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4 min read | अपडेटेड June 05, 2026, 14:33 IST
सारांश
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश में पॉलीमर यानी प्लास्टिक के करेंसी नोट जारी करने के एक प्रस्ताव पर विचार कर रहा है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को बताया कि यह योजना अभी शुरुआती स्टेज में है। इससे नोटों की लाइफ बढ़ेगी और प्रिंटिंग का खर्च कम होगा।

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने देश में पॉलीमर करेंसी नोट लाने के प्रस्ताव की जानकारी दी। | Image: Shutterstock
भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI आने वाले समय में देश की करेंसी में एक बहुत बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रहा है। अब आपकी जेब में दिखने वाले कागज के नोटों की जगह प्लास्टिक के यानी पॉलीमर नोट ले सकते हैं। आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 5 जून को इस बात का एलान किया है कि केंद्रीय बैंक देश में पॉलीमर करेंसी नोट लॉन्च करने के एक प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ कर दिया है कि यह पूरा प्लान अभी बिल्कुल शुरुआती यानी प्रिलिमनरी स्टेज में है और इस पर पूरी बारीकी से काम किया जा रहा है। अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता है, तो भारतीय मुद्रा के इतिहास में यह एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक कदम होगा।
आरबीआई की ओर से इस तरह के कदम उठाने के पीछे कई बड़ी और महत्वपूर्ण वजहें सामने आ रही हैं। आजकल के समय में भले ही देश के कोने कोने में डिजिटल पेमेंट का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद मार्केट में नगद यानी कैश की डिमांड कम नहीं हुई है। बाजार में नोटों का सर्कुलेशन बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है, जिसकी वजह से नोट बहुत जल्दी गंदे और खराब हो जाते हैं। इन खराब हो चुके नोटों को बाजार से वापस लेने और उनकी जगह नए नोट छापने में आरबीआई को हर साल करोड़ों रुपये का भारी भरकम खर्च उठाना पड़ता है। इसी प्रिंटिंग कॉस्ट यानी छपाई के खर्च को कम करने के लिए पॉलीमर नोटों का विकल्प देखा जा रहा है।
पॉलीमर नोटों का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि ये कागज के नोटों के मुकाबले बहुत ज्यादा मजबूत और टिकाऊ होते हैं। साधारण कपास और कागज से बने नोटों की तुलना में प्लास्टिक के नोटों की लाइफ करीब तीन से चार गुना ज्यादा होती है। इन नोटों पर धूल, मिट्टी और पानी का कोई खास असर नहीं पड़ता है, जिसके कारण ये लंबे समय तक बिल्कुल नए जैसे बने रहते हैं। यहां तक कि अगर ये नोट गलती से कपड़ों के साथ वाशिंग मशीन में भी धुल जाएं, तो भी ये पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं। इसके अलावा इन नोटों को रिसाइकिल करना भी काफी आसान होता है, जिससे पर्यावरण को भी फायदा पहुंचता है।
पॉलीमर करेंसी को लाने का एक और सबसे बड़ा मकसद सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करना है। प्लास्टिक के इन नोटों को इस तरह से डिजाइन किया जाता है कि इनकी नकल करना यानी नकली नोट बनाना लगभग नामुमकिन होता है। उनमें कई तरह के एडवांस सिक्योरिटी फीचर शामिल किए जा सकते हैं, जैसे कि पारदर्शी विंडो, खास तरह की स्याही और होलोग्राम, जिन्हें साधारण तरीके से कॉपी नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि दुनिया भर के कई बड़े देश अपने यहां इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं।
भारत में प्लास्टिक के नोट लाने की कोशिश यह पहली बार नहीं हो रही है। इससे पहले साल 2012 में भी सरकार ने देश के पांच अलग अलग शहरों में ट्रायल के तौर पर 10 रुपये के करीब एक अरब पॉलीमर नोट जारी करने की मंजूरी दी थी। उस समय देश के अलग अलग मौसम वाले शहरों जैसे कोच्चि, मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला को इसके लिए चुना गया था। हालांकि उस दौरान एटीएम मशीनों द्वारा इन नोटों को स्वीकार करने और प्रोसेस करने में कुछ तकनीकी दिक्कतें आई थीं, जिसकी वजह से इस प्रोजेक्ट को आगे नहीं बढ़ाया जा सका था। लेकिन अब तकनीक काफी बदल चुकी है और आज के आधुनिक एटीएम इन नोटों को आसानी से हैंडल करने में पूरी तरह सक्षम हैं।
अगर वैश्विक स्तर पर देखें तो दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में पॉलीमर यानी प्लास्टिक के नोटों का इस्तेमाल पूरी तरह या आंशिक रूप से किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला ऐसा देश था जिसने साल 1988 में सबसे पहले प्लास्टिक का नोट जारी किया था। इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया और न्यूजीलैंड जैसे कई देशों ने इस सिस्टम को अपना लिया। अब भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ने की सोच रहा है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा के इस बयान के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि देश में इस नए पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत कब से होती है और आम जनता के हाथों में ये नए नोट कब तक आते हैं।
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