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4 min read | अपडेटेड October 21, 2026, 13:20 IST
सारांश
इंटरनेशनल मार्केट में सोने की कीमत बढ़ने से भारत में भी सोने के भाव पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, घरेलू कीमतें केवल ग्लोबल भाव से तय नहीं होतीं। रुपये और डॉलर की विनिमय दर, आयात शुल्क, स्थानीय मांग और अन्य लागतें भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

सोने की कीमतों में आएगा बड़ा उछाल? NDB Wealth Management ने दिया 5,000 डॉलर का अनुमान (Photo: Shutterstock)
सोने की कीमतों में पिछले कुछ समय में काफी ज्यादा उतार-चढ़ाव देखा गया है। मौजूदा समय में सोने की कीमत 4,121.60 डॉलर प्रति औंस चल रही है और ऐसा अनुमान है कि आने वाले 12 से 24 महीनों के बीच सोने की कीमत 5,000 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकती है। NDB वेल्थ मैनेजमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक, अगले 12 से 24 महीनों में सोने का भाव 4,200 से 5,000 डॉलर प्रति औंस के दायरे में रह सकता है। रिपोर्ट में केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी और एशियाई बाजारों से मिल रही मजबूत निवेश मांग को सोने की कीमतों के लिए प्रमुख सहारा बताया गया है।
NDB वेल्थ मैनेजमेंट के मुताबिक, आने वाले दो सालों में सोने की कीमतों में मजबूती बनी रह सकती है। रिपोर्ट के समय इंटरनेशनल मार्केट में सोना करीब 4,121.61 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था। रिपोर्ट का अनुमान है कि केंद्रीय बैंकों और एशियाई निवेशकों की खरीदारी सोने को 4,200 से 5,000 डॉलर प्रति औंस के दायरे में बनाए रख सकती है। यह एक अनुमान है, निश्चित कीमत या गारंटी नहीं।
सोने की कीमतों में मजबूती की एक बड़ी वजह दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की खरीदारी है। रिपोर्ट के अनुसार, 2026 की दूसरी तिमाही में केंद्रीय बैंकों ने करीब 289 टन सोना खरीदा। इसका मकसद केवल कीमतों में बढ़ोतरी से फायदा कमाना नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाना और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना भी है। केंद्रीय बैंकों की यह मांग सोने को लंबे समय में सहारा दे सकती है। हालांकि, खरीदारी की रफ्तार में बदलाव होने पर कीमतों पर असर भी पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, एशियाई बाजार भी सोने की मांग बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। 2026 की पहली छमाही में एशियाई गोल्ड फंड में करीब 70 टन का शुद्ध निवेश आया, जो इन फंडों के लिए पहली छमाही का अब तक का सबसे मजबूत प्रदर्शन बताया गया है। इसके विपरीत, उत्तरी अमेरिकी गोल्ड फंड से लगभग 61 टन की निकासी दर्ज की गई। यह अंतर दिखाता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में निवेशकों की रणनीति एक जैसी नहीं है। एशिया में सोने की मांग बढ़ने से इंटरनेशनल मार्केट में इसकी कीमतों को समर्थन मिल सकता है।
परंपरागत रूप से अमेरिकी ब्याज दरों और डॉलर की चाल का सोने की कीमतों पर बड़ा प्रभाव पड़ता रहा है। आम तौर पर ब्याज दरें बढ़ने से बिना ब्याज देने वाली संपत्ति के रूप में सोने की आकर्षकता घट सकती है। लेकिन NDB वेल्थ मैनेजमेंट का मानना है कि केंद्रीय बैंकों और एशियाई निवेशकों की मजबूत मांग के कारण अब सोने की कीमतें केवल अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसलों पर निर्भर नहीं रह गई हैं। इसके बावजूद अमेरिकी ब्याज दरें, महंगाई, डॉलर की मजबूती और भू-राजनीतिक घटनाक्रम सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव ला सकते हैं। इसलिए 5,000 डॉलर का स्तर प्रिडिक्शन है और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आने वाले दो सालों में सोने की कीमत इस स्तर तक पहुंच ही जाएगी।
इंटरनेशनल मार्केट में सोने की कीमत बढ़ने से भारत में भी सोने के भाव पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, घरेलू कीमतें केवल ग्लोबल भाव से तय नहीं होतीं। रुपये और डॉलर की विनिमय दर, आयात शुल्क, स्थानीय मांग और अन्य लागतें भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अगर इंटरनेशनल सोना 5,000 डॉलर प्रति औंस तक पहुंचता है, तो भारत में कीमतों पर तेजी का दबाव बन सकता है, बशर्ते अन्य परिस्थितियां अनुकूल रहें। दूसरी ओर, वैश्विक मांग में कमी, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी धीमी पड़ने या भू-राजनीतिक तनाव कम होने से कीमतों में गिरावट भी आ सकती है।
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