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4 min read | अपडेटेड October 29, 2026, 09:05 IST
सारांश
अमेरिका में महंगाई बढ़ने की एक बड़ी वजह ऊर्जा की ऊंची कीमतें भी हैं। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। सितंबर की शुरुआत से इसमें लगभग 20% की बढ़ोतरी हुई है।

पिछले महीने फेड ने तीन साल में पहली बार अपनी प्रमुख ब्याज दर बढ़ाई थी।
अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने बुधवार को ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया। बैंक ने ब्याज दरों को 3.75% से 4% के बीच स्थिर रखा है। फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) का यह फैसला बाजार की उम्मीदों के मुताबिक रहा। हालांकि, महंगाई लगातार ऊंचे स्तर पर बने रहने से आने वाले महीनों में फिर से ब्याज दरें बढ़ने की आशंका है। ध्यान देने वाली बात यह है कि समिति की दो सदस्य लिसा डी. कुक और बेथ एम. हैमक ने इस फैसले से असहमति जताई। वे ब्याज दरों में 0.25 फीसदी की और बढ़ोतरी के पक्ष में थीं।
US फेड के चेयरमैन ने अपने बयान में कहा कि महंगाई अभी भी ऊंचे स्तर पर है। इसलिए ब्याज दर बढ़ाने या घटाने का फैसला लेने से पहले वह आर्थिक स्थिति से जुड़ी और जानकारी जुटाना चाहता है। इससे उसे यह तय करने में मदद मिलेगी कि आगे ब्याज दरों को लेकर क्या कदम उठाए जाने चाहिए। फेड के इस फैसले से यह साफ नहीं हुआ है कि आगे ब्याज दरें बढ़ेंगी या घटेंगी। पिछले महीने अधिकारियों ने इस साल एक बार फिर ब्याज दर बढ़ाने का संकेत दिया था।
अमेरिका में महंगाई अभी भी फेडरल रिजर्व के 2% के लक्ष्य से काफी ऊपर बनी हुई है। सालाना आधार पर महंगाई की दर करीब 3% या उससे अधिक बनी हुई है। सितंबर में अमेरिका में महंगाई बढ़कर 3.7% हो गई, जबकि फरवरी में यह 2.4% थी। यानी ईरान युद्ध शुरू होने से पहले की तुलना में महंगाई काफी बढ़ गई है। वहीं, बाजार की वजह से भी ब्याज दरों पर दबाव बढ़ा है, जिससे अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्सों पर असर पड़ रहा है।
अमेरिका में लोगों का खर्च लगातार बना हुआ है। इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े कारोबार में निवेश बढ़ने के कारण भी कई क्षेत्रों में मांग मजबूत बनी हुई है। ऐसे में फेड को महंगाई कम करने के लिए लंबे समय तक सख्त मौद्रिक नीति अपनानी पड़ सकती है।
अमेरिका में महंगाई बढ़ने की एक बड़ी वजह ऊर्जा की ऊंची कीमतें भी हैं। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। सितंबर की शुरुआत से इसमें लगभग 20% की बढ़ोतरी हुई है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है।
डीजल की कीमतों में भी तेजी आई है। इससे खेती, परिवहन, निर्माण और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है। कंपनियों की लागत बढ़ने पर वे अपने उत्पादों और सेवाओं की कीमतें बढ़ा सकती हैं। वहीं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की ओर से लगाए गए टैरिफ यानी आयात शुल्क का असर भी कीमतों पर पड़ रहा है।
बाजार में उम्मीद जताई जा रही है कि अगर महंगाई ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो फेड आने वाली बैठकों में दोबारा ब्याज दरें बढ़ा सकता है। कुछ अर्थशास्त्रियों के मुताबिक आगे तीन बार 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। बाजार की उम्मीदें जून 2027 तक हर तीन महीने में दरें बढ़ाए जाने की ओर भी इशारा कर रही हैं। हालांकि, यह फैसला महंगाई, उपभोक्ताओं के खर्च और अर्थव्यवस्था की स्थिति पर निर्भर करेगा।
पिछले महीने फेड ने तीन साल में पहली बार अपनी प्रमुख ब्याज दर बढ़ाई थी। यह फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ब्याज दरें घटाने की मांग के खिलाफ था। ट्रंप ने इस बढ़ोतरी की आलोचना भी की। हालांकि, उन्होंने मुख्य रूप से फेड की ब्याज दर तय करने वाली समिति को जिम्मेदार ठहराया, न कि उसके अध्यक्ष केविन वॉर्श को, जिन्हें उन्होंने खुद नियुक्त किया था।
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