return to news
  1. पहली बार हेल्थ इंश्योरेंस खरीदने वाले हैं? सही फैसला लेने के लिए इन बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी

पर्सनल फाइनेंस

पहली बार हेल्थ इंश्योरेंस खरीदने वाले हैं? सही फैसला लेने के लिए इन बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी

Shubham Singh Thakur

6 min read | अपडेटेड February 10, 2026, 17:22 IST

Twitter Page
Linkedin Page
Whatsapp Page

सारांश

हेल्थ इंश्योरेंस होने का मतलब यह नहीं कि अस्पताल का बिल जीरो हो जाएगा। कई पॉलिसियों में कुछ शर्तें होती हैं, जिनके तहत खर्च का एक हिस्सा आपको खुद उठाना पड़ता है। अगर ये बातें पहले नहीं पता हों, तो क्लेम के समय बड़ा झटका लग सकता है।

Health Insurance

Health Insurance: क्लेम सेटलमेंट रेशियो यह बताता है कि कंपनी को जितने क्लेम मिले, उनमें से कितने क्लेम उसने तय समय के अंदर सेटल किए।

Health Insurance: मेडिकल इमरजेंसी में किसी भी शख्स के पूरे जीवन की कमाई खत्म हो सकती है। आज के समय में इलाज बहुत महंगा हो गया है, ऐसे में हेल्थ इंश्योरेंस मुश्किल वक्त में ढाल बनता है। लेकिन सिर्फ सस्ता प्रीमियम देखकर पॉलिसी लेना सही नहीं है। असली सुरक्षा तब मिलती है जब आपको पता हो कि क्या कवर है, किन चीजों पर लिमिट है और किन खर्चों का पैसा आपको खुद देना पड़ सकता है। यहां हम समझेंगे कि पहली बार हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी चुनने से पहले आपको किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
Open FREE Demat Account within minutes!
Join now

को-पेमेंट

हेल्थ इंश्योरेंस होने का मतलब यह नहीं कि अस्पताल का बिल जीरो हो जाएगा। कई पॉलिसियों में कुछ शर्तें होती हैं, जिनके तहत खर्च का एक हिस्सा आपको खुद उठाना पड़ता है। अगर ये बातें पहले नहीं पता हों, तो क्लेम के समय बड़ा झटका लग सकता है। सबसे आम शर्त है को-पेमेंट। इसका मतलब है कि हर क्लेम में आप एक तय प्रतिशत खुद चुकाएंगे। जैसे अगर को-पेमेंट 10% है और अस्पताल का बिल 1 लाख रुपये है, तो 10,000 रुपये आपको देने होंगे।

को-पेमेंट वाली पॉलिसियों का प्रीमियम थोड़ा कम होता है, जो शुरुआत में अच्छा लगता है। लेकिन इलाज के समय आपकी जेब से ज्यादा पैसा जाता है। अगर आप इलाज के वक्त अचानक खर्च नहीं बढ़ाना चाहते, तो बिना को-पेमेंट वाली पॉलिसी बेहतर रहती है।

इनकर्ड क्लेम रेशियो

यह जानने का एक आसान तरीका है कि आपकी इंश्योरेंस कंपनी क्लेम चुकाने में कितनी भरोसेमंद है। इनकर्ड क्लेम रेशियो बताता है कि कंपनी ने एक वित्तीय साल में जितना प्रीमियम इकट्ठा किया, उसके मुकाबले कितना पैसा क्लेम में दिया।

मान लीजिए किसी कंपनी का ICR 85% है और उसने 10 लाख रुपये प्रीमियम के रूप में वसूले हैं, तो इसका मतलब है कि उसने करीब 8.5 लाख रुपये क्लेम चुकाने में खर्च किए। एक्सपर्ट्स के मुताबिक 70% से 90% के बीच का ICR अच्छा माना जाता है। इससे पता चलता है कि कंपनी क्लेम भी दे रही है और उसकी फाइनेंशियल हालत भी संतुलित है।

रूम रेंट लिमिट

कुछ पॉलिसियों में रोज के कमरे के किराए की सीमा तय होती है। अगर आपने इससे महंगा कमरा लिया, तो इंश्योरेंस कंपनी पूरे बिल पर कटौती कर सकती है, सिर्फ कमरे के किराए पर नहीं। इससे आपका खुद का खर्च काफी बढ़ सकता है। इसलिए या तो बिना रूम रेंट लिमिट वाली पॉलिसी लें या फिर ऐसी लिमिट चुनें जो आज के अस्पताल खर्चों के हिसाब से ठीक हो।

बीमारी के हिसाब से सब-लिमिट

इसके अलावा बीमारी के हिसाब से सब-लिमिट भी होती है, जिसे लोग अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। जैसे मोतियाबिंद या घुटने की सर्जरी पर कंपनी ने एक तय रकम से ज़्यादा देने की सीमा लगा रखी हो। ऐसे में भले ही आपका सम इंश्योर्ड 10 लाख हो, लेकिन उस इलाज में कंपनी पूरा पैसा नहीं देगी। इन लिमिट्स को पहले से जानना बहुत जरूरी है।

