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4 min read | अपडेटेड October 08, 2026, 09:24 IST
सारांश
SBI Research ने पिछले RBI पॉलिसी साइकल और महंगाई तथा नीतिगत ब्याज दरों के बीच संबंध का विश्लेषण किया है। इस आधार पर रिसर्च टीम का अनुमान है कि मौजूदा स्तर से कुल 50 बेसिस प्वाइंट यानी 0.50% की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है।

दिसंबर में बढ़ सकता है Repo Rate, आम आदमी की जेब पर क्या होगा असर? (Photo: Shutterstock)
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से रेपो रेट को बढ़ाकर 5.50% किए जाने के बाद ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, मौजूदा हालात को देखते हुए RBI दिसंबर तक रेपो रेट में एक और बड़ी बढ़ोतरी कर सकता है। इसके बाद रेपो रेट बढ़कर 6% तक पहुंच सकता है। एसबीआई रिसर्च ने अपनी ताजा इकोरैप रिपोर्ट में कहा है कि आने वाले महीनों में भारत में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, सीपीआई इन्फ्लेशन नवंबर 2026 में करीब 6.8% के स्तर पर पहुंच सकती है। अगर महंगाई में अनुमान के मुताबिक तेजी आती है, तो इसे कंट्रोल करने के लिए RBI को मौद्रिक नीति को और सख्त करना पड़ सकता है। एसबीआई रिसर्च ने पिछले RBI पॉलिसी साइकल और महंगाई और नीतिगत ब्याज दरों के बीच संबंध का विश्लेषण किया है। इस आधार पर रिसर्च टीम का अनुमान है कि मौजूदा स्तर से कुल 50 बेसिस प्वाइंट यानी .50% की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है।
अगर RBI 50 बेसिस प्वाइंट की यह बढ़ोतरी करता है, तो मौजूदा 5.50% रेपो रेट बढ़कर 6% हो जाएगा। हालांकि, यह अभी एक अनुमान है और वास्तविक फैसला महंगाई, आर्थिक विकास और अन्य घरेलू व वैश्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) करेगी।
एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में मौद्रिक नीति के सामने मौजूद कई आर्थिक परिस्थितियों का विश्लेषण किया गया है। खास तौर पर महंगाई, आर्थिक गतिविधियों, ग्लोबल मार्केट और ब्याज दरों से जुड़े संकेतकों पर नजर रखी जा रही है। RBI के लिए महंगाई को कंट्रोल में रखना प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। अगर आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव बढ़ता है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को सख्त रखने या उनमें बढ़ोतरी करने का फैसला ले सकता है। हालांकि, रेपो रेट को लेकर अंतिम फैसला RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में आर्थिक आंकड़ों और परिस्थितियों के आधार पर लिया जाएगा।
अगर RBI रेपो रेट 6% करता है, तो इसका असर कर्ज लेने वाले लोगों पर पड़ सकता है। खासकर ऐसे होम लोन ग्राहक जिनकी ब्याज दरें रेपो रेट से जुड़ी हुई हैं, उनकी ब्याज दर और EMI बढ़ सकती है। उदाहरण के लिए, अगर बैंक अपनी लोन दरों में बढ़ोतरी करते हैं तो नए ग्राहकों के लिए कर्ज महंगा हो सकता है। वहीं, मौजूदा फ्लोटिंग रेट वाले ग्राहकों को भी ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ सकता है। हालांकि, वास्तविक असर बैंक की पॉलिसी और लोन की ब्याज दर के प्रकार पर निर्भर करेगा।
रेपो रेट में बढ़ोतरी का असर सिर्फ लोन लेने वालों तक सीमित नहीं रहता। बैंक अपनी जमा दरों में भी बदलाव कर सकते हैं। ऐसे में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और अन्य बैंक डिपॉजिट पर मिलने वाले ब्याज में बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है। इससे उन लोगों को फायदा हो सकता है जो अपनी बचत का बड़ा हिस्सा बैंक एफडी या दूसरी ब्याज आधारित योजनाओं में रखते हैं। हालांकि, बैंक किस हद तक जमा दरों में बदलाव करते हैं, यह उनकी फंडिंग जरूरत और बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा।
रेपो रेट में बढ़ोतरी का असर शेयर मार्केट पर भी देखने को मिल सकता है। ब्याज दरें बढ़ने से कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो सकता है, जिससे उनकी लागत और प्रॉफिट पर असर पड़ने की संभावना रहती है। दूसरी ओर, बैंकिंग और वित्तीय कंपनियों पर इसका प्रभाव अलग-अलग हो सकता है। इसलिए निवेशकों के लिए RBI की आने वाली एमपीसी बैठक और SBI Research की रिपोर्ट में बताए गए आर्थिक संकेतकों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल आरबीआई ने 7 अक्टूबर को रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर रेपो रेट 5.25% से 5.50% कर दिया। दिसंबर में रेपो रेट के 50 बेसिस पॉइंट्स बढ़ने का बस अनुमान है, इस पर आखिरी फैसला आरबीआई लेगा। आने वाले महंगाई के आंकड़े, आर्थिक वृद्धि, ग्लोबल परिस्थितियां और घरेलू बाजार के संकेत इस फैसले में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
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