पर्सनल फाइनेंस
.png)
5 min read | अपडेटेड July 02, 2026, 14:48 IST
सारांश
नौकरीपेशा लोगों के लिए ईपीएफ (EPFO) और एनपीएस (NPS) रिटायरमेंट फंड जुटाने और टैक्स बचाने के दो सबसे बड़े जरिए हैं। ओल्ड टैक्स रिजीम और न्यू टैक्स रिजीम के तहत इन दोनों योजनाओं में टैक्स छूट के नियम बिल्कुल अलग हैं।

वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए आईटीआर दाखिल करने का सीजन चल रहा है। | Image: Shutterstock.
देश में इस समय इनकम टैक्स रिटर्न यानी आईटीआर भरने का सीजन चल रहा है और वित्त वर्ष 2025-26 के लिए रिटर्न दाखिल करने की आखिरी तारीख 31 जुलाई 2026 नजदीक आ रही है। ऐसे में हर नौकरीपेशा व्यक्ति अपने निवेश को सुरक्षित करने के साथ-साथ ज्यादा से ज्यादा टैक्स बचाने के रास्ते तलाश रहा है। भारत में लॉन्ग टर्म वेल्थ क्रिएशन और टैक्स सेविंग के लिए कर्मचारी भविष्य निधि यानी ईपीएफ और नेशनल पेंशन स्कीम यानी NPS को सबसे बेस्ट साधन माना जाता है। हालांकि, इन दोनों में टैक्स बचाने का फॉर्मूला इस बात पर निर्भर करता है कि आप अपने लिए ओल्ड टैक्स रिजीम चुनते हैं या फिर न्यू टैक्स रिजीम को अपनाते हैं। दोनों ही टैक्स व्यवस्थाओं में इन दोनों सरकारी योजनाओं के लिए टैक्स डिडक्शन के नियम पूरी तरह से अलग हैं।
अगर आप उन टैक्सपेयर्स में से हैं जो आज भी ओल्ड टैक्स रिजीम के जरिए अपना रिटर्न दाखिल करना पसंद करते हैं, तो आपके लिए ईपीएफ और एनपीएस दोनों मिलकर टैक्स बचाने का एक बहुत ही शानदार मौका देते हैं। ओल्ड टैक्स रिजीम में कर्मचारी का अपने ईपीएफ अकाउंट में जाने वाला योगदान इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80C के तहत टैक्स छूट के दायरे में आता है। सेक्शन 80सी के तहत आप साल में अधिकतम 1,50,000 रुपये तक के निवेश पर डिडक्शन का दावा कर सकते हैं। इसके ऊपर, अगर आप अपने टैक्स को और ज्यादा कम करना चाहते हैं, तो एनपीएस आपके लिए एक बड़ा हथियार साबित होता है। एनपीएस के टियर-1 अकाउंट में किए जाने वाले खुद के स्वैच्छिक योगदान पर आपको सेक्शन 80CCD(1B) के तहत 50,000 रुपये का एक एक्सक्लूसिव और अतिरिक्त टैक्स डिडक्शन मिलता है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि ओल्ड टैक्स रिजीम में आप EPF और NPS के कॉम्बिनेशन से अपनी कुल टैक्सेबल इनकम को सीधे 2,00,000 रुपये तक कम कर सकते हैं।
सरकार ने न्यू टैक्स रिजीम को देश में डिफॉल्ट टैक्स सिस्टम बना दिया है, जिसमें टैक्स की दरें तो काफी कम हैं, लेकिन इसमें मिलने वाली अधिकांश व्यक्तिगत छूटों को खत्म कर दिया गया है। अगर आप न्यू टैक्स रिजीम के तहत टैक्स फाइल कर रहे हैं, तो आपको यह ध्यान रखना होगा कि यहां सेक्शन 80C की 1,50,000 रुपये वाली छूट और एनपीएस में खुद से निवेश करने पर मिलने वाली 50,000 रुपये की अतिरिक्त छूट पूरी तरह से गायब हो जाती है। यानी न्यू टैक्स रिजीम में आपके अपने ईपीएफ योगदान या खुद से किए गए NPS इनवेस्टमेंट पर शुरुआत में कोई टैक्स डिडक्शन नहीं मिलता है। हालांकि, सरकार ने इस नई व्यवस्था में एनपीएस के जरिए टैक्स बचाने का एक बहुत ही गुप्त और शक्तिशाली रास्ता खुला रखा है, जिसे कॉरपोरेट या एंप्लॉयर एनपीएस कंट्रीब्यूशन कहा जाता है।
