पर्सनल फाइनेंस
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4 min read | अपडेटेड June 23, 2026, 13:45 IST
सारांश
जिन लोगों की कमाई बिजनेस या प्रोफेशन से होती है, उनके लिए ओल्ड और न्यू टैक्स रिजीम का चुनाव काफी सोच-समझकर करना जरूरी है। वे नौकरीपेशा लोगों की तरह हर साल टैक्स रिजीम नहीं बदल सकते। बिजनेस इनकम वालों के लिए इसमें काफी कड़े नियम बनाए गए हैं, जिन्हें जानना बेहद जरूरी है।

एक बार न्यू टैक्स रिजीम में जाने के बाद दोबारा ओल्ड टैक्स रिजीम में लौटने का मौका नहीं मिलता है। Image: Shutterstock
इनकम टैक्स रिटर्न भरते समय ज्यादातर लोग सिर्फ टैक्स बचाने पर ध्यान देते हैं। लेकिन जिन लोगों की कमाई बिजनेस या प्रोफेशन से आती है, उनके लिए ओल्ड टैक्स रिजीम और न्यू टैक्स रिजीम का चुनाव केवल एक साल का फैसला नहीं होता है। यहीं पर टैक्सपेयर्स से सबसे बड़ी गलती होती है। कई टैक्सपेयर्स यह मान लेते हैं कि वे हर साल अपनी सुविधा के हिसाब से टैक्स रिजीम बदल सकते हैं। नौकरीपेशा लोगों के पास हर साल रिजीम बदलने की सुविधा होती है, लेकिन बिजनेस इनकम वाले मामलों में नियम बहुत ज्यादा सख्त हैं और वहां ऐसा करना बिल्कुल आसान नहीं है।
अगर किसी व्यक्ति की बिजनेस इनकम है और वह ओल्ड टैक्स रिजीम को चुनता है, तो बाद में उसे केवल एक बार ही न्यू टैक्स रिजीम में वापस जाने का विकल्प मिलता है। एक बार न्यू रिजीम में लौटने के बाद वह व्यक्ति दोबारा कभी भी ओल्ड टैक्स रिजीम को नहीं चुन सकता है। इसका मतलब यह है कि पहली बार ओल्ड रिजीम चुनने की अनुमति तो है और ओल्ड से न्यू में वापस जाना भी एक बार मुमकिन है, लेकिन न्यू में लौटने के बाद फिर से ओल्ड चुनना संभव नहीं है। इसलिए बिजनेस इनकम वाले लोग हर साल रिजीम नहीं बदल सकते हैं और उनका यह फैसला परमानेंट हो जाता है।
अगर आपकी बिजनेस या प्रोफेशनल इनकम है और आप ITR-4 यानी सुगम फॉर्म भर रहे हैं, तो आप ओल्ड टैक्स रिजीम चुन सकते हैं। लेकिन इसके लिए एक बहुत जरूरी शर्त रखी गई है कि टैक्सपेयर्स को फॉर्म 10-IEA जमा करना होगा। यह फॉर्म आईटीआर की नियत तारीख यानी 31 अगस्त 2026 से पहले भरना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही आईटीआर में इस फॉर्म की जानकारी दर्ज करनी होगी। अगर यह प्रक्रिया पूरी नहीं की गई, तो डिफॉल्ट रूप से आपके ऊपर न्यू टैक्स रिजीम लागू हो जाएगा। यह फॉर्म ओल्ड टैक्स रिजीम चुनने और ओल्ड रिजीम छोड़कर न्यू रिजीम में जाने, दोनों ही स्थितियों में भरना जरूरी है।
ओल्ड रिजीम का सबसे बड़ा आकर्षण यही है कि इसमें कई टैक्स छूट और डिडक्शन का लाभ मिलता है। इसके तहत टैक्सपेयर्स सेक्शन 80सी, सेक्शन 80डी, एचआरए बेनिफिट, होम लोन बेनिफिट और कुछ मामलों में एनपीएस बेनिफिट्स का फायदा उठा सकते हैं। लेकिन इन सभी फायदों का दावा तभी किया जा सकता है जब फॉर्म 10-IEA समय पर दाखिल किया गया हो और आईटीआर में उसकी पूरी जानकारी भरी गई हो।
आईटीआर-4 मुख्य रूप से छोटे व्यवसायियों और प्रोफेशनल्स के लिए होता है। इसे रेजिडेंट इंडिविजुअल, HUF और पार्टनरशिप फर्म भर सकते हैं, लेकिन इसमें LLP शामिल नहीं हैं। इसके लिए कुल कमाई 50 लाख रुपये तक होनी चाहिए और यह प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन स्कीम के तहत आने वाले लोगों के लिए है। सैलरी, पेंशन, अधिकतम दो हाउस प्रॉपर्टी और 5000 रुपये तक की कृषि आय वाले लोग इसे भर सकते हैं। दूसरी तरफ NRI, RNOR, 50 लाख से अधिक कमाई वाले, कंपनी के डायरेक्टर, अनलिस्टेड शेयर्स रखने वाले और दो से अधिक हाउस प्रॉपर्टी वाले लोग इसे नहीं भर सकते हैं। साथ ही शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन वाले, 1.25 लाख से अधिक लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन वाले निवेशक और ईसॉप टैक्स डेफरल वाले स्टार्टअप कर्मचारी भी इसके लिए पात्र नहीं हैं।
सही टैक्स रिजीम चुनने के लिए सबसे पहले अपनी कुल टैक्सेबल आय निकालनी चाहिए। इसके बाद ओल्ड रिजीम के तहत मिलने वाले सभी डिडक्शन को जोड़ना चाहिए। अगले स्टेप में न्यू रिजीम की टैक्स देनदारी निकालनी चाहिए और फिर दोनों की आपस में तुलना करनी चाहिए। निर्णय लेने के बाद फॉर्म 10-आईईए समय पर भरना चाहिए। जिन लोगों के पास पर्याप्त टैक्स छूट और निवेश लाभ मौजूद हैं, उनके लिए ओल्ड रिजीम कई मामलों में फायदेमंद हो सकता है। वहीं कम डिडक्शन वाले टैक्सपेयर्स के लिए न्यू रिजीम सरल और सुविधाजनक विकल्प साबित हो सकता है। बिजनेस इनकम वाले लोगों को रिजीम स्विचिंग के प्रतिबंध को ध्यान में रखकर ही कोई फैसला लेना चाहिए क्योंकि एक गलत चुनाव आगे कई सालों तक असर डाल सकता है।
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