मार्केट न्यूज़

3 min read | अपडेटेड March 27, 2026, 10:06 IST
सारांश
भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार को बड़ी गिरावट देखी गई। सेंसेक्स और निफ्टी 1 पर्सेंट से ज्यादा टूट गए। ग्लोबल मार्केट में कमजोरी और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने निवेशकों का भरोसा हिला दिया है।

शेयर बाजार में शुक्रवार को भारी बिकवाली से निवेशकों के करोड़ों रुपये डूब गए।
भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार को दो दिनों की शानदार तेजी के बाद अचानक ब्रेक लग गया। सुबह होते ही बाजार में बिकवाली का ऐसा दौर शुरू हुआ कि सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही 1 पर्सेंट से ज्यादा नीचे आ गए। निवेशकों को उम्मीद थी कि मिडिल ईस्ट का तनाव जल्द खत्म होगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार से आए संकेतों ने इस उम्मीद पर पानी फेर दिया। निफ्टी 23,000 के अहम लेवल के बेहद करीब पहुंच गया है, जबकि सेंसेक्स में 800 से ज्यादा अंकों की गिरावट देखी गई। इस गिरावट ने बाजार का सेंटीमेंट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। बाजार के इस तरह अचानक टूटने के पीछे 4 बड़े कारण रहे हैं।
बाजार टूटने की पहली और सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच खत्म न होने वाला तनाव है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही ईरान के एनर्जी ठिकानों पर हमलों को 10 दिनों के लिए टालने का ऐलान किया हो, लेकिन ईरान की ओर से आए बयान ने डर बढ़ा दिया है। ईरानी अधिकारियों ने अमेरिकी प्रस्ताव को एकतरफा और गलत बताया है। निवेशकों को अब लगने लगा है कि यह विवाद अभी लंबा खिंच सकता है। जब तक मिडिल ईस्ट में शांति की कोई ठोस खबर नहीं आती, तब तक मार्केट में अनिश्चितता बनी रहेगी। युद्ध लंबा चलने का मतलब है कि ग्लोबल सप्लाई चेन पर बुरा असर पड़ेगा जिससे कंपनियों के ऑपरेशन पर भी भारी दबाव आएगा।
भारतीय बाजार के गिरने के पीछे दूसरा बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय संकेतों का कमजोर होना है। अमेरिकी शेयर बाजार में गुरुवार रात को भारी बिकवाली देखी गई और वहां के प्रमुख इंडेक्स करीब 2 पर्सेंट तक गिर गए। इसके साथ ही अमेरिका में 10 साल की ट्रेजरी यील्ड 4.4 पर्सेंट के ऊपर चली गई है। जब अमेरिका में यील्ड बढ़ती है, तो विदेशी निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से अपना पैसा निकालकर वहां सुरक्षित निवेश करने लगते हैं। इसका असर आज एशियाई बाजारों पर भी दिखा। साउथ कोरिया का मार्केट 2.7 पर्सेंट तक गिर गया और ताइवान के बाजार में भी 1.4 पर्सेंट की गिरावट आई। इसी ग्लोबल कमजोरी ने भारतीय निवेशकों का भरोसा तोड़ दिया।
तीसरा बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों का 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बने रहना है। ट्रंप के हमलों को टालने वाले बयान के बाद ब्रेंट क्रूड के दाम में थोड़ी कमी जरूर आई और यह 106 डॉलर के आसपास ट्रेड कर रहा है, लेकिन यह अभी भी भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ज्यादा है। अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर के ऊपर रहता है, तो इससे भारत में महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है। जानकारों का कहना है कि अगर यह युद्ध लंबा चला तो भारत की आर्थिक स्थिरता और फ्यूचर ग्रोथ पर बुरा असर पड़ सकता है। तेल महंगा होने से कंपनियों का नेट प्रॉफिट और EBITDA कम होने का डर रहता है, जिससे उनके शेयर गिर रहे हैं।
चौथी और सबसे अहम वजह भारतीय रुपये की कमजोरी है। आज रुपया इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया और पहली बार 1 डॉलर के मुकाबले 94 के स्तर को पार कर गया। रुपया गिरकर 94.25 के रिकॉर्ड स्तर पर आ गया है। जब रुपया कमजोर होता है, तो भारत के लिए तेल और अन्य चीजों का इंपोर्ट करना बहुत महंगा हो जाता है। इससे देश के कुल रेवेन्यू और खजाने पर बुरा असर पड़ता है।
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