पर्सनल फाइनेंस
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4 min read | अपडेटेड June 10, 2026, 12:06 IST
सारांश
देश के चार प्रमुख म्यूचुअल फंड हाउसेज ने सोने से जुड़ी स्कीमों में 25 करोड़ रुपये से अधिक के बड़े संस्थागत निवेश को सीमित कर दिया है। सरकार द्वारा सोने पर प्रभावी इम्पोर्ट ड्यूटी को बढ़ाकर 15 पर्सेंट करने और बढ़ते इम्पोर्ट के बीच यह कदम उठाया गया है। आम निवेशकों के लिए ट्रेडिंग और पैसा निकालना पहले की तरह चालू रहेगा।

गोल्ड ईटीएफ में बड़े निवेश पर लगी पाबंदी के बीच रिटेल निवेशकों के लिए बड़ी खबर। | Image: Shutterstock
शेयर बाजार में इस समय गोल्ड ETF और सोने से जुड़े फंड्स को लेकर निवेशकों के बीच काफी चर्चा और कंफ्यूजन बना हुआ है। हाल ही में देश के चार बड़े म्यूचुअल फंड हाउसेज ने गोल्ड स्कीमों में नए निवेश को लेकर कुछ नए कदम उठाए हैं, जिससे आम रिटेल निवेशकों को लग रहा है कि उनके निवेश पर रोक लगाई जा रही है। लेकिन बाजार के जानकारों और एक्सपर्ट्स का कहना है कि निवेशकों को इस खबर से घबराने की कोई जरूरत नहीं है। यह पाबंदी आम जनता के लिए नहीं बल्कि बहुत बड़े संस्थागत निवेश यानी बड़े इनफ्लो को मैनेज करने के लिए लगाई गई है। यह फंड हाउसेज द्वारा किया गया एक ऑपरेशनल कंट्रोल है, जिससे रिटेल निवेशकों का कोई नुकसान नहीं होगा।
मार्केट में बढ़ते व्यापक आर्थिक और बाजार के दबावों को देखते हुए एचडीएफसी म्यूचुअल फंड, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड, निप्पॉन इंडिया म्यूचुअल फंड और टाटा एएमसी ने अपने गोल्ड ETF और फंड ऑफ फंड्स (FOF) में 25 करोड़ रुपये से अधिक के डायरेक्ट सब्सक्रिप्शन पर रोक लगा दी है। टाटा AMC ने बताया है कि व्यापक आर्थिक और मार्केट की स्थितियों को देखते हुए यह अस्थाई फैसला लिया गया है जो आगे के नोटिस तक लागू रहेगा। इसके अलावा एचडीएफसी, निप्पॉन इंडिया और टाटा एएमसी ने अपने गोल्ड फंड ऑफ फंड्स में प्रति पैन कार्ड हर महीने 10 लाख रुपये से ऊपर के एकमुश्त यानी लंपसम या स्विच-इन निवेश को भी सीमित कर दिया है। ये सभी नियम जून के पहले हफ्ते से पूरी तरह लागू हो चुके हैं।
ऑप्टिमा मनी मैनेजर्स के MD और CEO पंकज मठपाल ने इस मामले को साफ करते हुए बताया है कि रिटेल निवेशकों पर इसका कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा। उनका कहना है कि निवेशकों को बिल्कुल भी चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उनका पुराना निवेश पूरी तरह सुरक्षित है। आम लोगों की मंथली एसआईपी बिना किसी रुकावट के चलती रहेगी। इसके साथ ही जब भी निवेशक अपना पैसा निकालना चाहें, तो वे बिना किसी पाबंदी के रिडेंप्शन कर सकते हैं। यह कदम सिर्फ फंड हाउसेज द्वारा बड़ी लिक्विटी को मैनेज करने के लिए उठाया गया है। वैल्यू कर्व फाइनेंशियल सर्विसेज के पार्टनर रोनक मोरजारिया का भी मानना है कि इस कदम को लेकर मार्केट में गलतफहमी फैल गई है। यह निवेशकों के आने-जाने पर रोक नहीं है, बल्कि एएमसी लेवल पर बहुत बड़े ट्रांजैक्शन को कंट्रोल करना है।
रोनक मोरजारिया ने यह भी साफ किया है कि स्टॉक एक्सचेंज पर गोल्ड ETF की सेकंडरी मार्केट ट्रेडिंग पूरी तरह सामान्य रूप से चलती रहेगी। इसका मतलब है कि आम लोग जब चाहें तब एक्सचेंज पर जाकर गोल्ड ETF के यूनिट्स को आसानी से खरीद और बेच सकते हैं। इसके अलावा अगर कोई निवेशक सोना खरीदना ही चाहता है तो उसके पास कई दूसरे फंड हाउसेज या ईटीएफ का विकल्प भी खुला हुआ है। इसलिए इस खबर को लेकर किसी भी तरह के पैनिक या हड़बड़ी की कोई जरूरत नहीं है।
म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि फंड हाउसेज को यह कदम देश के बढ़ते आर्थिक दबावों के कारण उठाना पड़ा है। भारत में सोने का इम्पोर्ट लगातार बढ़ रहा है। इसी स्थिति को देखते हुए सरकार ने सोने पर प्रभावी इम्पोर्ट ड्यूटी को बढ़ाकर 15 पर्सेंट कर दिया है। इसी वजह से एएमसी कंपनियों ने सोने में बड़े संस्थागत इनफ्लो को सीमित करने का फैसला किया है ताकि वे फंड को सही तरीके से मैनेज कर सकें। यह केवल बड़े पैसों के इनफ्लो को मैनेज करने का तरीका है, न कि निवेश को रोकने का स्ट्रक्चरल बदलाव।
सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर श्वेता शास्त्री का कहना है कि हालिया पाबंदियों से बाजार में गैर जरूरी चिंता पैदा हो गई है, जबकि आम निवेशकों के लिए कुछ भी नहीं बदला है। उन्होंने सलाह दी है कि निवेशकों को शॉर्ट टर्म खबरों पर ध्यान देने के बजाय अपने एसेट एलोकेशन पर फोकस करना चाहिए। उनके अनुसार सोने को पोर्टफोलियो में मुख्य रिटर्न देने वाले साधन के बजाय स्थिरता देने वाले माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए। आम तौर पर अपने पूरे पोर्टफोलियो का 5 पर्सेंट से 10 पर्सेंट हिस्सा सोने में लगाना काफी होता है। लॉन्ग टर्म में वेल्थ क्रिएशन के लिए ग्रोथ के लिहाज से इक्विटी और स्थिरता के लिए डेट फंड ही मुख्य इंजन होते हैं। सोना केवल मार्केट में उतार-चढ़ाव के समय आपके निवेश को बैलेंस और सुरक्षा देने का काम करता है।
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