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  1. सोने की कीमतों पर अब युद्ध का असर नहीं तो कौन से फैक्टर्स पड़ रहे भारी? रिपोर्ट में क्या कुछ

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सोने की कीमतों पर अब युद्ध का असर नहीं तो कौन से फैक्टर्स पड़ रहे भारी? रिपोर्ट में क्या कुछ

Upstox

3 min read | अपडेटेड August 10, 2026, 14:17 IST

सारांश

रिपोर्ट में कहा गया कि बाद में शुल्क बढ़ने से उत्पादन लागत और मुद्रास्फीति की अपेक्षाएं बढ़ीं। इससे लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरें बने रहने की आशंका मजबूत हुई और अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिभूतियों की वास्तविक प्रतिफल तथा डॉलर में तेजी आई।

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सोने की कीमतों पर अब युद्ध नहीं, मुद्रास्फीति और मौद्रिक नीति का ज्यादा असर: रिपोर्ट (Photo: Shutterstock)

सोने की कीमतों और जियो पॉलिटकल टेंशन के बीच पारंपरिक संबंध बदल रहा है और महंगाई, ब्याज दरें और मौद्रिक नीति सर्राफा कीमतों को प्रभावित करने वाले अधिक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरे हैं। एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है। मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (एमओएफएसएल) की 'एच1 2026 प्रेशियस मेटल्स रिपोर्ट' के मुताबिक, चालू वर्ष की पहली छमाही में यह क्लियर हुआ कि केवल जियो-पॉलिटिकल रिस्क सोने में तेजी बनाए रखने के लिए काफी नहीं हैं। इन्वेस्टरों अब संघर्षों का आकलन इस आधार पर अधिक कर रहे हैं कि उनका मुद्रास्फीति और ब्याज दरों पर क्या असर पड़ता है। एमओएफएसएल में जिंस शोध प्रमुख नवनीत दमानी ने कहा, ‘2026 की पहली छमाही ने दिखाया कि युद्ध और सोने के बीच संबंध अब पहले की तुलना में अधिक परिस्थितियों पर निर्भर हो गया है।’

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उन्होंने कहा कि मार्केट अब केवल जियो-पॉलिटिकल घटनाक्रमों पर ध्यान नहीं दे रहा, बल्कि यह देख रहा है कि उनका मुद्रास्फीति, वास्तविक ब्याज दरों और मौद्रिक नीति की अपेक्षाओं पर क्या प्रभाव पड़ता है। दमानी ने कहा कि ऊंचे बॉन्ड प्रतिफल (यील्ड) सोने के लिए सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरी। इससे सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की पारंपरिक मांग पर भी असर पड़ा, जबकि जियो-पॉलिटिकल टेंशन ऊंचे स्तर पर बने रहे। रिपोर्ट के मुताबिक, साल की शुरुआत में नीतिगत अनिश्चितता, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में निवेश, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों से सोने की कीमतों को मजबूती मिली।

रिपोर्ट में कहा गया कि बाद में शुल्क बढ़ने से उत्पादन लागत और मुद्रास्फीति की अपेक्षाएं बढ़ीं। इससे लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरें बने रहने की आशंका मजबूत हुई और अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिभूतियों की वास्तविक प्रतिफल तथा डॉलर में तेजी आई। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका-ईरान संघर्ष भी इस बदलते रुख का उदाहरण है। संघर्ष बढ़ने पर शुरुआती दौर में सोने की मांग बढ़ी, लेकिन कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से मुद्रास्फीति की चिंता बढ़ी और मौद्रिक नीति में ढील की उम्मीद कमजोर हुई। इससे सोने की तेजी सीमित रही और बाद में कीमतों में सुधार आया। रिपोर्ट में कहा गया, ‘शुल्क अब केवल आर्थिक वृद्धि के लिए जोखिम नहीं रह गए हैं, बल्कि वे मुद्रास्फीति बढ़ाने वाली ताकत बन गए हैं।’ रिपोर्ट के अनुसार, आगे भी मुद्रास्फीति का रुख, फेडरल रिजर्व के संकेत, ग्लोबल नकदी की उपलब्धता, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, ईटीएफ में निवेश और सट्टा निवेश सोने और चांदी की कीमतों के प्रमुख ड्राइवर बने रहेंगे।

भाषा इनपुट के साथ

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