पर्सनल फाइनेंस
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4 min read | अपडेटेड May 15, 2026, 15:04 IST
सारांश
महंगे इलाज और लगातार बढ़ती प्रीमियम के बीच हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी ग्राहकों के लिए राहत बनकर आई है। इसके जरिए आप अपनी पुरानी पॉलिसी के वेटिंग पीरियड का फायदा बरकरार रखते हुए नई कंपनी में शिफ्ट हो सकते हैं। इससे न सिर्फ पैसों की बचत होती है, बल्कि आपको बेहतर सर्विस और कवरेज भी मिल सकता है।

हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी के जरिए अपनी पॉलिसी को बेहतर बनाने का आसान तरीका। Image: Shutterstock
आज के दौर में जिस तरह से मेडिकल खर्च और इलाज की कीमतें बढ़ रही हैं, उसे देखते हुए हेल्थ इंश्योरेंस लेना अब जरूरत बन गया है। हर कोई अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए अच्छी पॉलिसी लेना चाहता है। हाल ही में सरकार ने इंश्योरेंस प्रीमियम पर जीएसटी की दर को जीरो करने का बड़ा ऐलान किया था, लेकिन हकीकत यह है कि इसका कोई खास फायदा आम पॉलिसी होल्डर्स को नहीं मिला है। इंश्योरेंस कंपनियों ने प्रीमियम की दरों में कोई बड़ी कटौती नहीं की है। साल दर साल बढ़ती प्रीमियम की वजह से अब बहुत से लोग या तो अपनी पॉलिसी सरेंडर कर रहे हैं या फिर किसी ऐसी कंपनी की तलाश में हैं जो कम पैसों में बेहतर सुविधा दे सके। ऐसे में हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी आपके लिए एक शानदार विकल्प साबित हो सकता है।
हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी एक ऐसी सुविधा है जो आपको अपनी मौजूदा बीमा कंपनी को छोड़कर किसी दूसरी कंपनी के पास जाने की इजाजत देती है। सबसे अच्छी बात यह है कि ऐसा करने पर आपकी पुरानी पॉलिसी के तहत मिलने वाले फायदे खत्म नहीं होते हैं। भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण यानी IRDAI के नियमों के मुताबिक, ग्राहक अपनी पसंद की कंपनी चुन सकते हैं और अपनी पुरानी पॉलिसी के क्रेडिट को नई कंपनी में ले जा सकते हैं। यह प्रक्रिया बिल्कुल वैसी ही है जैसे आप अपना मोबाइल नंबर पोर्ट कराते हैं। इससे ग्राहकों को बेहतर सर्विस और कॉम्पिटिटिव प्रीमियम का चुनाव करने की आजादी मिलती है।
आमतौर पर जब आप कोई नई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेते हैं, तो पहले से मौजूद बीमारियों यानी प्री-एग्जिस्टिंग डिसीज के लिए आपको दो से चार साल का वेटिंग पीरियड पूरा करना होता है। लेकिन पोर्टेबिलिटी का सबसे बड़ा फायदा यही है कि आपका पुराना वेटिंग पीरियड बेकार नहीं जाता। मान लीजिए कि आपने अपनी पुरानी कंपनी में किसी बीमारी के लिए तीन साल का वेटिंग पीरियड पूरा कर लिया है, तो नई कंपनी में जाने पर आपको वह समय फिर से नहीं गुजारना होगा। वह तीन साल का क्रेडिट आपकी नई पॉलिसी में जुड़ जाएगा। हालांकि, यह नियम सिर्फ आपकी पुरानी पॉलिसी की बीमित राशि यानी सम इंश्योर्ड तक ही लागू होता है। अगर आप नई कंपनी में जाकर अपना कवर बढ़ाते हैं, तो बढ़ी हुई राशि पर आपको नए सिरे से वेटिंग पीरियड पूरा करना पड़ सकता है।
हालांकि पोर्टेबिलिटी के कई फायदे हैं, लेकिन कुछ चीजें ऐसी भी हैं जो ट्रांसफर नहीं होतीं। जब आप अपनी पॉलिसी को पोर्ट करते हैं, तो पुरानी कंपनी में जमा हुआ आपका नो क्लेम बोनस, कोई खास ऐड-ऑन कवर या पॉलिसी के विशेष फायदे नई कंपनी में नहीं जाते हैं। इसके अलावा, पोर्टेबिलिटी की सुविधा आप साल के किसी भी समय नहीं ले सकते। आपको अपनी मौजूदा पॉलिसी खत्म होने से कम से कम 45 दिन पहले इसके लिए अप्लाई करना होता है। अगर आप यह समय सीमा चूक जाते हैं, तो हो सकता है कि नई कंपनी आपकी पोर्टेबिलिटी की रिक्वेस्ट को स्वीकार न करे। इसलिए सही समय पर फैसला लेना बहुत जरूरी है ताकि आपके फ्यूचर के प्लान सुरक्षित रहें।
अगर आपने अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी को किसी दूसरी कंपनी में ट्रांसफर करने का मन बना लिया है, तो आपको कुछ कागजी कार्रवाई के लिए तैयार रहना चाहिए। इसके लिए आपके पास अपनी मौजूदा पॉलिसी की कॉपी, पिछले सालों की क्लेम हिस्ट्री और अगर आप कभी अस्पताल में भर्ती हुए हैं तो उसकी डिस्चार्ज समरी तैयार होनी चाहिए। नई बीमा कंपनी इन दस्तावेजों की जांच करेगी और आपके रिस्क प्रोफाइल को समझने के बाद ही पोर्टेबिलिटी को मंजूरी देगी। इस प्रक्रिया के सही इंप्लिमेंटेशन से आप हर साल प्रीमियम में 10 से 20 पर्सेंट तक की बचत कर सकते हैं और आपको बेहतर अस्पताल नेटवर्क और क्लेम सेटलमेंट की सुविधा भी मिल सकती है।
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