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कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट, क्या सस्ते होंगे पेट्रोल-डीजल, किन फैक्टर्स ने बदले ग्लोबल समीकरण?

Namita Shukla

4 min read | अपडेटेड November 05, 2026, 08:06 IST

सारांश

कुल मिलाकर, इस हफ्ते अब तक इंटरनेशनल ऑयल बेंचमार्क में लगभग 16% की गिरावट आई है। मिडटर्म इलेक्शन और ऑयल सप्लाई समेत कुल चार ऐसे कारण हैं, जिनके चलते क्रूड ऑयल के दाम फिसले हैं।

कच्चा तेल

कच्चे तेल के दामों में भारी गिरावट के क्या हैं कारण? (Photo: Shutterstock)

आज ब्रेंट क्रूड की कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रही। इससे पहले के सेशन में इसमें लगभग 9% की गिरावट आई थी, जिससे कीमतें दो महीने के निचले स्तर पर पहुंच गईं। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब अमेरिकी मिडटर्म इलेक्शन्स में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत ने इस उम्मीद को हवा दी है कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन पर ईरान के साथ युद्ध खत्म करने का दबाव बढ़ सकता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने माना कि रिपब्लिकन पार्टी को हुए नुकसान के पीछे मुख्य रूप से यह संघर्ष जिम्मेदार है, और उन्होंने पेट्रोल की बढ़ती कीमतों को भी एक बड़ा कारण बताया। साथ ही, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ईरान के खिलाफ सैन्य हमलों को बढ़ाने की उनकी कोई तत्काल योजना नहीं है।

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डेमोक्रेटिक पार्टी के कंट्रोल वाली कांग्रेस मिडिल ईस्ट में सैन्य अभियानों के लिए मिलने वाली फंडिंग को सीमित कर सकती है। सीनेट में अल्पसंख्यक नेता चक शुमर ने इस संघर्ष को खत्म करने के लिए जोर देने का संकल्प लिया है। इस बीच, फारस की खाड़ी से कच्चे तेल के निर्यात में सुधार होने लगा है, जहां सप्लाई अब निकट अवधि की मांग से अधिक हो गई है। कुल मिलाकर, इस हफ्ते अब तक इंटरनेशनल ऑयल बेंचमार्क में लगभग 16% की गिरावट आई है। मिडटर्म इलेक्शन और ऑयल सप्लाई समेत कुल चार ऐसे कारण हैं, जिनके चलते क्रूड ऑयल के दाम फिसले हैं-

अमेरिका-ईरान तनाव कम होने की उम्मीद

ब्रेंट क्रूड में गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने की उम्मीद मानी जा रही है। लंबे समय से दोनों देशों के बीच संघर्ष के कारण तेल सप्लाई बाधित होने का डर बना हुआ था। अब युद्ध समाप्त होने और शांति समझौते की संभावना से बाजार में राहत का माहौल बना है। इससे तेल की कीमतों में शामिल युद्ध जोखिम प्रीमियम तेजी से कम हुआ है।

तेल सप्लाई सामान्य होने की संभावना

मिडिल ईस्ट दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। यहां तनाव बढ़ने पर ग्लोबल तेल सप्लाई प्रभावित होने का खतरा रहता है। लेकिन अब हालात सुधरने की उम्मीद से बाजार को लग रहा है कि आने वाले समय में तेल की सप्लाई बेहतर हो सकती है। सप्लाई बढ़ने की संभावना कीमतों पर दबाव डाल रही है।

अमेरिकी राजनीति का भी असर

अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के नतीजों ने भी बाजार की दिशा प्रभावित की है। राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव और ट्रंप प्रशासन पर युद्ध समाप्त करने के संभावित दबाव को निवेशक अहम संकेत के रूप में देख रहे हैं। इससे तेल बाजार में अनिश्चितता कम होने की उम्मीद बढ़ी है।

मुनाफावसूली ने बढ़ाई गिरावट

जब युद्ध और सप्लाई संकट के डर से तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी थीं, तब कई निवेशकों ने ऊंचे स्तर पर खरीदारी की थी। अब शांति की उम्मीदों के बीच ट्रेडर्स मुनाफावसूली कर रहे हैं। बड़े स्तर पर बिकवाली होने से कीमतों में गिरावट और तेज हो गई है।

कच्चे तेल की गिरती कीमतें दे सकती हैं भारत को राहत

कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत के लिए राहत की खबर हो सकती है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। तेल सस्ता होने से आयात बिल कम हो सकता है, महंगाई पर दबाव घट सकता है और रुपये को भी सहारा मिल सकता है। हालांकि, इंटरनेशनल मार्केट में तेल सस्ता होने का फायदा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तुरंत दिखाई देना जरूरी नहीं है। घरेलू कीमतें सरकार की नीतियों, टैक्स, रुपये की विनिमय दर और तेल कंपनियों के फैसलों पर भी निर्भर करती हैं।

आगे क्या कुछ होने की संभावना?

विशेषज्ञों की नजर अब अमेरिका-ईरान वार्ता, मिडिल ईस्ट की स्थिति और ग्लोबल तेल मांग पर है। अगर तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य रहती है, तो कीमतों पर दबाव जारी रह सकता है। लेकिन युद्ध दोबारा बढ़ने या सप्लाई बाधित होने पर ब्रेंट क्रूड में फिर तेजी देखने को मिल सकती है।

लेखकों के बारे में

Namita Shukla
Namita Shukla is a seasoned journalist with over 15 years of experience in Hindi media. She has worked with some of the most reputed news organizations, including Navbharat Times, Dainik Jagran, Aaj Tak, and Hindustan Times Hindi. Throughout her career, Namita has reported on a wide range of beats such as national affairs, sports, business, and entertainment, bringing clarity and depth to her reporting. In addition to her journalistic work, she is a certified fact-checker by both Google and Meta, underscoring her commitment to accuracy and ethical journalism in the digital age.

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