न्यू टैक्स रिजीम में पर्सनल डिडक्शन खत्म होने के बावजूद सेक्शन 80CCD(2) के तहत मिलने वाला फायदा पूरी तरह से लागू रहता है। इस नियम के मुताबिक, अगर आपकी कंपनी या आपका एंप्लॉयर आपके एनपीएस टियर-1 अकाउंट में अपनी तरफ से पैसे जमा करता है, तो उस पूरी रकम पर आप टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं। बजट के नए प्रावधानों के तहत अब सभी सेक्टर्स के कर्मचारियों के लिए एंप्लॉयर अपने कर्मचारी की बेसिक सैलरी और DA के अधिकतम 14 पर्सेंट तक के हिस्से को एनपीएस में कंट्रीब्यूट कर सकता है, जो कि पूरी तरह से टैक्स-फ्री होता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी कर्मचारी की बेसिक पे 10,00,000 रुपये है और उसकी कंपनी उसके एनपीएस खाते में 1,40,000 रुपये जमा करती है, तो उसकी टैक्सेबल इनकम सीधे तौर पर 1,40,000 रुपये कम हो जाएगी, जिससे उसका टैक्स बहुत हद तक बच जाएगा।
टैक्स बचाने के इस पूरे खेल में सरकार ने एक ऊपरी सीमा भी तय की है ताकि बहुत ज्यादा सैलरी पाने वाले लोग इसका गलत फायदा न उठा सकें। नियम के अनुसार, एक वित्तीय वर्ष में एंप्लॉयर की तरफ से कर्मचारी के EPF, NPS और सुपरएनुएशन फंड में किया जाने वाला कुल संचयी योगदान अधिकतम 7,50,000 रुपये तक ही टैक्स-फ्री हो सकता है। अगर इन तीनों फंडों को मिलाकर कंपनी का कुल योगदान 7.5 लाख रुपये की सीमा को पार करता है, तो अतिरिक्त रकम को कर्मचारी की सैलरी का हिस्सा मानकर उस पर नॉर्मल टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स वसूल लिया जाता है। इसके अलावा, ईपीएफ के ब्याज पर भी एक खास नियम लागू होता है। अगर किसी कर्मचारी का अपना व्यक्तिगत ईपीएफ योगदान एक साल में 2,50,000 रुपये से ज्यादा हो जाता है, तो उस 2.5 लाख रुपये से ऊपर जमा की गई राशि पर मिलने वाला ब्याज पूरी तरह से टैक्सेबल हो जाता है।
बता दें कि NPS के नए नियमों के तहत अब रिटायरमेंट के समय उस 60 पर्सेंट हिस्से को एक बार में ही पूरा निकालना जरूरी नहीं है। आप चाहें तो सिस्टमैटिक लम्पसम विड्रॉल यानी एसएलडब्ल्यू विकल्प को चुनकर इस 60 पर्सेंट पैसे को अपनी पसंद के हिसाब से मंथली, क्वार्टरली, हाफ-इयरली या सालाना आधार पर किस्तों में निकाल सकते हैं। ध्यान रहे नए बदलाव के बाद यह शानदार सुविधा आप 85 साल की उम्र तक उठा सकते हैं, जिससे आपका बचा हुआ पैसा फंड में ही रहकर लगातार रिटर्न कमाता रहता है।
पेंशन रेगुलेटर पीएफआरडीए (PFRDA) के लेटेस्ट नियमों के मुताबिक, बिना एन्युटी या पेंशन प्लान खरीदे 100 पर्सेंट एकमुश्त रकम निकालने की इस लिमिट को 5 लाख रुपये से बढ़ाकर अब सीधे 8 लाख रुपये कर दिया गया है। इसका मतलब यह है कि अगर किसी व्यक्ति का कुल एनपीएस फंड 8 लाख रुपये या उससे कम है, तो उसे अनिवार्य रूप से पेंशन प्लान खरीदने की कोई जरूरत नहीं है और वह अपना पूरा 100 पर्सेंट पैसा एक साथ टैक्स-फ्री निकाल सकता है।
संबंधित समाचार
लेखकों के बारे में
.png)
अगला लेख
Employees’ Deposit Linked Insurance, 2026: All You Need to Know
Employees' Pension Scheme (EPS) 2026 Explained: Eligibility, Benefits, and Key Changes
How to Apply for a Duplicate PAN Card: A Complete Step-by-Step Guide
Explore Learning Centre
All topics · stocks, MFs, derivatives, IPOs