पर्सनल फाइनेंस
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4 min read | अपडेटेड July 07, 2026, 16:59 IST
सारांश
नई EPF स्कीम 2026 के आने के बाद सैलरी पाने वाले कर्मचारियों के बीच रिटायरमेंट प्लानिंग की चर्चा तेज हो गई है। अगर आपकी सैलरी 15,000 रुपये की तय सीमा से ज्यादा है, तो आपके लिए वीपीएफ यानी वॉलंटरी प्रोविडेंट फंड एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है, जिससे आप बड़ा फंड बना सकते हैं।

रिटायरमेंट पर बड़ा फंड बनाने के लिए ईपीएफ और वीपीएफ के नियमों को समझना है जरूरी। | Image: Shutterstock.
नौकरीपेशा लोगों के लिए रिटायरमेंट के बाद एक बड़ा और सुरक्षित फंड तैयार करना हमेशा से सबसे बड़ी प्राथमिकता रहा है। नई EPF स्कीम 2026 के आने के बाद से इस बात को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। वर्तमान नियमों के मुताबिक, पीएफ खाते में अनिवार्य योगदान के लिए सैलरी की एक सीमा तय की गई है, जो कि 15,000 रुपये महीना है। ऐसे में जो कर्मचारी इस सीमा से काफी अधिक कमा रहे हैं, वे अब अपने फ्यूचर को सुरक्षित करने के लिए वॉलंटरी प्रोविडेंट फंड यानी VPF का सहारा ले रहे हैं। वीपीएफ के जरिए कर्मचारी अपने रिटायरमेंट के लिए एक बहुत बड़ा फंड आसानी से खड़ा कर सकते हैं। हालांकि EPF और वीपीएफ दोनों पर सरकार द्वारा तय किया गया एक समान ब्याज ही मिलता है, लेकिन इनके नियमों और निवेश के तरीकों में बड़ा अंतर होता है जिसे समझना जरूरी है।
कर्मचारियों के लिए EPF एक अनिवार्य बचत योजना है। नई स्कीम के तहत कर्मचारियों को अपनी सैलरी का 12 पर्सेंट हिस्सा इसमें देना पड़ता है, लेकिन यह केवल 15,000 रुपये की तय सैलरी सीमा तक ही सीमित है। इसका मतलब यह हुआ कि हर महीने कर्मचारी का अनिवार्य योगदान 1,800 रुपये होता है और इतनी ही रकम कंपनी को भी देनी पड़ती है। कंपनियां और कर्मचारी मिलकर इस तय सीमा से ऊपर की वास्तविक सैलरी पर भी योगदान करने का विकल्प चुन सकते हैं, लेकिन कंपनियों के लिए ऐसा करना अनिवार्य नहीं है। दूसरी तरफ, वीपीएफ इसी पीएफ अकाउंट का एक बढ़ा हुआ रूप है, जो कर्मचारियों को अपनी मर्जी से 12 पर्सेंट की अनिवार्य सीमा से अधिक पैसा जमा करने की आजादी देता है। कर्मचारी अपनी बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते का 100 पर्सेंट तक हिस्सा वीपीएफ में निवेश कर सकते हैं। हालांकि, इस अतिरिक्त निवेश पर कंपनी की तरफ से कोई मैचिंग योगदान देने की मजबूरी नहीं होती है।
बाजार के एक्सपर्ट्स का मानना है कि जिन कर्मचारियों की कंपनियां केवल 15,000 रुपये की तय सीमा पर ही पीएफ योगदान देती हैं, उन्हें अपने 25 से 30 साल के लंबे करियर के बाद रिटायरमेंट के समय फंड की कमी का सामना करना पड़ सकता है। केवल अनिवार्य EPF योगदान से कर्मचारियों की असल कमाई और बचत की क्षमता का सही पता नहीं चलता है। कम निवेश होने के कारण लंबे समय में मिलने वाले कंपाउंडिंग का फायदा भी कम हो जाता है, जिससे अंत में एक छोटा फंड ही हाथ लगता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी कर्मचारी की सैलरी 50,000 रुपये महीना है और उसकी कंपनी केवल 15,000 रुपये की सीमा पर पीएफ काटती है, तो 33 साल के बाद उसके पास करीब 48 लाख रुपये का EPF फंड जमा हो पाएगा। लेकिन अगर वही कर्मचारी हर महीने VPF के जरिए अलग से 5,000 रुपये का निवेश शुरू कर दे, तो वह सिर्फ VPF से ही करीब 1 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फंड खड़ा कर सकता है, जो उसके रिटायरमेंट को बेहद मजबूत बना देगा।
VPF पर मिलने वाली टैक्स छूट के नियम भी काफी हद तक EPF के समान ही हैं। कर्मचारी इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80सी के तहत अपने निवेश पर 1.5 लाख रुपये तक की टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं। इस पर मिलने वाला ब्याज भी टैक्स के लिहाज से काफी फायदेमंद है, लेकिन एक फाइनेंशियल ईयर में कर्मचारी का खुद का योगदान 2.5 लाख रुपये से ऊपर जाने पर मिलने वाला ब्याज टैक्स के दायरे में आ जाता है। अगर आप 5 साल की लगातार नौकरी पूरी करने के बाद पैसा निकालते हैं, तो मैच्योरिटी की रकम पूरी तरह टैक्स फ्री होती है। 5 साल से पहले पैसा निकालने पर टैक्स लगता है, जब तक कि वह किसी गंभीर बीमारी या कंपनी बंद होने जैसी आपातकालीन स्थिति में न निकाला गया हो। अगर निकालने वाली रकम 50,000 रुपये से कम है, तो कोई TDS नहीं कटता है। इससे ज्यादा की रकम पर पैन कार्ड देने पर 10 पर्सेंट और पैन कार्ड न देने पर 20 पर्सेंट का TDS काटा जाता है।
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