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4 min read | अपडेटेड May 14, 2026, 16:15 IST
सारांश
भारत में खेती के लिए विदेशी खाद और उसके कच्चे माल पर निर्भरता तेजी से बढ़ रही है। साल 2025-26 में खाद के आयात पर 1.5 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। सरकार को किसानों को सस्ती खाद देने के लिए हर साल लाखों करोड़ रुपये की सब्सिडी भी देनी पड़ रही है।

खेतों में खाद डालता किसान और विदेशी खाद पर निर्भर भारत की खेती। | Image: Shutterstock
भारत में इन दिनों गर्मी का मौसम अपने चरम पर है। गेहूं की कटाई पूरी होने के बाद किसान अब जायद की फसलों की बुवाई में जुटे हैं और खरीफ सीजन के लिए खेतों को तैयार करने का काम भी शुरू हो गया है। इसी माहौल के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वदेशी चीजों और ऑर्गैनिक खाद के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की एक खास अपील की है। इस अपील के पीछे एक बहुत बड़ी आर्थिक वजह छिपी है। दरअसल भारत में इस्तेमाल होने वाली ज्यादातर रासायनिक खादों का या तो सीधे आयात किया जाता है या फिर उन्हें बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल दूसरे देशों से मंगाया जाता है। इस भारी निर्भरता की वजह से देश का बहुत सारा पैसा विदेशी मुद्रा के रूप में बाहर चला जाता है।
भारत की खेती में धान, गेहूं, कपास और गन्ने जैसी फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए खाद की बहुत ज्यादा जरूरत पड़ती है। पिछले कुछ दशकों में भारतीय किसानों की निर्भरता गोबर और पारंपरिक खाद के बजाय यूरिया, डीएप और पोटाश जैसे रासायनिक उर्वरकों पर बहुत ज्यादा बढ़ गई है। आज हालात यह हैं कि देश के अंदर जो खाद फैक्ट्रियां चल रही हैं, उन्हें चलाने के लिए भी फास्फोरिक एसिड और रॉक फास्फेट जैसे कच्चे माल को बाहर से ही मंगाना पड़ता है। जब भी वैश्विक स्तर पर इन चीजों की सप्लाई प्रभावित होती है या कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत में खाद तैयार करने की लागत बढ़ जाती है। बीते रबी सीजन में कई राज्यों में खाद की भारी कमी देखी गई थी, जिसकी मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई का बाधित होना ही था।
खाद के आयात पर होने वाला खर्च लगातार सरकार की चिंता बढ़ा रहा है। मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के आंकड़ों को देखें तो साल 2022-23 में भारत ने खाद मंगाने पर रिकॉर्ड 1.45 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे। हालांकि इसके बाद के सालों में थोड़ी कमी आई, लेकिन अनुमान है कि साल 2025-26 में यह खर्च एक बार फिर बढ़कर 1.5 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच सकता है। भारत अपनी जरूरत का 86 पर्सेंट रॉक फास्फेट और 100 पर्सेंट पोटाश विदेशों से ही खरीदता है। इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी चीन की है। भारत खाद बनाने वाले रसायनों का लगभग 74 पर्सेंट हिस्सा अकेले चीन से मंगाता है, जिस पर हर साल करीब 30 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं।
सरकार के लिए मुसीबत सिर्फ आयात का खर्च नहीं है, बल्कि किसानों को सस्ती दर पर खाद उपलब्ध कराना भी एक बड़ी चुनौती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार से महंगी खाद खरीदने के बाद सरकार उसे किसानों को बहुत कम दाम पर देती है और बीच के अंतर की भरपाई सब्सिडी के रूप में करती है। संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, साल 2025-26 में 23 मार्च तक ही सरकार 1.36 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी बांट चुकी है। पिछले पांच सालों के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि सब्सिडी का यह बोझ साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। साल 2021-22 में जो सब्सिडी 1.04 लाख करोड़ रुपये थी, वह अब काफी ज्यादा बढ़ चुकी है, जिससे सरकार के खजाने पर दबाव बढ़ रहा है।
खाद की कमी को दूर करने और सप्लाई को सुचारू बनाने के लिए भारत सरकार लगातार विदेशी कंपनियों के साथ समझौते कर रही है। भारत की खाद कंपनियों ने सऊदी अरब, मोरक्को, रूस, जोर्डन और इजरायल जैसे देशों के साथ लंबे समय के समझौते किए हैं। इन समझौतों का मकसद यह है कि वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव होने पर भी भारत के किसानों को समय पर खाद मिलती रहे। हालांकि सरकार का असली लक्ष्य विदेशी निर्भरता को कम करना है। यही वजह है कि पीएम मोदी प्राकृतिक और ऑर्गैनिक खाद के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं। इससे न केवल विदेशी मुद्रा की भारी बचत होगी, बल्कि खेती की लागत भी कम होगी और मिट्टी की उपजाऊ क्षमता भी बनी रहेगी।
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