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4 min read | अपडेटेड July 03, 2026, 14:16 IST
सारांश
केंद्र सरकार ने नई अधिसूचित 'कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) स्कीम, 2026' के तहत पीएफ योगदान को लेकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जारी किया है। नए नियमों के अनुसार, अब किसी भी कर्मचारी के लिए हर महीने 1,800 रुपये से अधिक का भविष्य निधि योगदान करना अनिवार्य नहीं होगा, बल्कि इसे पूरी तरह से स्वैच्छिक (Voluntary) माना जाएगा।

ईपीएफ स्कीम 2026 के तहत पीएफ कॉन्ट्रीब्यूशन के नियमों में किया गया बड़ा प्रशासनिक बदलाव।
केंद्र सरकार ने देश के करोड़ों नौकरीपेशा कर्मचारियों के भविष्य निधि योगदान से जुड़े नियमों में एक बड़ा बदलाव करते हुए 'कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) स्कीम, 2026' को आधिकारिक तौर पर अधिसूचित कर दिया है। सरकार की तरफ से जारी नए दिशानिर्देशों के अनुसार, अब किसी भी कर्मचारी के लिए हर महीने 1,800 रुपये से अधिक का पीएफ योगदान करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं होगा, बल्कि इसके ऊपर की पूरी राशि को पूरी तरह से स्वैच्छिक (Voluntary) माना जाएगा। PTI की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह नया बदलाव दशकों पुरानी ईपीएफ स्कीम 1952 की जगह लेने जा रहा है, जिसे नए सामाजिक सुरक्षा संहिता (Code on Social Security), 2020 के प्रावधानों के तहत तैयार किया गया है। हालांकि, सरकार ने साफ किया है कि अनिवार्य ईपीएफ योगदान के मूल ढांचे में कोई कटौती नहीं की गई है।
नए नियमों के तहत अनिवार्य पीएफ योगदान की गणना के कानूनी गणित को बेहद साफ और पारदर्शी कर दिया गया है। वर्तमान में ईपीएफ कानून के तहत वैधानिक मासिक वेतन सीमा यानी वेज सीलिंग 15,000 रुपये तय है। इस तय सीमा तक कर्मचारी और नियोक्ता (Employer) दोनों के लिए अपनी-अपनी तरफ से 12-12 पर्सेंट का योगदान करना कानूनी रूप से पूरी तरह अनिवार्य होता है। इस प्रकार 15,000 रुपये का 12 पर्सेंट अधिकतम 1,800 रुपये प्रति माह बैठता है। सरकार ने अब नए नोटिफिकेशन में स्पष्ट कर दिया है कि केवल यही 1,800 रुपये का मासिक योगदान अनिवार्य श्रेणी में आएगा, और यदि कोई कर्मचारी या कंपनी इससे अधिक की राशि फंड में जमा करती है, तो उसे अनिवार्य न मानकर पूरी तरह से स्वैच्छिक योगदान का दर्जा दिया जाएगा।
इस नए प्रशासनिक स्पष्टीकरण का सबसे बड़ा और सीधा असर कंपनियों या नियोक्ताओं द्वारा किए जाने वाले पीएफ योगदान पर पड़ने वाला है। नए नियमों के मुताबिक, नियोक्ता कानूनी रूप से केवल निर्धारित अनिवार्य सीमा यानी 1,800 रुपये प्रति माह तक ही योगदान करने के लिए बाध्य हैं। यदि कोई कर्मचारी अपनी इच्छा से 1,800 रुपये से ज्यादा का स्वैच्छिक योगदान करने का विकल्प चुनता है, तो कंपनी उसके आधार पर अपना योगदान बढ़ाने के लिए ऑटोमैटिक रूप से बाध्य नहीं होगी। कंपनी की तरफ से अतिरिक्त योगदान किया जाएगा या नहीं, यह पूरी तरह से संबंधित कंपनी की अपनी आंतरिक कॉर्पोरेट पॉलिसी या कर्मचारी के साथ हुए रोजगार अनुबंध पर निर्भर करेगा। वर्तमान में कई निजी कंपनियां अपने कर्मचारियों के वास्तविक बेसिक वेतन पर 12 पर्सेंट पीएफ काटती हैं, जो 15,000 रुपये की वैधानिक सीमा से कहीं अधिक होता है। ऐसी व्यवस्थाएं भविष्य में भी आसानी से जारी रह सकती हैं, बशर्ते नियोक्ता और कर्मचारी दोनों इसके लिए आपसी सहमति से तैयार हों।
सरकार ने उन कर्मचारियों को भी आश्वस्त किया है जो वर्तमान में अपनी उच्च सैलरी के हिसाब से बड़ा पीएफ योगदान कर रहे हैं। वे सभी कर्मचारी यदि चाहें तो अपनी कंपनी की पॉलिसी के अनुसार उच्च वेतन पर अपना योगदान जारी रख सकते हैं। नई ईपीएफ स्कीम 2026 के लागू होने से कर्मचारियों को मिलने वाले किसी भी फायदे या पीएफ की ब्याज दरों पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। ईपीएफओ (EPFO) द्वारा हर साल घोषित की जाने वाली वार्षिक ब्याज दरें पहले की तरह ही योग्य बैलेंस पर मिलती रहेंगी और इस अधिसूचना से ब्याज के ढांचे में कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। इसके साथ ही, वैधानिक योगदान दर (12 पर्सेंट), 15,000 रुपये की सैलरी लिमिट और कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) के तहत मिलने वाली न्यूनतम 1,000 रुपये प्रति माह की पेंशन राशि पहले की तरह ही पूरी तरह अपरिवर्तित रहेगी। इन सुधारों का मुख्य उद्देश्य पीएफ प्रशासन का आधुनिकीकरण करना और डिजिटल कंप्लायंस को बेहतर बनाना है।
इस बड़े सुधार के साथ ही सरकार ने 'कर्मचारी पेंशन योजना (EPS), 2026' को भी पेश किया है, जिसने पुराने ईपीएस-95 और कर्मचारी पेंशन योजना, 1971 को पूरी तरह से रिप्लेस कर दिया है। इस नई व्यवस्था का सबसे बड़ा प्रभाव उन उच्च वेतनभोगी कर्मचारियों और उनके नियोक्ताओं पर पड़ेगा जो वर्तमान में वैधानिक सीमा से अधिक सैलरी पर पीएफ का योगदान कर रहे हैं, क्योंकि अब उनके इस अतिरिक्त निवेश को आधिकारिक तौर पर स्वैच्छिक का दर्जा मिल गया है।
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