पर्सनल फाइनेंस
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4 min read | अपडेटेड May 29, 2026, 15:11 IST
सारांश
अगर आप नौकरी छोड़ चुके हैं या बदल चुके हैं, तो अपने पुराने सैलरी अकाउंट को लेकर सावधान हो जाएं। लगातार तीन महीने तक सैलरी न आने पर बैंक इसे सामान्य सेविंग्स अकाउंट में बदल देता है। इसके बाद खाते में मिनिमम बैलेंस न रखने पर बैंक आप पर भारी पेनाल्टी लगा सकता है।

नौकरी बदलने के बाद पुराने सैलरी अकाउंट को लापरवाही में खुला न छोड़ें वरना लग सकती है पेनल्टी।| Image: Shutterstock.
जब हम कोई नई नौकरी ज्वाइन करते हैं, तो अक्सर पुरानी कंपनी की बहुत सी बातों को पीछे छोड़ देते हैं। इनमें से एक बड़ी बात होती है हमारा पुराना सैलरी अकाउंट। अक्सर लोग नई नौकरी में मिलने वाले नए सैलरी अकाउंट के उत्साह में पुराने अकाउंट को वैसे ही छोड़ देते हैं। उन्हें लगता है कि यह अकाउंट तो जीरो बैलेंस है, इसलिए इसमें कोई पैसा न भी रखें तो क्या फर्क पड़ता है। लेकिन आपकी यही छोटी सी सोच आगे चलकर आपके लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है। नौकरी बदलने के बाद पुराने सैलरी अकाउंट को लेकर बैंकों के अपने कुछ खास नियम होते हैं। अगर आप इन नियमों से अनजान हैं, तो बैंक चुपके से आपके खाते से जुर्माना के रूप में पैसे काटना शुरू कर देता है। इसलिए जॉब छोड़ने के बाद इस अकाउंट को लेकर पूरा कंफ्यूजन दूर कर लेना आपके फ्यूचर के लिए बहुत फायदेमंद साबित होगा।
सैलरी अकाउंट खुलवाते समय बैंक आपको जीरो बैलेंस की बड़ी सुविधा देते हैं। इसका मतलब यह होता है कि अगर आपके खाते में एक भी रुपया नहीं है, तब भी बैंक आपसे कोई चार्ज नहीं वसूलेगा। लेकिन यह सुविधा आपको तब तक ही मिलती है जब तक आपकी कंपनी हर महीने उस अकाउंट में आपकी सैलरी क्रेडिट करती है। बैंक के नियमों के मुताबिक, अगर किसी सैलरी अकाउंट में लगातार तीन महीने तक कोई सैलरी ट्रांसफर नहीं होती है, तो बैंक उसे सैलरी अकाउंट मानना बंद कर देता है। इसके बाद बैंक उस अकाउंट को ऑटोमेटिक तरीके से एक सामान्य सेविंग्स अकाउंट यानी बचत खाते में बदल देता है। जैसे ही अकाउंट का स्टेटस बदलता है, उसके साथ मिलने वाली जीरो बैलेंस की सुविधा भी पूरी तरह खत्म हो जाती है। ध्यान रहे यह नियम अलग-अलग बैंकों में अलग-अलग होते हैं।
सैलरी अकाउंट से सामान्य सेविंग्स अकाउंट में बदलते ही उस खाते पर रेगुलर सेविंग्स अकाउंट के सारे नियम लागू हो जाते हैं। अब आपको उस अकाउंट में बैंक के नियमानुसार एक तय मिनिमम एवरेज बैलेंस यानी न्यूनतम राशि रखनी होगी। यह राशि अलग-अलग बैंकों और आपके रहने वाले इलाके जैसे मेट्रो सिटी, शहरी या ग्रामीण क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है। आमतौर पर यह सीमा पांच हजार से दस हजार रुपये तक होती है। अगर आप अपने उस पुराने अकाउंट में यह मिनिमम बैलेंस मेंटेन नहीं करते हैं, तो बैंक आपके खाते पर नॉन-मेन्टेनेंस चार्ज यानी जुर्माना लगाना शुरू कर देता है। कई बार लोगों को तब पता चलता है जब उनके खाते में बचे हुए कुछ पैसे भी कटकर साफ हो जाते हैं।
अगर आपके मन में यह डर है कि बैंक जुर्माना लगाते-लगाते आपके अकाउंट बैलेंस को माइनस में पहुंचा देगा, तो आपको रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई के नियमों को जान लेना चाहिए। आरबीआई की गाइडलाइंस के मुताबिक, कोई भी बैंक मिनिमम बैलेंस न होने पर किसी भी सेविंग्स अकाउंट को नेगेटिव में नहीं ले जा सकता है। इसके अलावा, बैंक सीधे जुर्माना वसूलना शुरू नहीं कर सकते हैं। जब भी आपका बैलेंस कम होगा, बैंक को आपको एसएमएस या ईमेल के जरिए इसकी जानकारी देनी होगी। बैंक आपको एक महीने का समय देगा ताकि आप अपना बैलेंस सुधार सकें। अगर आप एक महीने के भीतर मिनिमम बैलेंस नहीं रखते हैं, तभी बैंक आपके शॉर्टफॉल के हिसाब से चार्ज वसूल सकता है।
इस तरह के नुकसान से बचने के लिए आपके पास दो रास्ते होते हैं। पहला रास्ता यह है कि जब आप नई नौकरी ज्वाइन करें, तो अपने नए एम्प्लॉयर यानी कंपनी से बात करें। अगर आपकी नई कंपनी का भी उसी बैंक के साथ टाई-अप है, तो आप अपने पुराने सैलरी अकाउंट को ही नए जॉब के साथ लिंक करवा सकते हैं। इससे आपका अकाउंट दोबारा एक्टिव हो जाएगा और जीरो बैलेंस की सुविधा बनी रहेगी। दूसरा और सबसे सुरक्षित रास्ता यह है कि अगर आपकी नई कंपनी का उस बैंक से कोई संबंध नहीं है, तो आप अपनी पुरानी कंपनी से फाइनल सेटलमेंट की सैलरी आने के बाद उस पुराने अकाउंट को पूरी तरह बंद करवा दें। अकाउंट बंद करवाने के लिए आपको अपनी होम ब्रांच में जाकर एक क्लोजर फॉर्म भरना होगा। इसके साथ ही अपना पुराना डेबिट कार्ड और बची हुई चेकबुक बैंक को सरेंडर करनी होगी। ऐसा करने से आप फ्यूचर में लगने वाले किसी भी अनचाहे चार्ज से पूरी तरह सुरक्षित हो जाएंगे।
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