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4 min read | अपडेटेड August 26, 2026, 16:27 IST
सारांश
घरेलू लिक्विडिटी और निवेशकों के बेहतर सेंटीमेंट के चलते भारतीय कंपनियों ने कैपिटल मार्केट से भारी फंड जुटाया है। पिछले दो महीनों में IPO, QIP और OFS के जरिए जुटाया गया यह आंकड़ा अक्टूबर-नवंबर 2024 के बाद सबसे बड़ा है।

कैपिटल मार्केट में भारतीय कंपनियों ने IPO और OFS के माध्यम से भारी फंड जुटाया है।| Image: Shutterstock
घरेलू लिक्विडिटी और निवेशकों के लगातार बेहतर होते सेंटीमेंट ने कोर इक्विटी इंडेक्स में सीमित उतार-चढ़ाव के बावजूद कैपिटल मार्केट को पूरी तरह से एक्टिव रखा है। भारतीय कंपनियों यानी इंडिया इंक ने पिछले दो महीनों में जिस तरह से फंड जुटाया है, वह आंकड़ा अक्टूबर-नवंबर 2024 के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा बन गया है। उस समय इन अलग-अलग माध्यमों से 1.14 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा जुटाए गए थे। बाजार में आई इस तेजी से कंपनियों को अपनी ग्रोथ और विस्तार योजनाओं के लिए जरूरी पूंजी मिल रही है।
फंड जुटाने के इस पूरे दौर में IPO यानी इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग एक्टिविटी खास तौर पर मजबूत रही है। कुल जुटाए गए फंड का 40% से ज्यादा हिस्सा अकेले IPO के जरिए ही आया है। इस महीने अब तक 20 कंपनियों ने 20,850 करोड़ रुपये से ज्यादा जुटाए हैं। इससे पहले जुलाई के महीने में 12 कंपनियों द्वारा 28,650 करोड़ रुपये जुटाए गए थे। इसके अलावा लिस्टेड कंपनियों ने क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट यानी QIP के जरिए भी पैसे जुटाए हैं। अगस्त में अब तक चार कंपनियों ने 3,250 करोड़ रुपये जुटाए हैं, जबकि जुलाई में आठ कंपनियों ने 25,114 करोड़ रुपये जुटाए थे।
ऑफर फॉर सेल यानी OFS सेगमेंट में, जहां मौजूदा निवेशक आंशिक रूप से अपनी हिस्सेदारी बेचकर पैसा निकालते हैं, लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया यानी एलआईसी ने अगस्त में लगभग 31,447 करोड़ रुपये जुटाए हैं। एलआईसी ने यह कदम देश के सबसे बड़े इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर में पब्लिक फ्लोट को बढ़ाने के लिए उठाया है। इसके अलावा एक और बड़ी पब्लिक सेक्टर कंपनी कोचीन शिपयार्ड ने जुलाई के महीने में लगभग 1,705 करोड़ रुपये जुटाए हैं।
कुछ मार्केट एक्सपर्ट का यह भी मानना है कि प्राइमरी मार्केट के लिए इंडेक्स का तेजी से बढ़ना ही जरूरी नहीं होता है। इसके लिए लिक्विडिटी, उचित उतार-चढ़ाव और अलग-अलग कंपनियों में निवेशकों का भरोसा होना बहुत जरूरी है। वेस्ट एशिया में युद्ध के तुरंत बाद आए भारी उतार-चढ़ाव के दौरान कंपनियों और शेयरधारकों ने अपने ट्रांजैक्शन टाल दिए थे। हालांकि अब वे बेहतर मार्केट का फायदा उठाकर ग्रोथ कैपिटल जुटा रहे हैं, कर्ज कम कर रहे हैं, एक्विजिशन के लिए फंड जुटा रहे हैं, रेगुलेटरी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं और प्रमोटर्स व प्राइवेट-इक्विटी निवेशकों को एग्जिट का मौका दे रहे हैं।
कैपिटल मार्केट में यह तेजी तब देखने को मिली है जब बेंचमार्क इंडेक्स सीमित दायरे में ही रहे हैं। जुलाई में सेंसेक्स और निफ्टी में क्रमशः 2.1% और 2.2% की बढ़त हुई थी, लेकिन अगस्त में कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा होने से इनमें क्रमशः 0.5% और 0.7% की गिरावट आई है। जुलाई में निफ्टी मिडकैप 150 और निफ्टी स्मॉलकैप 250 में क्रमशः 1.6% और 1.1% की बढ़त हुई थी, जबकि अगस्त में अब तक इनमें क्रमशः 1.2% और 2.8% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
इन चुनौतियों में लंबे समय से चल रहा वेस्ट एशिया का संघर्ष, कच्चे तेल व लॉजिस्टिक्स की बढ़ती कॉस्ट और एआई के दौर में आईटी कंपनियों की कमाई के टिकाऊपन को लेकर चिंताएं शामिल हैं। हालांकि घरेलू संस्थागत और रिटेल निवेश ने विदेशी निवेशकों की उतार-चढ़ाव वाली खरीदारी को संतुलित किया है। जुलाई में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी SIP के जरिए रिटेल निवेश लगभग 31,961 करोड़ रुपये रहा, जबकि एक्टिव इक्विटी फंड्स को लगभग 24,700 करोड़ रुपये मिले।
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