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4 min read | अपडेटेड September 25, 2026, 14:58 IST
सारांश
रेटिंग एजेंसी इक्रा की रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम एशिया में तनाव और सप्लाई की दिक्कतों से कच्चे तेल की कीमतें काफी बढ़ गई हैं। घरेलू स्तर पर फ्यूल के दाम न बदलने से सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर रोजाना लगभग 530 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हो रहा है।

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच घरेलू स्तर पर दाम न बदलने से सरकारी तेल कंपनियों का नुकसान बढ़ा है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई में आई रुकावटों के कारण इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। रेटिंग एजेंसी इक्रा ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि देश की सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर लगातार भारी घाटे का सामना करना पड़ रहा है। इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल के दाम तेजी से बढ़े हैं, लेकिन घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। इस वजह से क्रूड की खरीद लागत और बिक्री कीमत के बीच का अंतर काफी बढ़ गया है, जिससे ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर रोज का वित्तीय बोझ बढ़ता जा रहा है।
इक्रा की रिपोर्ट के अनुसार, कीमतों में इस बड़े अंतर के चलते इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (HPCL) को मिलाकर रोजाना लगभग 530 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। अगर प्रति लीटर हिसाब से देखें, तो इन सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल पर 8 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 9 रुपये प्रति लीटर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसके अलावा घरेलू रसोई गैस यानी एलपीजी पर भी कंपनियों को भारी अंडर-रिकवरी हो रही है, जो कि प्रति सिलेंडर लगभग 300 रुपये तक पहुंच चुकी है।
भारत जिस कच्चे तेल का आयात करता है, उसकी कीमतों में बड़ा उछाल देखा गया है। 21 सितंबर 2026 को भारत का क्रूड ऑयल बास्केट बढ़कर 117.4 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान इसका औसत भाव लगभग 66 डॉलर प्रति बैरल ही था। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के गहराने और तेल के प्रमुख सप्लाई रास्तों में आई बाधाओं की वजह से कच्चे तेल में यह तेजी आई है। हालांकि रिफाइनरी बंद होने, सप्लाई बाधित होने और इन्वेंट्री में कमी आने से सिंगापुर ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन संकट की शुरुआत से ही 10 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है, फिर भी मजबूत रिफाइनिंग मार्जिन के बावजूद फ्यूल मार्केटर्स पर दबाव कम नहीं हो रहा है।
रिपोर्ट में एलपीजी को भी ओएमसी के लिए बढ़ते दबाव का एक बड़ा कारण बताया गया है। पश्चिम एशिया में सप्लाई में आई रुकावटों के बाद इंटरनेशनल लेवल पर एलपीजी के दाम बढ़ गए, जिससे 30 जून तक संचयी नकारात्मक एलपीजी बफर बढ़कर 61,940 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। इसके साथ ही मार्च में डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) पर लगाई गई एक्सपोर्ट ड्यूटी, जिसे बाद में पेट्रोल तक बढ़ाया गया था, वह भी काफी ऊंची बनी हुई है। 16 सितंबर से डीजल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) 20 रुपये प्रति लीटर और ATF पर 15 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर बना हुआ है।
इक्रा का मानना है कि कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की बढ़ती कीमतें तेल कंपनियों के प्रॉफिट और कैश फ्लो को प्रभावित करेंगी। इसके कारण कंपनियों को अपने वर्किंग कैपिटल की जरूरतों को पूरा करने के लिए शॉर्ट-टर्म उधारी यानी वर्किंग कैपिटल लोन में बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है। रेटिंग एजेंसी के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में कंपनियों की अर्निंग्स पर कुल कितना असर पड़ेगा, यह आगे आने वाले समय में कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव, प्रोडक्ट क्रैक्स, घरेलू रिटेल कीमतों में संशोधन और एलपीजी अंडर-रिकवरी पर मिलने वाली सरकारी सहायता पर निर्भर करेगा।
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