पर्सनल फाइनेंस

4 min read | अपडेटेड June 12, 2026, 15:39 IST
सारांश
फंड ऑफ फंड्स (FOF) म्यूचुअल फंड का एक ऐसा प्रकार है जो सीधे शेयरों या बॉन्ड्स में पैसा लगाने के बजाय दूसरे म्यूचुअल फंड स्कीम्स या ईटीएफ में निवेश करता है। सेबी के नियमों के अनुसार इन्हें कम से कम 95 पर्सेंट एसेट्स अंतर्निहित स्कीम्स में निवेश करना जरूरी होता है।

फंड ऑफ फंड्स के जरिए म्यूचुअल फंड्स में निवेश करने का पूरा तरीका और इसके नियम।| Image: Shutterstock.
शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय हर कोई चाहता है कि उसका पैसा सुरक्षित रहे और उसे अच्छा रिटर्न मिले। इसके लिए पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई करना यानी अलग अलग जगहों पर पैसा लगाना सबसे अच्छा तरीका माना जाता है। म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में निवेश का एक ऐसा ही दिलचस्प और आसान विकल्प मौजूद है जिसे फंड ऑफ फंड्स यानी FOF कहा जाता है। जैसा कि इसके नाम से ही साफ है, यह एक ऐसा म्यूचुअल फंड है जो सीधे किसी कंपनी के शेयर या बॉन्ड खरीदने के बजाय दूसरे म्यूचुअल फंड्स या ईटीएफ में पैसा लगाता है। आसान भाषा में कहें तो इसके जरिए आप एक ही फंड में पैसा लगाकर कई म्यूचुअल फंड स्कीम्स का फायदा उठा सकते हैं। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी के नियमों के मुताबिक, इन फंड्स के लिए अपने कुल एसेट्स का कम से कम 95 पर्सेंट हिस्सा उन म्यूचुअल फंड स्कीम्स या ईटीएफ में निवेश करना अनिवार्य होता है जिन्हें वे ट्रैक कर रहे हैं।
निवेशकों की अलग अलग जरूरतों को पूरा करने के लिए बाजार में कई तरह के फंड ऑफ फंड्स मौजूद हैं। इनमें सबसे पहला डोमेस्टिक इक्विटी ओरिएंटेड एफओएफ है, जो भारत के भीतर अलग अलग इक्विटी म्यूचुअल फंड्स जैसे लार्ज कैप, मिड कैप, स्मॉल कैप या सेक्टोरल फंड्स में पैसा फैलाता है। इससे जोखिम कम होता है और इक्विटी मार्केट की ग्रोथ का फायदा मिलता है। इसके अलावा डोमेस्टिक डेट ओरिएंटेड एफओएफ होते हैं जो लिक्विड फंड्स, कॉर्पोरेट बॉन्ड फंड्स और गिल्ट फंड्स के मिश्रण में निवेश करते हैं, जो इक्विटी के मुकाबले ज्यादा स्थिर होते हैं। वहीं हाइब्रिड एफओएफ विकास और स्थिरता दोनों का बैलेंस बनाने के लिए इक्विटी और डेट दोनों म्यूचुअल फंड्स में पैसा लगाते हैं। इसके साथ ही गोल्ड और सिल्वर एफओएफ भी होते हैं जो सीधे फिजिकल मेटल खरीदने के बजाय गोल्ड या सिल्वर ईटीएफ में निवेश करते हैं। आखिर में ओवरसीज एफओएफ आते हैं जो इंटरनेशनल म्यूचुअल फंड्स या ईटीएफ में पैसा लगाकर भारतीय निवेशकों को ग्लोबल मार्केट का फायदा उठाने का मौका देते हैं।
कई बार लोग ईटीएफ और फंड ऑफ फंड्स को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन इनके ऑपरेशन में बड़ा अंतर होता है। ईटीएफ सीधे उन सिक्योरिटीज को होल्ड करते हैं जिनके इंडेक्स को वे ट्रैक करते हैं। ईटीएफ पूरी तरह पैसिवली मैनेज्ड होते हैं, जबकि फंड ऑफ फंड्स को आमतौर पर फंड मैनेजर एक्टिवली मैनेज करते हैं। ईटीएफ की ट्रेडिंग शेयर बाजार में पूरे दिन मार्केट प्राइस पर होती है, जिससे उनमें लिक्विडिटी ज्यादा मिलती है। इसके विपरीत, फंड ऑफ फंड्स की खरीद बिक्री दिन के अंत में फंड हाउस द्वारा जारी की जाने वाली नेट एसेट वैल्यू यानी एनएवी पर ही होती है। खर्च के मामले में भी ईटीएफ सस्ते होते हैं क्योंकि इनमें पैसिव मैनेजमेंट होता है, जबकि फंड ऑफ फंड्स में निवेशकों को डबल लेयर का खर्च उठाना पड़ता है जिससे इनका एक्सपेंस रेशियो थोड़ा ज्यादा होता है।
इस स्कीम में निवेश करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके जरिए बेहद आसान तरीके से पोर्टफोलियो डायवर्सिफिकेशन मिल जाता है। कम पूंजी वाले छोटे निवेशक भी इसके जरिए कई म्यूचुअल फंड स्कीम्स में एक साथ निवेश कर सकते हैं, जिसके लिए अलग से बहुत ज्यादा पैसों की जरूरत होती। इसका एक और बड़ा फायदा यह है कि जो निवेशक किसी खास इंडेक्स, गोल्ड ईटीएफ या इंटरनेशनल ईटीएफ में पैसा लगाना चाहते हैं, वे बिना डिमैट और ट्रेडिंग अकाउंट खोले भी इस फंड के जरिए निवेश कर सकते हैं। यह खूबी नए निवेशकों के लिए इसे बहुत ही सुविधाजनक और आसान बनाती है। साथ ही गोल्ड और सिल्वर एफओएफ सीधे ईटीएफ में निवेश करने के मुकाबले टैक्स के लिहाज से भी अधिक कुशल हो सकते हैं।
फायदे के साथ साथ फंड ऑफ फंड्स की कुछ सीमाएं भी हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है। इसका सबसे बड़ा नुकसान इसका अधिक एक्सपेंस रेशियो है, क्योंकि निवेशक को एफओएफ की मैनेजमेंट फीस के साथ साथ उसके अंदर मौजूद म्यूचुअल फंड्स की फीस भी चुकानी पड़ती है, जिससे नेट रिटर्न पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा कई बार होल्डिंग्स का डुप्लीकेशन भी हो जाता है, यानी अगर आपके पास पहले से ही वैसी एसेट्स मौजूद हैं तो डायवर्सिफिकेशन का असली फायदा कम हो जाता है। इस फंड का पूरा परफॉर्मेंस फंड मैनेजर के चयन कौशल और अंतर्निहित फंड्स के प्रदर्शन पर निर्भर करता है। अगर वे फंड्स अच्छा प्रदर्शन नहीं करते हैं, तो आपका रिटर्न भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए निवेशकों को अपने फ्यूचर और रिस्क को देखकर ही इसमें पैसा लगाने का फैसला करना चाहिए।
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