पर्सनल फाइनेंस
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5 min read | अपडेटेड June 24, 2026, 15:57 IST
सारांश
बजट के बाद कैपिटल गेंस टैक्स का पूरा नियम बदल गया है। अब शेयर, सोना या प्रॉपर्टी बेचने पर एक जैसा टैक्स नहीं लगता है। निवेश का फैसला करने से पहले निवेशकों को टैक्स के इस नए गणित को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए, ताकि फ्यूचर में होने वाली वास्तविक कमाई पर इसका कोई बुरा असर न पड़े।

taxpayer is eligible for a tax rebate of up to ₹60,000 against his tax liability in respect of normal income, which is taxed at the slab rate. | Image: Shutterstock.
मान लीजिए आपने शेयर मार्केट में पैसे लगाकर 5 लाख रुपये का मुनाफा कमाया। दूसरी तरफ आपके किसी दोस्त ने सोने में निवेश करके 5 लाख रुपये का फायदा पाया और किसी तीसरे व्यक्ति ने अपनी कोई प्रॉपर्टी बेचकर 5 लाख रुपये का कैपिटल गेन हासिल किया। क्या इन तीनों ही लोगों को अपनी इस कमाई पर एक बराबर टैक्स देना होगा। इसका जवाब है बिल्कुल नहीं। बजट के बाद देश में कैपिटल गेंस टैक्स का पूरा गणित बदल चुका है। अब किसी भी निवेश को करने का फैसला सिर्फ उसका रिटर्न देखकर नहीं, बल्कि उस पर लगने वाले टैक्स को ध्यान में रखकर यानी टैक्स एफिशिएंसी देखकर करना होगा। जब आप कोई निवेश बेचकर मुनाफा कमाते हैं, तो उस फायदे को कैपिटल गेन कहा जाता है। यह दो तरह का होता है, कम समय में बेचने पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन यानी STCG और एक निर्धारित समय के बाद बेचने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन यानी LTCG लगता है।
हर तरह के निवेश के लिए लॉन्ग टर्म कैपिटल एसेट बनने का समय अलग-अलग तय किया गया है। शेयर, इक्विटी म्यूचुअल फंड, ETF, गोल्ड ईटीएफ, रीट्स (REITs), इनविट्स (InvITs) और लिस्टेड बॉन्ड्स (Listed Bonds) के लिए यह अवधि 12 महीने की है। यानी अगर आप इन्हें 12 महीने के बाद बेचते हैं तो होने वाला मुनाफा लॉन्ग टर्म माना जाएगा। वहीं फिजिकल गोल्ड यानी सोने के सिक्के, ज्वेलरी या गोल्ड बार, गोल्ड म्यूचुअल फंड, फॉरेन इक्विटी और रियल एस्टेट यानी प्रॉपर्टी के लिए यह समय सीमा 24 महीने की तय की गई है। इसके अलावा 1 अप्रैल 2023 से पहले खरीदे गए डेट म्यूचुअल फंड के लिए भी यह अवधि 24 महीने की ही मानी जाएगी।
भारतीय निवेशकों के बीच शेयर और इक्विटी म्यूचुअल फंड सबसे ज्यादा लोकप्रिय निवेश कैटेगरी हैं। नए नियमों के मुताबिक, अगर आप शेयर या इक्विटी म्यूचुअल फंड को शॉर्ट टर्म में बेचते हैं तो आपको उस मुनाफे पर 20 पर्सेंट की दर से टैक्स देना होगा। वहीं अगर आपको इन पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन होता है, तो टैक्स की दर 12.5 पर्सेंट होगी। हालांकि इसमें राहत की बात यह है कि लॉन्ग टर्म मुनाफे में शुरुआती 1.25 लाख रुपये तक की कमाई पूरी तरह से टैक्स फ्री होती है। उदाहरण के लिए अगर आपको 3 लाख रुपये का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन हुआ है, तो 1.25 लाख रुपये पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। इसके बाद आपका टैक्स के दायरे में आने वाला मुनाफा 1.75 लाख रुपये बचेगा, जिस पर आपको 12.5 पर्सेंट की दर से 21,875 रुपये का टैक्स चुकाना होगा।
सोने में निवेश करने वालों के लिए भी टैक्स के नियमों में बड़ा बदलाव हुआ है। अगर आप गोल्ड ETF बेचते हैं तो शॉर्ट टर्म मुनाफे पर आपके इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगेगा। वहीं लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन होने पर आपको 12.5 पर्सेंट के हिसाब से टैक्स चुकाना होगा। जो लोग फिजिकल गोल्ड यानी सोने के सिक्के, ज्वेलरी और गोल्ड बार खरीदते हैं, उनके लिए नियम थोड़े अलग हैं। अगर आपको इस पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन हुआ है तो आपकी इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से ही आपको टैक्स चुकाना होगा। वहीं अगर आपको इसे बेचने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन हुआ है, तो आपको 12.5 पर्सेंट के हिसाब से टैक्स देना होगा।
डेट म्यूचुअल फंड के नियमों में सबसे ज्यादा भ्रम देखने को मिलता है। 1 अप्रैल 2023 से पहले खरीदे गए डेट फंड्स पर शॉर्ट टर्म मुनाफा होने पर टैक्स स्लैब के हिसाब से और लॉन्ग टर्म मुनाफा होने पर 12.5 पर्सेंट की दर से टैक्स लगेगा। लेकिन 1 अप्रैल 2023 के बाद खरीदे गए नए डेट फंड्स में लॉन्ग टर्म का फायदा लगभग पूरी तरह खत्म हो गया है। अब इसमें शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म दोनों ही तरह के मुनाफे पर आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से ही टैक्स वसूला जाएगा। इसके अलावा लिस्टेड बॉन्ड्स, रीट्स, इनविट्स और अमेरिकी शेयर या इंटरनेशनल ईटीएफ जैसी फॉरेन इक्विटी पर शॉर्ट टर्म गेन पर स्लैब रेट या 20 पर्सेंट का नियम है और लॉन्ग टर्म होने पर 12.5 पर्सेंट की दर से टैक्स तय किया गया है।
रियल एस्टेट यानी प्रॉपर्टी के बाजार में निवेश करने वालों के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक है। प्रॉपर्टी को शॉर्ट टर्म में बेचने पर आपके इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगेगा, जबकि लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन होने पर 12.5 पर्सेंट की दर से टैक्स देना होगा। लेकिन यहां एक बहुत जरूरी बात ध्यान रखने वाली है। अगर प्रॉपर्टी 23 जुलाई 2024 से पहले खरीदी गई थी, तो निवेशक के पास दो विकल्प मौजूद हैं। वह चाहे तो बिना इंडेक्सेशन के 12.5 पर्सेंट टैक्स दे सकता है या फिर इंडेक्सेशन के फायदे के साथ 20 पर्सेंट की दर से टैक्स चुका सकता है। निवेशक अपने फायदे के हिसाब से दोनों में से जो भी बेहतर हो उसे चुन सकते हैं। इसलिए अब निवेश करते समय सिर्फ रिटर्न और रिस्क ही नहीं, बल्कि टैक्स के प्रभाव को देखना भी बहुत जरूरी हो गया है क्योंकि टैक्स के बाद बचने वाला रिटर्न ही आपका असली रिटर्न होता है।
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