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4 min read | अपडेटेड July 17, 2026, 13:35 IST
सारांश
गुजरात के बनासकांठा में गाय के गोबर से बायो सीएनजी तैयार की जा रही है। इस प्लांट से रोज 600 से 700 गाड़ियों में फ्यूल भरा जा रहा है। यह पेट्रोल के मुकाबले काफी सस्ता है। इस प्रोजेक्ट से किसानों की कमाई भी बढ़ रही है और देश को नया फ्यूल मिल रहा है।

गाय के गोबर से बनी बायो सीएनजी बन सकती है पेट्रोल का एक बेहतरीन और सस्ता विकल्प।
भारत में गन्ने से बने एथेनॉल के बाद अब एक और नए फ्यूल पर तेजी से काम हो रहा है, जो आपकी जेब को कच्चे तेल की महंगाई से बचा सकता है। यह फ्यूल कोई और नहीं, बल्कि गाय के गोबर से बनी बायो सीएनजी (Bio-CNG) है। गुजरात के बनासकांठा में गाय के गोबर का इस्तेमाल करके बायो सीएनजी तैयार की जा रही है और यह काफी सस्ती भी है। दुनिया भर में खासकर वेस्ट एशिया में चल रहे तनाव के कारण ग्लोबल एनर्जी की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं। ऐसे में महंगे विदेशी फ्यूल पर देश की निर्भरता कम करने के लिए यह अनूठा प्रयोग भारत के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर सामने आया है।
बनासकांठा में लगा यह बायो सीएनजी स्टेशन सुजुकी मोटर कॉर्प और बनास डेयरी के सपोर्ट से चल रहा है। इस स्टेशन से हर रोज करीब 600 से 700 गाड़ियों में गाय के गोबर से बना यह फ्यूल भरा जा रहा है। बीटी की रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्लांट पर गोबर से निकली मीथेन गैस से कंप्रेस्ड नेचुरल गैस यानी सीएनजी तैयार की जाती है। इसकी कीमत करीब 80 रुपये प्रति किलो है, जो भारत के कई हिस्सों में बिकने वाले पेट्रोल से 20 रुपये से भी ज्यादा सस्ती है। इस प्लांट को चलाने के लिए हर रोज 16 गांवों से लगभग 88 टन गोबर इकट्ठा किया जाता है। किसानों को उनके गोबर के बदले 1 रुपये प्रति किलो का भाव दिया जाता है, जिससे उनके लिए एक एक्स्ट्रा इनकम का जरिया बन गया है।
इस प्रोजेक्ट को पूरी तरह से एक सर्कुलर मॉडल के रूप में बनाया गया है। इसमें एक तरफ तो गोबर से मीथेन गैस निकालकर ट्रांसपोर्ट फ्यूल बना लिया जाता है, वहीं गैस निकलने के बाद बचे हुए वेस्ट से बेहतरीन क्वालिटी का ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर तैयार होता है। इस फर्टिलाइजर को वापस किसानों को बेच दिया जाता है। भारत अपनी एनर्जी सिक्योरिटी को मजबूत करने के लिए इस मॉडल को बहुत गंभीरता से ले रहा है। इसी वजह से देश की बड़ी कंपनियां जैसे रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और अडानी ग्रुप भी बायोगैस प्रोडक्शन में भारी निवेश कर रहे हैं। सुजुकी मोटर ने भी अपने सीएनजी वाहनों के लिए इसमें बड़ा दांव लगाया है। भारत सरकार बायोगैस बनाने वालों को दी जाने वाली कीमत बढ़ाने की प्लानिंग कर रही है। हाल ही में एक जापानी दौरे के दौरान हुए समझौते के तहत देश में 1,000 नए बायोगैस प्लांट लगाने की रणनीति को भी एक बड़ा पुश मिला है।
भले ही यह प्रोजेक्ट बहुत शानदार लग रहा हो, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर लागू करने में कई तरह की अड़चनें भी हैं। तेल मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, भारत हर रोज 190 मिलियन क्यूबिक मीटर गैस का इस्तेमाल करता है, जिसका आधा हिस्सा विदेशों से आयात होता है। इसके मुकाबले अभी देश में सीबीजी यानी कंप्रेस्ड बायोगैस का प्रोडक्शन केवल 0.3 मिलियन क्यूबिक मीटर रोजाना है। इसके अलावा सबसे बड़ी चुनौती गोबर को दूर दराज के गांवों से इकट्ठा करके प्लांट तक लाना और फिर तैयार गैस को ग्राहकों तक पहुंचाना है। पाइपलाइन न होने के कारण यह खर्च काफी बढ़ जाता है।
प्लांट लगाने के शुरुआती भारी खर्च के कारण बनासकांठा का यह प्रोजेक्ट अगले तीन साल तक शायद वित्तीय रूप से फायदेमंद न हो पाए। फिर भी, यह एक ऐसा मॉडल है जो दिखा रहा है कि कैसे गोबर से ट्रांसपोर्ट फ्यूल और खाद दोनों बनाए जा सकते हैं और भारत को एनर्जी के मामले में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
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