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4 min read | अपडेटेड May 05, 2026, 14:54 IST
सारांश
शेयर बाजार में कंपनियां अपने निवेशकों को डिविडेंड, बोनस शेयर और बायबैक के जरिए पैसा बांटती हैं। हाल ही में एचडीएफसी बैंक और विप्रो जैसी कंपनियों ने ऐसे कई एलान किए हैं। हालांकि, इन तीनों पर लगने वाले टैक्स के नियम अलग-अलग हैं, जिन्हें समझना हर निवेशक के लिए जरूरी है।

शेयर बाजार से होने वाली कमाई पर टैक्स के पेचीदा नियमों को समझना है बेहद जरूरी।
शेयर बाजार में जब भी कंपनियां अच्छा प्रदर्शन करती हैं, तो वे अपने मुनाफे का हिस्सा अलग-अलग तरीकों से शेयरहोल्डर्स के साथ बांटती हैं। इसे कॉर्पोरेट एक्शन कहा जाता है। हाल ही में चौथी तिमाही यानी Q4 FY26 के नतीजों के दौरान कई बड़ी कंपनियों ने अपने निवेशकों को खुश करने के लिए बड़े एलान किए हैं। एचडीएफसी बैंक ने 13 रुपये का डिविडेंड देने का फैसला किया है, तो वहीं विप्रो ने बायबैक का प्रस्ताव रखा है। इसके अलावा औरोबिंदो फार्मा, सिएंट और ट्रेंट जैसी कंपनियों ने भी बोनस और बायबैक के जरिए अपने निवेशकों को रिवॉर्ड देने की तैयारी की है। इन सब खबरों के बीच निवेशकों के लिए यह जानना बहुत जरूरी हो गया है कि आखिर उनकी इस कमाई पर सरकार कितना टैक्स वसूलेगी।
जब कोई कंपनी अपने नेट प्रॉफिट का एक हिस्सा सीधे अपने निवेशकों के बैंक खाते में भेजती है, तो उसे डिविडेंड कहा जाता है। भारत में डिविडेंड से होने वाली कमाई पर टैक्स पूरी तरह से आपकी कुल इनकम पर निर्भर करता है। टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, आपको मिलने वाले डिविडेंड को 'इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज' की कैटेगरी में जोड़ा जाता है। इसके बाद आपकी कुल सालाना कमाई जिस भी टैक्स स्लैब में आती है, उसी के हिसाब से आपको टैक्स चुकाना पड़ता है। यह दर 5 पर्सेंट से लेकर 30 पर्सेंट तक हो सकती है। अगर किसी एक साल में आपको मिलने वाला कुल डिविडेंड 5,000 रुपये से ज्यादा होता है, तो कंपनी पेमेंट करते समय ही 10 पर्सेंट टीडीएस काट लेती है। हालांकि, आखिरी टैक्स की देनदारी आपके स्लैब के हिसाब से ही तय होती है, इसलिए ज्यादा कमाई वाले लोगों को इस पर ज्यादा टैक्स देना पड़ता है।
बोनस शेयर वे शेयर होते हैं जो कंपनी अपने मौजूदा शेयरहोल्डर्स को बिना किसी एक्स्ट्रा खर्च के यानी बिल्कुल फ्री में देती है। जैसे हाल ही में ट्रेंट ने बोनस इश्यू का एलान किया है। जब आपको ये फ्री शेयर मिलते हैं, तो उस वक्त आपको कोई टैक्स नहीं देना होता। टैक्स का मामला तब शुरू होता है जब आप इन बोनस शेयरों को बाजार में बेचते हैं। चूंकि ये शेयर आपको फ्री में मिले थे, इसलिए इनकी खरीद कीमत जीरो मानी जाती है। अगर आप बोनस शेयर मिलने के 1 साल के अंदर उन्हें बेच देते हैं, तो उस पर होने वाले मुनाफे को शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन यानी एसटीसीजी माना जाता है और इस पर 20 पर्सेंट टैक्स लगता है। वहीं अगर आप इन शेयरों को 1 साल से ज्यादा समय तक अपने पास रखने के बाद बेचते हैं, तो इसे लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन यानी एलटीसीजी कहा जाता है। 1.25 लाख रुपये से ज्यादा के एलटीसीजी पर 12.5 पर्सेंट की दर से टैक्स वसूला जाता है।
बायबैक के मामले में टैक्स के नियमों में पिछले कुछ समय में काफी उतार-चढ़ाव देखे गए हैं। अक्टूबर 2024 से पहले बायबैक पर टैक्स देने की पूरी जिम्मेदारी कंपनियों की होती थी और निवेशकों को मिलने वाला पैसा पूरी तरह टैक्स फ्री होता था। लेकिन अक्टूबर 2024 के बाद इसमें बदलाव हुआ और बायबैक से मिलने वाली पूरी रकम को डिविडेंड की तरह मानकर स्लैब रेट के हिसाब से टैक्स लगाया जाने लगा। अब अप्रैल 2026 से एक बार फिर नियमों में बड़ा बदलाव किया गया है। अब बायबैक से होने वाली कमाई पर फिर से कैपिटल गेन्स के नियम लागू होंगे। इसका मतलब है कि अब टैक्स इस बात पर निर्भर करेगा कि आपने विप्रो या औरोबिंदो फार्मा जैसी कंपनियों के उन शेयरों को कितने समय तक अपने पास होल्ड करके रखा था।
शेयर बाजार में निवेश करते वक्त सिर्फ रिटर्न देखना ही काफी नहीं होता है, बल्कि टैक्स कटने के बाद आपके हाथ में कितना पैसा बचेगा, यह समझना भी बहुत जरूरी है। विप्रो और सिएंट जैसी कंपनियां जब बायबैक लाती हैं, तो आपको यह देखना होगा कि आपके पास वे शेयर कितने पुराने हैं। इसी तरह एचडीएफसी बैंक जैसे भारी डिविडेंड देने वाले शेयरों के मामले में आपको अपने टैक्स स्लैब का ध्यान रखना होगा। टैक्स की अलग-अलग दरों की वजह से आपके नेट प्रॉफिट पर काफी बड़ा असर पड़ सकता है। इसलिए जब भी कोई कंपनी बोनस या बायबैक का एलान करे, तो उसके टैक्स इम्पैक्ट को जरूर समझ लें ताकि आपके फ्यूचर की प्लानिंग खराब न हो।
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