बिजनेस न्यूज़

4 min read | अपडेटेड April 14, 2026, 12:10 IST
सारांश
कच्चा तेल यानी 'काला सोना' जमीन से निकलने के बाद रिफाइनरी तक पहुंचता है। एक बैरल यानी 159 लीटर क्रूड ऑयल से करीब 68 लीटर पेट्रोल और 36 लीटर डीजल निकलता है। सऊदी अरब में तो इसे निकालने का खर्च 2 डॉलर यानी करीब 187 रुपये से भी कम आता है।

क्या आप जानते हैं कि आपकी गाड़ी में डलने वाला पेट्रोल कैसे बनता है?
जब हम पेट्रोल पंप पर अपनी कार या बाइक की टंकी फुल कराते हैं, तो हमारा पूरा ध्यान सिर्फ मीटर पर होता है। दिमाग में बस यही चलता है कि मीटर जितनी तेज भागेगा, जेब उतनी ही ज्यादा खाली होगी। हम सब यह जानते हैं कि पेट्रोल या डीजल कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल से तैयार होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जमीन की गहराइयों से निकला वो चिपचिपा और काला गाढ़ा तेल आपकी गाड़ी के इंजन के लिए ऊर्जा का सोर्स कैसे बन जाता है? इस 'काले सोने' की यात्रा जितनी रोमांचक है, उसका गणित भी उतना ही दिलचस्प है। क्रूड ऑयल एक काले कीचड़ की तरह निकलता है और वहां से लेकर पेट्रोल पंप तक पहुंचने की इसकी कहानी काफी लंबी है। इसमें से सिर्फ पेट्रोल और डीजल ही नहीं, बल्कि और भी कई जरूरी चीजें निकलती हैं।
कच्चे तेल को इस्तेमाल के लायक बनाने की पूरी प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बंटी होती है। इसकी शुरुआत 'अपस्ट्रीम' से होती है जिसे खोज और प्रोडक्शन का काम कहा जाता है। इसमें इंजीनियर जमीन के नीचे या समुद्र के भीतर तेल के भंडारों को ढूंढते हैं और ड्रिलिंग करके कच्चे तेल को बाहर निकालते हैं। इसके बाद 'मिडस्ट्रीम' का नंबर आता है जिसमें इस तेल के परिवहन और भंडारण का काम होता है। निकाला गया कच्चा तेल सीधा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, इसलिए इसे पाइपलाइनों, बड़े जहाजों और ट्रकों के जरिए रिफाइनरियों तक पहुंचाया जाता है। अंत में 'डाउनस्ट्रीम' का दौर आता है जहां रिफाइनिंग और बिक्री का काम होता है। रिफाइनरियों में कच्चे तेल को अलग-अलग तापमान पर उबाला जाता है और उससे पेट्रोल, डीजल और अन्य प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं।
पूरी दुनिया के बाजार में तेल को 'बैरल' में मापा जाता है। एक बैरल का मतलब होता है करीब 159 लीटर कच्चा तेल। जब इस 159 लीटर कच्चे तेल को रिफाइन किया जाता है, तो इसमें से कई चीजें निकलती हैं। एक बैरल का सबसे बड़ा हिस्सा यानी करीब 43 पर्सेंट पेट्रोल होता है। यह लगभग 68 लीटर बैठता है जो हमारी गाड़ियों को चलाने के काम आता है। इसके बाद नंबर आता है डीजल का, जो करीब 23 पर्सेंट निकलता है। डीजल का इस्तेमाल भारी गाड़ियों, ट्रकों और बड़ी मशीनों में किया जाता है। हवाई जहाजों को उड़ाने वाला जेट फ्यूल भी इसी से निकलता है जो करीब 9 पर्सेंट होता है।
कच्चे तेल से सिर्फ ईंधन ही नहीं मिलता बल्कि हमारी जिंदगी की कई और चीजें भी इसी पर टिकी हैं। रिफाइनिंग के दौरान करीब 12 पर्सेंट दूसरे प्रोडक्ट निकलते हैं जिनमें लुब्रिकेंट्स, वैक्स और एलपीजी शामिल हैं। इसमें से 2 पर्सेंट हिस्सा पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक्स का होता है जो प्लास्टिक, दवाइयों और सिंथेटिक कपड़े बनाने का आधार है। लोहे और सीमेंट की फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाला पेट्रोलियम कोक करीब 5 पर्सेंट निकलता है। विशाल समुद्री जहाजों के लिए 4 पर्सेंट मैरीन फ्यूल और हमारी सड़कों को बनाने के लिए जरूरी डामर या कोलतार भी करीब 2 पर्सेंट इसी कच्चे तेल से मिलता है। यानी सड़क से लेकर आपके हाथ में मौजूद मोबाइल के प्लास्टिक तक, सब कुछ इसी 'काले सोने' की देन है।
क्या आपने कभी सोचा है कि जमीन से एक बैरल कच्चा तेल निकालने में आखिर कितना खर्च आता है? तेल की दुनिया के सबसे बड़े खिलाड़ी और सऊदी अरब के पूर्व पेट्रोलियम मंत्री अली अल-नैमी ने एक बार बहुत ही चौंकाने वाला खुलासा किया था। उन्होंने बताया था कि सऊदी अरब में एक बैरल कच्चा तेल निकालने की लागत 2 डॉलर से भी कम हो सकती है। अगर इसे आज के हिसाब से देखें तो यह करीब 187 रुपये बैठता है। हालांकि हर जगह तेल निकालने का खर्च अलग होता है, लेकिन सऊदी अरब जैसे देशों में कुदरती बनावट की वजह से यह काफी सस्ता पड़ता है। यही वजह है कि इसे निकालने की लागत और बाजार में इसकी कीमत के बीच का अंतर काफी बड़ा होता है।
संबंधित समाचार
लेखकों के बारे में

अगला लेख