मार्केट न्यूज़

3 min read | अपडेटेड February 26, 2026, 12:34 IST
सारांश
भारतीय बैंकिंग सेक्टर ने इतिहास रच दिया है। दिसंबर तिमाही में लिस्टेड बैंकों का कुल नेट प्रॉफिट पहली बार 1 लाख करोड़ रुपये के पार निकल गया है। सरकारी बैंकों ने मुनाफे के मामले में निजी बैंकों को पीछे छोड़ दिया है।

बैंकों की सेहत में जबरदस्त सुधार देखने को मिल रहा है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की धड़कन कहे जाने वाले बैंकिंग सेक्टर से एक बहुत ही सुखद और बड़ी खबर सामने आई है। दिसंबर तिमाही के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि हमारे बैंक अब पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और मुनाफे में हैं। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब भारत के सभी लिस्टेड बैंकों का कंबाइंड नेट प्रॉफिट 1 लाख करोड़ रुपये के जादुई आंकड़े को पार कर गया है। यह न केवल निवेशकों के लिए बल्कि आम आदमी के लिए भी एक बड़ा संकेत है कि देश का बैंकिंग सिस्टम पूरी तरह सुरक्षित और तेज गति से बढ़ रहा है। बाजार में भी इसका असर दिख रहा है, जहां निफ्टी बैंक 61,098.95 के लेवल पर कारोबार कर रहा है।
इस बार के नतीजों की सबसे खास बात सरकारी बैंकों का शानदार प्रदर्शन रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, पब्लिक सेक्टर के बैंकों को 52,604 करोड़ रुपये से ज्यादा का कुल प्रॉफिट हुआ है। सरकारी बैंकों के मुनाफे में सालाना आधार पर 18 फीसदी से ज्यादा की भारी बढ़त देखी गई है। दूसरी ओर, प्राइवेट सेक्टर के बैंकों को कुल 47,895 करोड़ रुपये का नेट प्रॉफिट हुआ, जिसकी वृद्धि दर करीब 3 फीसदी रही। कुल मुनाफे में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी 52 फीसदी रही, जो उनकी बदलती तस्वीर को साफ दिखाती है। आज शेयर बाजार में भी IDFC फर्स्ट बैंक 2.16 फीसदी और यस बैंक 1.54 फीसदी की बढ़त के साथ हरे निशान में ट्रेड कर रहे हैं।
अगर हम पूरे सेक्टर की कमाई को देखें, तो मुनाफे का लगभग आधा हिस्सा सिर्फ तीन बड़े बैंकों से आया है। इनमें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एचडीएफसी बैंक और आईसीआईसीआई बैंक शामिल हैं। प्राइवेट सेक्टर में एचडीएफसी और आईसीआईसीआई बैंक ने मिलकर कुल मुनाफे में 63 फीसदी का योगदान दिया है। वहीं सरकारी बैंकों की बात करें तो अकेले स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने कुल पीएसयू बैंक प्रॉफिट में 40 फीसदी की हिस्सेदारी निभाई है। इन बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन भी स्थिर रहे हैं क्योंकि बैंकों ने अपनी लायबिलिटीज और लोन के बीच अच्छा तालमेल बिठाया है।
बैंकों की इस बंपर कमाई के पीछे कई बड़े कारण हैं। सबसे बड़ी वजह है बेहतर लोन रिकवरी और खराब लोन यानी एनपीए में आई भारी कमी। ज्यादातर बैंकों के एसेट क्वालिटी में सुधार हुआ है और उनके ग्रॉस एनपीए रेश्यो में 10 से 30 बेसिस पॉइंट्स की कमी आई है। इसके अलावा क्रेडिट ग्रोथ यानी लोन बांटने की रफ्तार भी काफी अच्छी रही है। विशेष रूप से गोल्ड लोन में सालाना आधार पर 128 फीसदी की जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है। हाउसिंग, एजुकेशन और व्हीकल लोन में भी 11 से 17 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे बैंकों की नॉन-इंटरेस्ट इनकम को काफी सपोर्ट मिला है।
बैंकों ने अपनी बैलेंस शीट को मजबूत करने के लिए रेगुलेटरी जरूरतों से कहीं ज्यादा बफर बनाए रखा है। क्रेडिट ग्रोथ को सपोर्ट देने के लिए कई बैंकों ने लगातार बॉन्ड जारी किए हैं, जिससे उनकी कैपिटल और ज्यादा मजबूत हुई है। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट के अनुसार, लेबर कोड का असर भी बैंकों पर बहुत कम रहा है। हालांकि ट्रेजरी इनकम थोड़ी कमजोर रही और खर्चे भी बढ़े हैं, लेकिन कुल मिलाकर फायदा बहुत ज्यादा रहा है।
(डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें।)
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