इनकर्ड क्लेम रेशियो

यह जानने का एक आसान तरीका है कि आपकी इंश्योरेंस कंपनी क्लेम चुकाने में कितनी भरोसेमंद है। इनकर्ड क्लेम रेशियो बताता है कि कंपनी ने एक वित्तीय साल में जितना प्रीमियम इकट्ठा किया, उसके मुकाबले कितना पैसा क्लेम में दिया।

क्लेम सेटलमेंट रेशियो

क्लेम सेटलमेंट रेशियो यह बताता है कि कंपनी को जितने क्लेम मिले, उनमें से कितने क्लेम उसने तय समय के अंदर सेटल किए। अगर किसी इंश्योरेंस कंपनी का CSR 92% है, तो इसका मतलब है कि हर 100 में से औसतन 92 क्लेम कंपनी ने मंजूर किए और उनका भुगतान किया। जितना ज्यादा क्लेम सेटलमेंट रेशियो होगा, उतना ही यह संकेत देता है कि कंपनी क्लेम देने में टालमटोल नहीं करती।

पॉलिसी में क्या-क्या कवर होना चाहिए, यह चेक करना जरूरी

एक अच्छी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी सिर्फ अस्पताल में भर्ती होने तक सीमित नहीं होती। इलाज का खर्च अस्पताल में जाने से पहले भी होता है और छुट्टी मिलने के बाद भी चलता रहता है। इसलिए प्री और पोस्ट हॉस्पिटलाइजेशन कवर होना जरूरी है। इसमें टेस्ट, दवाइयाँ और डॉक्टर की फीस शामिल होती है। अलग-अलग देखें तो ये खर्च छोटे लगते हैं, लेकिन मिलकर बड़ी रकम बन जाते हैं।

आजकल कई इलाज ऐसे हैं जिनमें 24 घंटे अस्पताल में रुकना जरूरी नहीं होता। इन्हें डे-केयर ट्रीटमेंट कहा जाता है। अच्छी पॉलिसी में ये कवर होते हैं, ताकि सिर्फ कम समय के भर्ती होने की वजह से आपको अपनी जेब से पैसा न देना पड़े। कुछ पॉलिसियों में डोमिसिलियरी ट्रीटमेंट भी कवर होता है, यानी डॉक्टर की सलाह पर घर पर लिया गया इलाज। यह तब काम आता है जब अस्पताल में बेड न मिले या घर पर इलाज करना ज्यादा सही माना जाए।

समय के साथ कवरेज बढ़ना

अच्छी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी सिर्फ आज की सुरक्षा नहीं देती, बल्कि समय के साथ और मजबूत होती जाती है। कुछ फीचर्स ऐसे होते हैं जो बिना क्लेम किए रहने पर आपको फायदा देते हैं। जैसे नो-क्लेम बोनस। अगर आपने एक साल तक कोई क्लेम नहीं किया, तो कंपनी आपका सम इंश्योर्ड बढ़ा देती है, वो भी बिना प्रीमियम ज्यादा बढ़ाए। कुछ सालों में ही आपकी कवरेज काफी बढ़ सकती है।

रिस्टोरेशन बेनिफिट भी बहुत काम का होता है। अगर साल के बीच में आपका पूरा सम इंश्योर्ड खत्म हो जाए, तो कंपनी उसे दोबारा भर देती है। यानी उसी साल दोबारा अस्पताल में भर्ती होने पर भी कवरेज मिलती रहती है। कई पॉलिसियों में फ्री हेल्थ चेक-अप भी मिलता है। यह छोटा फायदा लगता है, लेकिन समय पर जांच से बीमारी जल्दी पकड़ में आ जाती है और बड़ा खर्च टल सकता है।

वेटिंग पीरियड को हल्के में न लें

वेटिंग पीरियड हेल्थ इंश्योरेंस का सबसे ज्यादा गलत समझा जाने वाला हिस्सा है। कई लोग इसे तब समझते हैं जब क्लेम रिजेक्ट हो जाता है। लगभग हर पॉलिसी में शुरुआती वेटिंग पीरियड होता है, आमतौर पर 30 दिन का। इस दौरान इमरजेंसी के अलावा बाकी क्लेम कवर नहीं होते। सबसे जरूरी बात पहले से मौजूद बीमारियों की है। जो बीमारी आपको पहले से है, उसका खर्च पॉलिसी लेने के तुरंत बाद कवर नहीं होता। इसके लिए 2 से 4 साल तक का वेटिंग पीरियड हो सकता है। कुछ खास बीमारियों और इलाजों पर अलग से भी वेटिंग पीरियड होता है।

अगला लेख