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5 min read | अपडेटेड October 09, 2026, 12:29 IST
सारांश
अमेरिकी सरकार ने माइक्रोसॉफ्ट, टाटा, विप्रो और इंफोसिस जैसी टेक कंपनियों के लिए परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम को सस्पेंड कर दिया है। सरकार का आरोप है कि इन कंपनियों ने वीजा सिस्टम का गलत इस्तेमाल किया है। इस फैसले से अमेरिका में काम कर रहे लाखों भारतीय प्रोफेशनल्स की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने टेक कंपनियों के लिए अहम वीजा प्रोग्राम को सस्पेंड किया।
अमेरिका में काम कर रहे भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स के लिए 8 अक्टूबर का दिन किसी बड़े झटके से कम नहीं रहा। ट्रंप प्रशासन ने सिलिकॉन वैली से लेकर भारत तक हड़कंप मचाने वाला एक बड़ा फैसला लिया है। अमेरिकी सरकार ने माइक्रोसॉफ्ट, विप्रो, इंफोसिस और टाटा जैसी कई दिग्गज कंपनियों के लिए एक अहम इमिग्रेशन व्यवस्था को सस्पेंड कर दिया है। ट्रंप सरकार का सीधा आरोप है कि इन बड़ी टेक कंपनियों ने अमेरिका के वर्कर वीजा सिस्टम का जमकर गलत इस्तेमाल किया है। इस सख्त फैसले के बाद इन कंपनियों में काम करने वाले लाखों भारतीय प्रोफेशनल्स का भविष्य खतरे में पड़ गया है और उनके बीच काफी डर का माहौल है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि अमेरिका ने कौन सा नियम बदला है और भारतीय इंजीनियर्स पर इसका क्या असर पड़ेगा।
इस पूरे मामले को समझने के लिए परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम को जानना बहुत जरूरी है। यह अमेरिकी सरकार की एक ऑफिशियल प्रक्रिया है जिसके जरिए कोई भी अमेरिकी कंपनी अपने विदेशी कर्मचारियों को ग्रीन कार्ड यानी परमानेंट रेजिडेंसी दिलाने के लिए स्पॉन्सर करती है। नियमों के अनुसार जब कोई कंपनी किसी विदेशी वर्कर को हमेशा के लिए अमेरिका में रखना चाहती है, तो उसे सबसे पहले श्रम विभाग से यह सर्टिफिकेशन लेना होता है। इसके लिए कंपनी को यह साबित करना पड़ता है कि उस खास पद के लिए अमेरिका में कोई योग्य नागरिक उपलब्ध नहीं है। अब ट्रंप प्रशासन ने कई बड़ी कंपनियों के लिए इसी पूरी व्यवस्था पर रोक लगा दी है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब तक यह रोक जारी रहेगी, तब तक कंपनियां अपने विदेशी कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड की नई अर्जी दाखिल करने की शुरुआत ही नहीं कर पाएंगी।
इस फैसले का ऐलान करते हुए अमेरिकी सरकार का रुख काफी सख्त नजर आया। वॉशिंगटन में हुई एक प्रेस ब्रीफिंग में वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अमेरिका के इतिहास में शायद ही किसी कंपनी ने वीजा सिस्टम का इतना गलत इस्तेमाल किया हो जितना माइक्रोसॉफ्ट ने किया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उनका मकसद कंपनी को नुकसान पहुंचाना नहीं है, बल्कि वे चाहते हैं कि कंपनियां अमेरिकी नागरिकों को रोजगार दें। अमेरिकी लेबर सेक्रेटरी कीथ सोंडरलिंग ने साफ किया कि यह कार्रवाई सिर्फ माइक्रोसॉफ्ट तक सीमित नहीं है। सरकार ने इंफोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल टेक्नोलॉजीज, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी जैसी कंपनियों के लिए भी इस प्रोग्राम को सस्पेंड कर दिया है। लेबर सेक्रेटरी ने कड़े शब्दों में कहा कि सरकार ने अब समस्या की असली जड़ पकड़ ली है और इन सभी कंपनियों के खिलाफ जांच की जा रही है।
ट्रंप सरकार के इस फैसले का सबसे ज्यादा नुकसान भारतीय प्रोफेशनल्स को ही उठाना पड़ेगा। अमेरिका की टॉप आईटी कंपनियों में सबसे ज्यादा संख्या भारतीय इंजीनियर्स की ही होती है। भारतीय पहले से ही ग्रीन कार्ड पाने के लिए दशकों लंबे इंतजार से जूझ रहे हैं। अमेरिकी विदेश विभाग के सितंबर 2026 के वीजा बुलेटिन के आंकड़े खुद इसकी गवाही देते हैं। बुलेटिन के अनुसार, भारत के लिए एम्प्लॉयमेंट-बेस्ड सेकंड प्रेफरेंस यानी EB-2 कैटेगरी को फाइनल एक्शन के लिए अनअवेलेबल घोषित कर दिया गया था। वहीं EB-3 कैटेगरी की कट-ऑफ तारीख 1 जनवरी 2014 पर ही अटकी हुई थी। अमेरिकी कानून हर देश के नागरिकों को मिलने वाले ग्रीन कार्ड पर एक तय सीमा भी लगाता है। ऐसे मुश्किल हालात में लेबर सर्टिफिकेशन प्रोसेस रुक जाने से भारतीय प्रोफेशनल्स का ग्रीन कार्ड पाने का सपना अब और ज्यादा लटक सकता है।
इस फैसले का दूसरा सबसे डरावना पहलू H-1B वीजा धारकों से जुड़ा हुआ है। अमेरिकी नियमों के अनुसार कोई भी कर्मचारी H-1B वीजा पर अधिकतम छह साल तक ही अमेरिका में रह सकता है। छह साल से ज्यादा रुकने की छूट सिर्फ उन्हीं विदेशी कर्मचारियों को मिलती है, जिनका लेबर सर्टिफिकेशन प्रोसेस समय रहते शुरू हो चुका हो। अब जो कर्मचारी अपने छह साल के वीजा के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके हैं, उनके सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। कंपनियां उनके लिए नया सर्टिफिकेशन फाइल नहीं कर पाएंगी, जिससे उन्हें वीजा एक्सटेंशन नहीं मिलेगा और उन्हें मजबूर होकर अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है। हालांकि, जिन कर्मचारियों की याचिकाएं पहले ही मंजूर हो चुकी हैं और जो सिर्फ ग्रीन कार्ड नंबर का इंतजार कर रहे हैं, उन्हें थोड़ी राहत जरूर है। मौजूदा नियमों के तहत वे तीन-तीन साल के एक्सटेंशन के हकदार बने रहेंगे, लेकिन नए आवेदकों के लिए यह किसी बुरे सपने जैसा है।
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