पर्सनल फाइनेंस
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3 min read | अपडेटेड January 13, 2026, 15:49 IST
सारांश
क्रेडिट कार्ड धारक के निधन के बाद बकाया बिल की जिम्मेदारी को लेकर अक्सर परिवार परेशान रहता है। नियम के अनुसार, क्रेडिट कार्ड एक असुरक्षित कर्ज है। यदि मृतक के नाम कोई संपत्ति है, तो बैंक उससे वसूली कर सकता है, वरना कानूनी वारिस को अपनी जेब से भुगतान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

क्रेडिट कार्ड बिल की वसूली के लिए बैंक केवल क्या तरीका अपनाते हैं।
आज के दौर में क्रेडिट कार्ड हमारी जीवनशैली का एक अहम हिस्सा बन गया है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर किसी क्रेडिट कार्ड धारक की अचानक मृत्यु हो जाए, तो उसके बकाया बिल का क्या होता है? क्या बैंक यह पैसा मृतक के परिवार या उसके बच्चों से वसूल सकते हैं? यह एक ऐसा सवाल है जो बहुत से लोगों को डराता है। भारतीय रिजर्व बैंक और भारतीय कानून इस बारे में बहुत स्पष्ट दिशा-निर्देश देते हैं। असल में, क्रेडिट कार्ड का बिल एक असुरक्षित कर्ज यानी अनसिक्योर्ड लोन की कैटेगरी में आता है, जिसका मतलब है कि इसके बदले बैंक के पास कोई गारंटी या संपत्ति गिरवी नहीं होती है।
कानूनी तौर पर, किसी भी व्यक्ति का कर्ज उसकी मृत्यु के साथ पूरी तरह खत्म नहीं होता, लेकिन उसे चुकाने की जिम्मेदारी उसके कानूनी वारिसों पर व्यक्तिगत रूप से नहीं डाली जा सकती। इसका मतलब यह है कि अगर किसी पिता ने क्रेडिट कार्ड का बिल नहीं चुकाया है, तो बैंक उसके बेटे को अपनी निजी कमाई से वह पैसा भरने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। हालांकि, इसमें एक बड़ा पेंच यह है कि यदि मृतक ने अपने पीछे कोई संपत्ति, मकान या बैंक बैलेंस छोड़ा है, तो बैंक उस संपत्ति से अपने बकाया की वसूली करने का कानूनी अधिकार रखते हैं। कानूनी वारिस की जिम्मेदारी केवल उसी हद तक होती है, जितनी संपत्ति उसे विरासत में मिली है।
चूंकि क्रेडिट कार्ड एक असुरक्षित कर्ज है, इसलिए बैंकों के लिए इसकी वसूली करना होम लोन या कार लोन की तुलना में थोड़ा कठिन होता है। जब बैंक को कार्ड धारक की मृत्यु की सूचना मिलती है, तो वह सबसे पहले खाते को फ्रीज कर देता है। इसके बाद बैंक यह पता लगाने की कोशिश करता है कि क्या मृतक के पास कोई ऐसी संपत्ति है जिसे बेचकर या इस्तेमाल करके बिल भरा जा सके। यदि मृतक के पास कोई संपत्ति नहीं है और उसने कोई विरासत नहीं छोड़ी है, तो अंत में बैंक को उस बकाया राशि को 'राइट ऑफ' यानी बट्टे खाते में डालना पड़ता है। ऐसी स्थिति में बैंक परिवार के सदस्यों को परेशान नहीं कर सकते।
मामला तब बदल जाता है जब क्रेडिट कार्ड 'जॉइंट' यानी संयुक्त रूप से लिया गया हो। यदि कार्ड में कोई सह-आवेदक है, तो प्राथमिक कार्ड धारक की मृत्यु के बाद पूरा बकाया चुकाने की जिम्मेदारी जीवित पार्टनर की होती है। इसी तरह, अगर परिवार का कोई सदस्य 'एड-ऑन' कार्ड इस्तेमाल कर रहा है, तो उसे भी सावधानी बरतनी चाहिए। मुख्य कार्ड धारक की मृत्यु के बाद एड-ऑन कार्ड का इस्तेमाल करना धोखाधड़ी माना जा सकता है। एड-ऑन कार्ड धारक बिल के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं होते, लेकिन वे कार्ड का इस्तेमाल जारी नहीं रख सकते। आरबीआई के नियमों के अनुसार, बैंक के वसूली एजेंट परिवार को मानसिक रूप से प्रताड़ित नहीं कर सकते और उन्हें शिष्टाचार का पालन करना अनिवार्य है।
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