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  1. Bond Tokenisation क्या है? समझिए SEBI की नई पहल कैसे बदल सकती है निवेश का तरीका

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Bond Tokenisation क्या है? समझिए SEBI की नई पहल कैसे बदल सकती है निवेश का तरीका

Shubham Singh Thakur

3 min read | अपडेटेड June 01, 2026, 18:24 IST

सारांश

Bond Tokenisation: मार्केट रेगुलेटर सेबी बॉन्ड टोकनाइजेशन को लेकर एक पायलट प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। इसका मकसद कॉरपोरेट बॉन्ड्स को डिजिटल टोकन में बदलना है, ताकि बॉन्ड में निवेश करना आसान, तेज और अधिक पारदर्शी बनाया जा सके।

Bond Tokenisation

Bond Tokenisation: इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत यह है कि लेनदेन और भुगतान लगभग तुरंत हो सकते हैं।

Bond Tokenisation: बॉन्ड में निवेश करना अब पहले से ज्यादा आसान हो सकता है। मार्केट रेगुलेटर SEBI की नई पहल से लेनदेन कुछ ही सेकंड में पूरा हो सकता है। इसमें न लंबी कागजी प्रक्रिया, न सेटलमेंट का इंतजार और न ही बड़े निवेश की जरूरत होगी। SEBI एक नई तकनीक "बॉन्ड टोकनाइजेशन" पर काम कर रहा है, जो भविष्य में बॉन्ड निवेश का तरीका पूरी तरह बदल सकती है। यहां हम समझेंगे कि बॉन्ड टोकनाइजेशन क्या है और यह सिस्टम कैसे काम करेगा।
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क्या है बॉन्ड टोकनाइजेशन?

मार्केट रेगुलेटर सेबी बॉन्ड टोकनाइजेशन को लेकर एक पायलट प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। इसका मकसद कॉरपोरेट बॉन्ड्स को डिजिटल टोकन में बदलना है, ताकि बॉन्ड में निवेश करना आसान, तेज और अधिक पारदर्शी बनाया जा सके।

सरल भाषा में समझें तो आज जब कोई कंपनी बॉन्ड जारी करती है, तो उसकी खरीद-बिक्री और सेटलमेंट की प्रक्रिया कई संस्थानों और दस्तावेजों के जरिए पूरी होती है। टोकनाइजेशन में इन्हीं बॉन्ड्स को ब्लॉकचेन जैसी डिजिटल तकनीक पर डिजिटल टोकन के रूप में दर्ज किया जाएगा। इससे पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन, सुरक्षित और लगभग रियल-टाइम में हो सकेगी।

छोटी राशि से कर सकेंगे निवेश

मान लीजिए किसी कंपनी ने 1 लाख रुपये का बॉन्ड जारी किया है। वर्तमान व्यवस्था में छोटे निवेशकों के लिए इसमें निवेश करना मुश्किल हो सकता है। लेकिन टोकनाइजेशन के बाद उसी बॉन्ड को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा जा सकेगा। इससे कोई निवेशक 5,000 या 10,000 रुपये जैसी छोटी राशि से भी निवेश कर सकता है।

तुरंत हो जाएगा लेनदेन

इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत यह है कि लेनदेन और भुगतान लगभग तुरंत हो सकते हैं। अभी बॉन्ड खरीदने और उसके सेटलमेंट में समय लग सकता है, लेकिन नई तकनीक में पैसा और बॉन्ड दोनों का ट्रांसफर एक साथ होगा। इससे धोखाधड़ी और सेटलमेंट से जुड़े जोखिम कम होंगे।

टोकनाइजेशन में "स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट" का भी इस्तेमाल होगा। इसका मतलब है कि ब्याज का भुगतान, टैक्स कटौती और मैच्योरिटी पर पैसा लौटाने जैसी प्रक्रियाएं अपने आप तय नियमों के अनुसार हो सकेंगी। इससे मानवीय हस्तक्षेप कम होगा और गलतियों की संभावना भी घटेगी। इसके अलावा, सभी लेनदेन एक साझा डिजिटल लेजर में रिकॉर्ड होंगे। इससे हर ट्रांजैक्शन का स्पष्ट रिकॉर्ड रहेगा, पारदर्शिता बढ़ेगी और नियामकों के लिए निगरानी करना आसान होगा।

क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट्स

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर यह व्यवस्था बड़े स्तर पर लागू होती है, तो बॉन्ड बाजार में निवेश करना ज्यादा आसान हो जाएगा। छोटे निवेशकों की भागीदारी बढ़ सकती है, लेनदेन की लागत कम हो सकती है और पूरे डेट मार्केट की कार्यक्षमता में सुधार आ सकता है। कुल मिलाकर, बॉन्ड टोकनाइजेशन को भारतीय बॉन्ड बाजार के डिजिटलीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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