तहत कर्ज जोखिम (क्रेडिट रिस्क) के लिए कैपिटल चार्ज' मानदंडों में कहा कि अक्टूबर में मसौदा जारी होने के बाद उसे व्यक्तिगत काउंटरपार्टी के अधिकतम कुल क्रेडिट रिस्क लिमिट को बढ़ाने के अनुरोध मिल थे, ताकि उन्हें 'नियामक खुदरा' के रूप में वर्गीकृत किया जा सके।
इस सुझाव को स्वीकार करते हुए आरबीआई ने कहा, 'अन्य पात्रता मानदंडों को पूरा करने के अधीन, नियामक खुदरा के रूप में वर्गीकरण के लिए पात्र जोखिम राशि की सीमा बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये कर दी गई है।' संशोधित ढांचा 1 अप्रैल, 2027 से लागू होगा और इसके तहत बड़े बिना रेटिंग वाले कॉरपोरेट और एनबीएफसी (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी) जोखिम के लिए भी सीमा को पहले प्रस्तावित 200 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये कर दिया गया है।
इसके अलावा आरबीआई ने सोमवार को बैंकों को निर्देश दिया कि वे रुपये से जुड़े सभी ‘ओवर-द-काउंटर’ (ओटीसी) विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों की जानकारी भारतीय समाशोधन निगम के ट्रेड रिपॉजिटरी में दर्ज कराएं। डेरिवेटिव बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से केंद्रीय बैंक ने ‘अधिकृत डीलर कैटेगरी-1 बैंकों’ के लिए रिपोर्टिंग संबंधी निर्देश जारी किए हैं।
ओटीसी डेरिवेटिव वे वित्तीय सौदे होते हैं, जो शेयर मार्केट के बजाय सीधे दो पक्षों के बीच किए जाते हैं और इनमें इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लैटफॉर्म पर होने वाले सौदे भी शामिल होते हैं। आरबीआई ने एक सर्कुलर में कहा कि अधिकृत डीलर कैटेगरी-1 बैंकों को अपने विदेशी संबद्ध पक्षों द्वारा किए गए रुपये से जुड़े सभी डेरिवेटिव सौदों की जानकारी देनी होगी, चाहे उनमें वास्तविक मुद्रा की डिलीवरी हो या सिर्फ नकद निपटान हुआ हो।
हालांकि बैंकों को कुछ लचीलापन भी दिया गया है। अब 10 लाख अमेरिकी डॉलर (या समकक्ष) तक के सौदों, बैक-टू-बैक व्यवस्था के तहत किए गए लेनदेन और भारत में अन्य अधिकृत डीलर कैटेगरी-1 बैंकों के साथ संबद्ध पक्षों द्वारा किए गए सौदों की जानकारी देना जरूरी नहीं होगा। केंद्रीय बैंक ने रिपोर्टिंग के लिए चरणबद्ध रूपरेखा भी तय की है। 1 जुलाई 2027 से बैंकों को अपनी मूल कंपनी और उसकी शाखाओं द्वारा किए गए सभी ऐसे सौदों की रिपोर्टिंग करनी होगी। अन्य संबद्ध पक्षों के लिए रिपोर्टिंग कवरेज जुलाई 2027 तक 70%, जनवरी 2028 तक 80% और जुलाई 2028 तक 100% तक पहुंचाना होगा। सर्कुलर के मुताबिक, लेनदेन की रिपोर्टिंग प्राथमिकता के आधार पर उसी दिन की जानी चाहिए, लेकिन हर हाल में यह जानकारी दो वर्किंग डे के भीतर देनी होगी।
आरबीआई ने सोमवार को अपेक्षित ऋण हानि (Expected Credit Loss, ECL) आधारित प्रावधान को अपनाने के लिए और अधिक समय देने की याचिकाओं को खारिज कर दिया। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया कि नई प्रणाली अगले साल 1 अप्रैल से लागू की जाएगी। आरबीआई ने कमर्शियल बैंकों के लिए संपत्ति वर्गीकरण, प्रावधान और आय की पहचान पर निर्देश में कहा कि बैंकों ने सुझाव दिया था कि उन्हें डेटाबेस और मॉडल बनाने तथा सिस्टम में जरूरी बदलाव करने के लिए और समय चाहिए।
आरबीआई ने 7 अक्टूबर, 2025 को पहली बार जारी किए गए मसौदे पर मिले इस सुझाव को अस्वीकार करते हुए कहा, 'बैंकों को नए ढांचे के कार्यान्वयन के लिए अपने आंतरिक व्यवस्था तैयार करने के लिए एक साल की समयसीमा दी गई है।' इस समय बैंक किसी संपत्ति पर नुकसान होने के बाद प्रावधान करते हैं, जबकि ईसीएल के तहत वे कहीं अधिक सक्रिय प्रणाली की ओर बढ़ेंगे। माना जा रहा है कि इससे बैंकिंग प्रणाली में प्रावधान बढ़ जाएंगे। केंद्रीय बैंक ने सोमवार को यह भी कहा कि उसने ईसीएल के बदलाव को आसान बनाने के लिए कुछ उपाय किए हैं। इनमें ईसीएल को अपनाने के कारण पूंजी पर पड़ने वाले एकमुश्त प्रभाव के लिए व्यवस्था, पुराने ऋण खातों पर प्रभावी ब्याज दर (ईआईआर) लागू करने के लिए तीन साल की समयसीमा और प्रमुख कार्यान्वयन मुद्दों पर मार्गदर्शन शामिल है।
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