मार्केट न्यूज़

3 min read | अपडेटेड April 22, 2026, 13:07 IST
सारांश
NSE की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय शेयर बाजार में बड़ा ढांचागत बदलाव दिख रहा है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बावजूद DII और SIP के रिकॉर्ड निवेश ने बाजार को संभाला है। अब बाजार में लार्ज कैप कंपनियों का दबदबा कम हो रहा है और मिडकैप तेजी से उभर रहे हैं।

घरेलू निवेशकों और SIP की बढ़ती ताकत ने शेयर बाजार के पुराने समीकरण बदल दिए हैं।
भारतीय शेयर बाजार के लिए पिछला एक साल काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। एक तरफ दुनिया भर में भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध जैसे बाहरी झटके लग रहे थे, तो दूसरी तरफ भारतीय बाजार के भीतर एक बड़ी खामोश क्रांति हो रही थी। NSE की ताजा रिपोर्ट 'मार्केट पल्स अप्रैल 2026' के आंकड़े बताते हैं कि विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बावजूद घरेलू निवेशकों ने जिस तरह से मोर्चा संभाला है, उसने बाजार की पूरी तस्वीर ही बदल कर रख दी है। अब बाजार सिर्फ कुछ चुनिंदा बड़ी कंपनियों के भरोसे नहीं चल रहा है, बल्कि इसमें एक बड़ी गहराई और डायवर्सिफिकेशन आ गया है। रिटेल निवेशकों के भरोसे ने बाजार को एक नया आधार दिया है।
वित्त वर्ष 2026 में जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी FPI बाजार से अपना पैसा निकाल रहे थे, तब घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी DII ने बाजार को ढाल बनकर सहारा दिया। पूरे साल के दौरान DII ने कुल 8.5 लाख करोड़ रुपये का नेट निवेश किया, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। यह पिछले साल यानी वित्त वर्ष 2025 के 6.1 लाख करोड़ रुपये के निवेश से कहीं ज्यादा है। मार्च 2026 में जब बाजार में 11.3 पर्सेंट की भारी गिरावट आई, तब अकेले उसी महीने में DII ने 1.43 लाख करोड़ रुपये की खरीदारी की। यह साल 2008 के बाद किसी भी एक महीने में की गई सबसे बड़ी खरीदारी है।
इस मजबूती के पीछे सबसे बड़ा हाथ आम आदमी की छोटी-छोटी बचत यानी SIP का रहा है। रिटेल निवेशकों ने अनुशासन के साथ बाजार में पैसा लगाना जारी रखा। वित्त वर्ष 2026 में हर महीने होने वाला औसत SIP निवेश बढ़कर 29,132 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो पिछले साल 24,113 करोड़ रुपये था। सिर्फ मार्च 2026 में SIP के जरिए 32,087 करोड़ रुपये का निवेश आया, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। पूरे वित्त वर्ष में कुल एसआईपी निवेश 3.5 लाख करोड़ रुपये रहा, जिसमें पिछले साल के मुकाबले 21 पर्सेंट की शानदार बढ़ोतरी देखी गई।
NSE की रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू लार्ज कैप स्टॉक्स के घटते दबदबे को लेकर है। दशकों से बाजार पर राज करने वाले निफ्टी-50 इंडेक्स की हिस्सेदारी कुल मार्केट कैप में लगातार गिर रही है। साल 2014 में जहां निफ्टी 50 की हिस्सेदारी 62.3 पर्सेंट हुआ करती थी, वह अब 21 साल के सबसे निचले स्तर यानी 43.8 पर्सेंट पर आ गई है। इसकी जगह अब मिडकैप कंपनियां ले रही हैं। मिडकैप 250 इंडेक्स की मार्केट कैप में हिस्सेदारी मार्च 2026 तक बढ़कर 21 पर्सेंट के रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गई है। पिछले पांच सालों में मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स ने लार्ज कैप के मुकाबले कहीं ज्यादा रिटर्न दिया है।
बाजार में अब रिस्क कम हो रहा है क्योंकि पैसा किसी एक सेक्टर या कंपनी में नहीं बल्कि हर तरफ फैल रहा है। सेक्टर्स के नजरिए से देखें तो आईटी सेक्टर का दबदबा अब 200 महीनों के सबसे निचले लेवल पर आ गया है, जबकि एनर्जी और कम्युनिकेशन सर्विसेज जैसे सेक्टर्स की हिस्सेदारी बढ़ रही है। बाजार की गहराई को नापने वाले पैमाने यानी HHI इंडेक्स पर नजर डालें तो यह 79 के लेवल पर है, जो पिछले 23 सालों में सबसे कम है। इसका मतलब यह है कि बाजार अब बहुत ज्यादा डायवर्सिफाइड हो चुका है। अब बाजार की सेहत सिर्फ कुछ बड़ी कंपनियों के मुनाफे पर टिकी नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़े और मजबूत इकोसिस्टम में बदल चुका है।
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