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5 min read | अपडेटेड June 15, 2026, 12:51 IST
सारांश
US-Iran Deal: शुरुआती हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की मौत हो गई थी। युद्ध के दौरान ईरान ने इजराइल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज को लगभग बंद कर दिया, जिससे दुनिया भर में तेल आपूर्ति प्रभावित हुई।

US-Iran Deal: सीजफायर की खबर के बाद कच्चे तेल की कीमतों में करीब 4% की गिरावट आई।
शुरुआती हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की मौत हो गई थी। युद्ध के दौरान ईरान ने इजराइल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज को लगभग बंद कर दिया, जिससे दुनिया भर में तेल आपूर्ति प्रभावित हुई।
अमेरिका ने जवाब में ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी कर दी। इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा, तेल की कीमतें बढ़ गईं, शिपिंग बाधित हुई और कई देशों में महंगाई की चिंता बढ़ गई। वहीं लेबनान भी इस संघर्ष का बड़ा केंद्र बन गया, जहां इजराइल और Hezbollah के बीच लड़ाई तेज हो गई।
समझौते के तहत सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई रोकने, लेबनान में भी संघर्ष खत्म करने और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज को फिर से खोलने पर सहमति बनी है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि अब जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू होगी और तेल की सप्लाई सामान्य होगी। ईरान ने भी पुष्टि की है कि सोमवार रात से सैन्य गतिविधियां स्थायी रूप से रोक दी जाएंगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक अगले 60 दिनों के युद्धविराम के दौरान दोनों देश प्रतिबंधों में राहत, परमाणु कार्यक्रम और आपसी संबंधों जैसे मुद्दों पर विस्तृत बातचीत करेंगे।
सीजफायर की खबर के बाद कच्चे तेल की कीमतों में करीब 4% की गिरावट आई और एशियाई शेयर बाजारों में तेजी देखने को मिली। इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा वैश्विक बाजारों और ऊर्जा आयात करने वाले देशों को मिला है। निवेशकों को उम्मीद है कि तेल की सप्लाई सामान्य होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि स्थिति तुरंत सामान्य नहीं होगी। कई महीनों से खाड़ी क्षेत्र में फंसे तेल टैंकरों को बाहर निकलने, नई खेप भेजने और रिफाइनरियों तक तेल पहुंचाने में समय लगेगा। कुछ देशों को उत्पादन पूरी तरह बहाल करने में महीनों या यहां तक कि एक साल तक का समय लग सकता है।
यह समझौता ट्रंप प्रशासन के लिए भी बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। अमेरिका में बढ़ती तेल कीमतें और लंबे युद्ध की आशंका नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले राजनीतिक दबाव बढ़ा रही थीं। युद्धविराम से ट्रंप यह दावा कर सकते हैं कि उन्होंने बिना लंबे जमीनी युद्ध में फंसे अपने प्रमुख लक्ष्य हासिल कर लिए। हालांकि आलोचकों का कहना है कि अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पर्याप्त गारंटी हासिल किए बिना कई रियायतें दे दी हैं।
ईरान ने इस युद्ध में भारी कीमत चुकाई है। उसके सर्वोच्च नेता की मौत हुई, कई सैन्य अधिकारी मारे गए और देश के बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा। बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित होना पड़ा और हजारों लोगों की जान गई।
इसके बावजूद ईरान को कुछ अहम कूटनीतिक लाभ मिले हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक उसे फ्रीज किए हुए अरबों डॉलर के फंड तक पहुंच मिल सकती है और अमेरिका के साथ प्रतिबंधों में राहत को लेकर बातचीत का रास्ता खुला है। इसके अलावा ईरान अभी भी अपने मिसाइल कार्यक्रम और उच्च स्तर पर समृद्ध यूरेनियम के भंडार को बनाए हुए है।
युद्ध शुरू करने में इजराइल की बड़ी भूमिका थी, लेकिन अंतिम बातचीत अमेरिका और ईरान के बीच हुई, जिसमें इजराइल सीधे शामिल नहीं था। खासकर लेबनान में युद्धविराम को लेकर इजराइल और अमेरिका के बीच मतभेद सामने आए। अब इजराइल को ऐसे युद्धविराम ढांचे का पालन करना होगा, जिसे तय करने में उसकी सीधी भूमिका नहीं रही।
इस पूरे संघर्ष में लेबनान सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में रहा। इजराइल और हिज्बुल्लाह के बीच लड़ाई ने वहां भारी तबाही मचाई। हजारों लोग मारे गए और बड़ी संख्या में लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए। सीजफायर से शांति की उम्मीद जरूर जगी है, लेकिन देश के पुनर्निर्माण और विस्थापित लोगों की वापसी में लंबा समय लग सकता है।
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे अमेरिकी सहयोगी खाड़ी देशों को युद्ध के दौरान ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों का सामना करना पड़ा। इससे उन्हें आर्थिक और सुरक्षा संबंधी नुकसान हुआ।
हालांकि लंबे समय में ईरान की क्षेत्रीय ताकत कमजोर होने से इन देशों को रणनीतिक फायदा भी मिल सकता है। इसलिए इस समझौते का असर उनके लिए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह का माना जा रहा है।
युद्धविराम के बावजूद सबसे बड़ा अनसुलझा मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। ईरान के पास 400 किलोग्राम से अधिक उच्च स्तर पर समृद्ध यूरेनियम मौजूद है। अमेरिका चाहता है कि इसे नष्ट किया जाए या किसी दूसरे देश को सौंप दिया जाए, जबकि ईरान इसे अपने पास रखना चाहता है। यूरोपीय देशों ने भी साफ कहा है कि प्रतिबंधों में राहत तभी मिलेगी जब ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर पारदर्शी और भरोसेमंद कदम उठाएगा।
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